हर प्राणी होता है शक्ति विशेष का वाहक

सभी में परमात्मा होता है. ऐसा माना जाता है. दिखता नहीं है. ये भी देखने में आता है.

परमात्मा के द्वारा प्रकृति की रचना हुई है या नहीं, या किसी महासंकल्प को सृष्टि के स्रोत का उद्गम माना जाता है या नहीं, ये सुधिजनो के लिए आनंद विलास का एक महत प्रसङ्ग है.

इतना होने पर भी एक बात तो स्पष्ट है कि प्रकृति जन्य शक्तियां ही किसी किसी प्राणी में कम या अधिक, स्पष्ट रूप से होती है. जिसमें जिस शक्ति का प्रभाव अधिक होता है, वही उस प्राणी के व्यवहार में दर्शित भी होता है.

इस प्रकार से वो प्राणी शक्ति विशेष के गुण से आल्हादित होकर अपने अपने जीवन में आगे बढ़ता है. विशेष – ये उसी के लिए लागू भी होता है जिसमें चेतना का क्षणमात्र भी दर्शन होता है. यथा, ज्ञात या अज्ञात अवस्था में भी अनिवार्य रूप से रहता भी है. एक प्रकार से वो प्राणी शक्ति विशेष का वाहक होता है.

यही कारण है कि ईष्ट अवधारणा यहां से पुष्ट होने लगती है. जिसके पास जैसी शक्ति वैसा उसका व्यवहार.

यहां तक कि जानवरों में भी या देखा जाए, जो कि आपको पता होगा, सनातन में गाय, नाग, शेर, आदि सबमे, यहां तक कि पेड़ वनस्पति, जैसे पीपल आदि, या पत्थर विशेष भी, जैसे शालिग्राम या धातु आदि का भी गुण सामर्थ्य होता है. दिखने में तो नहीं ही दिखेगा, किंतु भाव जगत का आधान होने मात्र से विधि पूर्वक प्राणप्रतिष्ठा की शक्ति स्वभाव से मूल रूप से परमात्म शक्ति के विभिन्न नियोजन सबमें दिखते हैं.

सरलता से समझने को इतना ही काफी है, ये विधा भारत के अतिरिक्त कहीं भी दिखाई नहीं पड़ती जो परिवेश की शक्ति भी प्राप्त किये हुए है. बस परिचय होना चाहिए. यही आगम मार्ग की गोपनीयता का आरंभ है.

परमात्मा सबमे हैं. गुण प्रकाश अलग अलग होता ही है. ये जगत का स्वभाव है. इसी से संतुलन भी है.

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