विचारधारा के सहायक हैं तो काल के नायक को करें स्वीकार

अपनी महत्वकांक्षाओं के अधीन, बिना अगल-बगल के वातावरण का संज्ञान लिये, अपनी भावनाओं और व्यवहार को सार्वजनिक रूप से जनमानस के लिये प्रश्नचिन्ह बना देना, बड़ा दयनीय काम हैं. इसका सामाजिक क्षेत्र में जहां भविष्य से ज्यादा वर्तमान में प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, वहीं राजनीति में वर्तमान से ज्यादा भविष्य में प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.

इस पर त्रासदी यह है कि भविष्य पर पड़ने वाले प्रभाव का आंकलन, वर्तमान में प्रश्न उछालने वाला व्यक्ति कभी भी नहीं कर पाता है. मैंने तो अपने जीवन में यही देखा है कि राजनैतिक पटल पर यह गलती कर के अच्छों-अच्छों ने अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारी है.

यह मानवीय भूल, हमेशा से महत्वकांक्षा की धरोहर होती है क्योंकि राजनीति में सफल होने के लिये राजनीतिज्ञों के लिये, महत्वकांक्षी होने की अनिवार्यता होती है. इसके साथ यह भी कटु सत्य है कि जो राजनीतिज्ञ महत्वकांक्षी नहीं होते हैं, वह वर्तमान के भविष्य के लिये भूत हो जाते हैं.

एक राजनीतिज्ञ के लिये यह महत्वकांक्षा दरअसल दो-धारी तलवार होती है. यह जहां एक तरफ उसको और ऊंचाई पर पहुंचने के लिये ऊर्जा और प्रोत्साहन देती है, वहीं दूसरी तरफ समय और काल की अनदेखी उसे क्रोध और कुंठा देती है. ऐसी दशा में कुंठा और क्रोध के अधीन महत्वकांक्षा उसे उस रास्ते पर कदम उठवा देती है, जिस रास्ते का पुल पीछे से टूटता चला जाता है.

उम्र के एक पड़ाव में यह मेरे साथ भी हो सकता और आपके साथ भी हो सकता है. यह स्वयं को दिया हुआ एक ऐसा श्राप है, जिसका प्रयाश्चित, गौ दान करने पर भी नहीं होता है.

यह बात आज, इस बुज़ुर्गियत में, भाजपा और हिंदुत्व के लौह पुरुष रहे, आडवाणी जी से बेहतर कोई नहीं जानता होगा.

जहां उनका काल और योगदान, लोकसभा में 2 सीट वाली भाजपा और राष्ट्रवादिता की विचारधारा को दिल्ली की सत्ता तक पहुंचाने के लिए याद किया जायेगा, वहीं अटल बिहारी बाजपेयी की सर्वव्यापी, सर्वग्राह्यता और सेक्युलर समाज में लोकप्रियता से स्तंभित अपने राजनैतिक एडवाइज़र सुधींद्र कुलकर्णी की सलाह पर जिन्नाह की कब्र पर, अपनी विचारधारा के ही चरित्र का हनन कर देने के लिए भी, याद किया जायेगा.

उसके साथ ही 2013 में समय व जनमानस को गलत पढ़ कर, 4 राज्यों के विधानसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा के लिये नरेंद्र मोदी जी को चुनाव अभियान की समिति के अध्यक्ष बनाये जाने पर बैठक में न जाना और सभी पदों से इस्तीफा भी देना याद किया जायेगा.

यह सीख है हम सबके लिए हैं, वह चाहे भूतकाल की माला पहने हैं या फिर वर्तमान काल की माला पहने हैं कि यदि आप विचारधारा के सहायक हैं तो आप को काल के नायक को सिर्फ स्वीकार ही नहीं करना होगा बल्कि विश्वास भी करना होगा और उस पर अटल भी रहना होगा. यदि ऐसा है तो कोई भी विरोधी विचारधारा, आपको खुद से पराजित होने के लिए बाध्य नहीं कर पायेगी.

आडवाणी जी अपनी पारी खेल चुके हैं और उन्होंने अपने सामर्थ्य से बढ़ कर एक पूरी पीढ़ी को नवचेतना भी दी है लेकिन अब विराम है. वह अपने समर्थकों से बहुत पहले यथार्थ स्वीकार कर चुके हैं.

आडवाणी जी ने जीवन और राजनीति के सारे उतार चढ़ाव देखे हैं और अब समय है कि उनके समर्थकों को भी विराम ले लेना चाहिये क्योंकि वे आडवाणी जी की अभिलाषा जाने बिना, अपनी अभिलाषा को सार्वजनिक प्रलाप कर के, न सिर्फ विचारधारा के हित का अहित कर रहे हैं बल्कि राष्ट्रविचाराधार के विरोधियों के अकबकाये हुये आत्महंता शस्त्र भी बन रहे हैं.

अंत में यही कहूंगा कि आप में विश्वास है कि आप सही हैं, तो लोगों का विश्वास बना रहता है क्योंकि वही आपकी सांसारिक महत्वाकांक्षा की अभिलाषा के पूर्ण होने की पहली अग्रहिता होती है. यदि आप अपने विश्वास में लड़खड़ा जाते हैं तो यह भी अकाट्य सत्य है कि आप की महत्वकांक्षा पराधीन हो जाती है.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY