सरकारी वृक्षारोपण : सुजलाम सुफलाम की जगह निर्जलाम निष्फलाम

भैया की ससुराल गया था दीवाली के वक़्त… भैया के साले ढेरों बाँस काट के लाये थे और चीड़-फाड़ काट रहे थे… हमने पूछा, ‘घर बना रहे हो क्या जो इतना बाँस काट के लाये हो?’… जवाब मिला, “अरे नहीं बोहने… ई बाड़े के लिए टाटी बना रहे है!”

“कौन सा बाड़ा और किसके लिए?”

“अरे वन विभाग वाले सड़क किनारे-किनारे वृक्षारोपण कर रहे हैं न… तो लगाए जाने वाले वृक्षों को घेरने के लिए ये बाड़े बना रहे हैं… एक बाड़े का 25 रुपया देते है वन विभाग वाले!!”

“अरे वाह! बहुत खूब… बनाओ.. बनाओ.. पैसे कमाओ !!”

मैं वृक्षारोपण को बहुत ही पुनीत और पुण्य काम के तौर पर देखता आया हूँ, जैसा कि आज हर इंसान सोचने लगा है व अस्तित्व के लिए ये एक गहरा विषय बनता जा रहा है. जब भी इन सब कार्यों को देखता था तो नमन करता था. सड़क किनारे लहलहाते सरसराते पेड़ों को देखकर बड़ा सुखद अहसास मिलता था.

लेकिन एक दिन जरा ध्यान गया कि ये पेड़ जो वन विभाग द्वारा लगाए जा रहे हैं, क्या वे हमारी जंगलों के पेड़ से मेल खा रहे हैं? दिमाग कौंधा… क्या ये हमारे पेड़ हैं? ये तो एकदम से ही अलग दिखते हैं! दूसरी बात ये कि इन लगाए पेड़ों की उपयोगिता क्या हैं? इनके पत्ते, बीज, तने के कुछ लाभ हैं? या बस यूं ही रोप दिए गए हैं?

जो खाली जगहें हैं और जहाँ अभी ये वृक्षारोपण का कार्यक्रम चल रहा है वहाँ पहले कोई न कोई तो पेड़ होंगे ही! कौन से पेड़ रहे होंगे जरा अनुमान लगा सकते हैं! नीम, करंज, अर्जुन, सखुआ, महुआ, पियार, भेलवा, पलाश, इमली, कटहल, सिमर आदि आदि..

लेकिन अब इनके स्थान पर कौन से वृक्ष हैं?… युकलिप्टस, छतनी, और सब का तो नाम भी नहीं पता… बस लगा दिए गए हैं मतलब लगा दिए गए हैं… इनकी दैनिक जीवन में कुछ उपयोगिता!? उत्तर है अ बिग घण्टा!

वृक्षारोपण पहले भी करते थे हमारे बाप-दादा लोग… जब कोई भी वृक्ष लगा रहे है तो उनका कोई खास मकसद रहता था… हम बच्चे रहते थे तो पूछते थे कि ये गाछ क्यों लगा रहे है!!?.. तब हमें उसकी गुणवत्ता और उपयोगिता गिनाई जाती थी.

नीम लगा रहे है तो उसके नवीन पत्तों का साग, उसका दातुन, उसका काढ़ा, उसका तेल आदि-आदि… कटहल लगा रहे है तो उसके फल व लकड़ी… आम के केस में भी ऐसा ही है… कोनार गाछ लगा रहे है तो उसका साग, मुनगा.. गाछ लगा रहे हैं तो उसका साग, फूल, फल, बीज.. इमली के पेड़ लगा रहे हैं तो उसके औषधीय गुण.. और अगर कोई सामान्य पेड़ भी लगा रहे है तो उसके पत्ते हमारे काम न सही बल्कि मवेशियों के काम आए तो भी लगाये जाते थे.

और अब…

कैमरे के सामने फोटो खिंचवाते कूल डूड्स ‘प्लांटेशन’ करते हुए और उसके फायदे गिनाते हुए आर्टिकल लिखने वाले… जब उनसे पूछो कि बेटा कौन से पेड़ का रोपण कर रहे हो?… तो जवाब मिलेगा, ‘नहीं मालूम सर… वैसे क्या फर्क पड़ता है, है तो प्लांट ही न.. एनवायरनमेंट के लिए तो अच्छा ही है न!’

“ओह अच्छा!!… इसके और भी कुछ फायदे गिना सकते हो बेटा?”

“नहीं सर… लेकिन इतना है कि ये एनवायरनमेंट के लिए अच्छा है!”

“अगर इसकी जगह कटहल, इमली, सखुआ लगा देते तो एनवायरनमेंट के लिए कुछ नुकसान हो जाता क्या?”

“अरे छोड़ो न सर… जो पौधे हमें नर्सरी से मिलेंगे वही लगाएंगे न… वहाँ यही पौधे मिल रहे थे तो उठा ले आया… अगर आपने जो पौधे बोले है वो वहाँ अवेलेबल रहते तो हम उसको भी लगाते!!”

ये बात तो कूल डूड ने एकदम सही कही… कि उन्हें नर्सरी में जो पौधे मिलेंगे वही लगाएंगे न!!

एक दिन खरपीटो और केशधरी गाँव में खाली पड़े मैदानों में वन विभाग द्वारा लगाये गए वृक्षों को देख रहा था… सारे बाँस के पेड़ लगाये हुए थे… क्या वे बाँस थे? घण्टा!

हाइब्रिड किस्म का बाँस है… झाड़-झुरमुट के आकार के… जो हमारे होते हैं उसकी क्या उपयोगिता है? घर बनाने में उपयोग होते है, टुपला, सूप, दौरी, खेचला, टोकरी आदि बनाये जाते हैं.. लेकिन क्या वन विभाग के द्वारा लगाए गए पेड़ से आप ये कुछ बना सकते हैं? .. जवाब फिर वही है – घण्टा!! टोटली यूज़लेस… केवल जगह माड़ के रखा हुआ है!

छतनी के पेड़ थोक के भाव लगा दिए गए हैं! उपयोगिता? घण्टा! न पत्ते, न फल और न लकड़ी ही काम की! तो फिर ऐसे वृक्ष लगाने का तुक? इनकी नर्सरियों से हमारे भारतीय पेड़ लुप्त क्यों हो रहे हैं या उगाए ही क्यों नहीं जा रहे हैं?

उजड़ते तो हैं हमारे अपने भारतीय पेड़ ही लेकिन जब बसाने की बारी आती है तो हाइब्रिड किस्म के विदेशी पेड़ क्यों थोप दिए जाते हैं जिसकी कोई उपयोगिता ही नहीं?

अगर कोई गांव में केवल मुंह उठा के भी चले गए तो मुँह धोने की कोई चिंता नहीं… नीम, करंज, सखुआ, महुआ, तितभेखवा मुंह धोने के लिए मिल ही जाते हैं… लेकिन अब न मिलने वाले… अगर बिना ब्रश के गए तो आपको नया ब्रश खरीदना ही माँगता।

आज इमली के पेड़ लगभग उजड़ने को आये… पारंपरिक गुण, महत्व न बता पाने के कारण आज हम एलोपैथिक दवाओं पर निर्भर होने लगे हैं… और जब वृक्षारोपण की बारी आती तो हमें ‘हिजड़े’ पेड़ थमा दिए जाते हैं जिसकी कोई उपयोगिता नहीं!! और जमीन की उर्वरा शक्ति को भी क्षीण कर रहे हैं। और इन यूज़लेस पेड़ों की घेराबंदी के लिए हमारे उपयोगी बाँस पचीस रुपये में काट कर बाड़े बनाये जा रहे हैं।

अरे जब वृक्षारोपण की ही बात है और सरकार इतने ही पैसे खर्च कर रही है तो फिर आलतू-फालतू के पेड़ क्यों? भारतीय, औषधीय गुण से भरपूर और फलदार पेड़ों का वृक्षारोपण क्यों नहीं?

क्या नीम, करंज, इमली, पियार, भेलवा, महुआ, कटहल, सखुआ, कोयनार, गुरमन, बेर, मुनगा, डोका, गरनीम, बेल, जामुन आदि पेड़ नर्सरी में नहीं उगाए जा सकते? या इनके लिए ज्यादा पैसे खर्चने पड़ते हैं? तो फिर ऐसे पेड़ सड़क किनारे क्यों नहीं देखने को मिलते हैं?

जरा विचार कीजियेगा!

पहले श्वेत क्रांति के नाम पर देसी गायों की नस्लों पर प्रहार किया गया और अब ये अपने अस्तित्व को लड़ रहे हैं… और अब ये सरकारी प्रायोजित कथित वृक्षारोपण के नाम पर औषधीय और व्यापारिक गुणों से भरपूर देसी पेड़ों को उखाड़ने का सुनियोजित षड्यंत्र रचा जा रहा है.. और हम ‘वृक्षारोपण’ के नाम से लहालोट हुए जा रहे हैं..

वृक्ष अपने देसी वाले भी होते हैं… कभी आस-पास नजरें दौड़ाइये कहीं ये पेड़ हमसे दूर तो नहीं जा रहे हैं न?… इनकी उपलब्धता और सुलभता धीरे-धीरे हमसे दूर खिसकती नहीं जा रही है क्या?… विचार कीजिये!

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