समझ में आती है विवशता, कुंठा

महामहिम राम नाथ कोविंद जी के राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी की घोषणा नरेंद्र भाई और भाजपा के शीर्षपुरुषों का वर्तमान कालिक राजनीति का सर्वोत्तम दाँव है. इससे विपक्ष में ताताथैया ही नहीं मच गयी है बल्कि विपक्ष इनके मैदान में खेलने और हारने के लिये विवश हो गया है.

यह मेरे एक पुराने लेख की द्विवार्षिक बरसी का समय भी है मगर यह समकालीन भी है. फ़ाइनली भंगार ठिकाने लगा. ओम पूर्णमदः पूर्णमिदंम पूर्णात्पूर्णमुदच्यते….

साहिबान,

पिछले 8-10 दिन ख़ासी व्यस्तता के रहे हैं मगर कल का दिन बहुत ही अधिक व्यस्तता का था. शाम को समय पा कर जिम गया. श्रीमती जी के फ़ोन के कारण जल्दी ही लौटना पड़ा. कमरे में घुसा ही कि रति ने कहा, ‘इस आदमी की बैशिंग होनी चाहिये’.

इस शब्द की जो छवि मेरे मन में है वो 5 साल की उम्र की नैनीताल की है. हमारे कॉन्वेंट की आयरिश और स्कॉटिश नन्स बच्चों को ग़लती करने पर अपने घुटनों पर उल्टा लिटा लेती थीं और फिर उनके नेकर को नीचे या फ्रॉक को ऊपर खींच कर नितम्बों पर पैमाने या छड़ी से मार लगाती थीं.

स्वाभाविक था, पूछा ‘क्या हुआ?’ जानकारी मिली कि भाजपा के एक समय शिखर पुरुष रहे, राम जन्मभूमि यज्ञ के पुरोधा, इण्डिया शाइनिंग के स्वयं सुढृढ़ क्लेम किये गए महारथी ने इस समय देश में इमरजेंसी जैसा वातावरण बताया है. ज़ाहिर है आप सब की तरह मैं भी हतप्रभ रह गया.

मेरे देखे प्रेस, कांग्रेस की अपनी टीम सहित भौंदू राजकुमार, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, मायावती जी, आपियों का उत्पाती नेतृत्व लगातार केंद्र सरकार पर दोषारोपण कर रहा है.

न्यायालय बिना दबाव के काम कर रहे हैं. टी.वी. चैनल अपनी अंतहीन बहसों में दर्शकों को उलझाये हुए हैं. संसार भर के सजग देशों, उनके निवासियों के बीच देश की सामान्य, सहज छवि बनी हुई है तो इस नतीजे पर पितृ पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी जी किस कारण पहुंचे?

उन्हें ऐसा क्या दिखाई दे गया जो संसार भर को नहीं दिखाई दिया? सामान्य मीडिया का कब का प्रबल विकल्प बन चुके सोशल मीडिया की खोजी निगाहों जो नहीं दिखाई दिया वो आडवाणी जी की प्रधानमंत्री पद की लालसा में थकी, पथराई, फूटने के कगार पर खड़ी, डबडबायी, 88 वर्ष की आँखों को कैसे दिखाई दे गया?

आइये उनके गृहमंत्री काल की छानफटक करते हैं. आपको क़न्धार कांड का स्मरण होगा. हमारे एक बोइंग C-814 को कुछ आतंकवादी अपहरण करके क़न्धार ले गए थे और बदले में तीन दुर्दांत आतंकवादी मुश्ताक़ अहमद ज़रगर, अहमद क़मर सईद, मौलाना मसूद अज़हर जिन्हें भारतीय बलों ने जान पर खेल कर पकड़ा था, छोड़े गए थे.

मेरे एक मित्र अनिल गोयल जो उस समय इंडियन एयर लाइंस के डायरेक्टर मार्केटिंग थे, बताते हैं कि हम सब लोगों को मिनिस्ट्री में बुलाया गया. अंदर गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में, रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडिस, जसवंत सिंह, बृजेश मिश्रा तथा वरिष्ठ सचिवों की बैठक चल रही थी.

कोहनियों तक दस्ताने पहने बैरे तत्परता से गर्म समोसे, कचौड़ियां और चाय ले कर जा रहे थे. इतने गहन, विस्तृत विचार मंथन के बीच विमान अमृतसर के हवाई अड्डे पर उतर कर वापस उड़ गया और भारतीय बलों के हाथों में आ कर भी निकल गया.

आपको बांग्लादेश की सीमा पर भारतीय सुरक्षा बलों की हत्या याद होगी. कहते हैं भारतीय बल के लोगों को मारने के बाद बांग्लादेशी सेना के लोग उस रात डर के मारे सोये नहीं थे कि सुब्ह होते ही भारतीय हमारी खाल उधेड़ डालेंगे.

बाद में इन्हीं महामहिम के नेतृत्व में बांग्ला देश में कोई एक्शन न लेने का निर्णय लिया गया… परिणामतः बंगलादेश ने भारतीय सैनिकों के शव बांसों पर जानवरों की तरह बांध कर लौटाए.

आपको संसद यानी वो स्थान जिसे वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने पहले दिन प्रवेश करते समय लोकतंत्र का मंदिर कहा और जिसकी सीढ़ियों पर देव मूर्ति के सामने श्रद्धातुर व्यक्ति की तरह माथा टेका, पर आतंकी हमला याद है?

महान गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में कड़ा निर्णय ले कर भारतीय सेनाएं पाकिस्तान की सीमाओं पर तैनात कर दी गयीं. एक वर्ष से अधिक समय तक हमारे बहादुर सैनिक सीमाओं पर सीना ताने, मुट्ठियाँ भींचे, दांत पीसते खड़े रहे.

लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में दिल्ली में चैन की बांसुरी बल्कि आर्केस्ट्रा बजाया जाता रहा. कई बार तो कथकली नृत्य भी किया गया.

इन घटनाओं के बाद भी चुनाव के समय इन्हीं की मंडली के लोगों ने प्रधानमंत्री के रूप में इनका परम पराक्रमी नाम उछाला. हास्यास्पद रूप से इन्हें सृदृढ़, प्रखर, सक्षम नेता बताया. चुनाव में इस नारे की छत्रछाया में भाजपा की खाट खड़ी हो गयी.

भाजपा ने इस मर्मान्तक पराजय के कारणों की छानफटक के लिए शिमला में चिंतन बैठक आयोजित की. तय था कि साहब जी की अगला दांव चलने के लिए आतुर मुट्ठियाँ घूमती कालजयी मुद्रा की, हथेलियाँ खोल कर सन्टी से सुताई होगी.

साहब ने आग उगलने को आतुर पार्टी की क्रुद्ध तोपों का मुंह जसवंत सिंह की किताब ‘मुहम्मद अली जिनाह’ की ओर फेर दिया. पार्टी की लोकसभा के चुनाव में पराजय पर चिंतन बैठक ‘मुहम्मद अली जिनाह की किताब पर समीक्षा बैठक’ में बदल दी गयी.

अगला दांव चलने के लिए आतुर घूमती मुट्ठियाँ शकुनि की मुठ्ठियाँ साबित हुईं. जो काम दिल्ली के हिंदी भवन सभागार में किया जाना चाहिए था उसके लिये पार्टी की शिमला बैठक का उपयोग किया गया. ज़ाहिर है शिमला की ठण्ड में ही तो पार्टी को बर्फ़ में लगाया जा सकता था.

इस चुनाव से पहले साहब और उनके स्नेह पात्र अरुण जेटली, सुषमा स्वराज ने पुरज़ोर कोशिश की कि नरेंद्र मोदी गुजरात से बाहर न निकल पाएं. उन्हें कोई केंद्रीय दायित्व न मिले मगर भाजपा के कार्यकर्ताओं, जनता में उनके प्रति निष्ठा तथा लगाव ने भाजपा के नेतृत्व को विवश कर दिया कि चुनाव नरेंद्र मोदी को केंद्र में रख कर ही लड़ा जाये. परिणाम सामने है.

इतने लम्बे समय के राजनैतिक जीवन में अपनी जीत के लिये जिस व्यक्ति को नरेंद्र मोदी की शरण में जा कर गुजरात से चुनाव लड़ना पड़ता हो, एक सीट के लिए मुंह ताकना पड़ता हो उसकी विवशता, कुंठा समझ में आती है.

रामजन्मभूमि आंदोलन की चिन्तना भी मातृ संगठन की थी. रथ के सारथि नरेंद्र मोदी थे. इस योजना के पीछे भाजपा के अतिरिक्त मातृसंगठन, विविध क्षेत्रों के लोग प्राणप्रण से लगे थे.

ये आंदोलन लाखों हिन्दुओं के घोर परिश्रम का परिणाम था मगर इसका श्रेय मीडिया के अपने पालतुओं के द्वारा साहब हड़प गए. आपको देश भर में घुमाने के बाद मातृ संगठन ने अयोध्या में लाखों लोग भेजे और दूसरे एकत्रीकरण में बाबरी ढांचा गिरा दिया गया.

आपने राष्ट्र गौरव को वापस लौटाने के इस आंदोलन और उसकी पूर्णाहुति की पीठ में भी छुरा घोंपा और दिल्ली वापस लौट कर नेता प्रतिपक्ष के पद से ये कहते हुए त्यागपत्र दे दिया कि बाबरी ढांचे के ढहने का दिन जीवन का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण और काला दिन है.

मेरे मुंह में ख़ाक, साहब जी आप अयोध्या किस मन:स्थिति से गए थे? क्या कोई जादू की छड़ी हाथ में थी, जिसे हिला कर गिली गिली बू कहते ही ढांचा ग़ायब हो जाता? इसके सिवा ऐसी किसी भी समस्या का और कोई समाधान सम्भव है? बाबर से इतना ही लगाव था तो 1947 में कराची से क्यों भारत आये? वहीँ मुहम्मद अली जिनाह के साथ रहना चाहिए था.

यहाँ एक प्रश्न स्वनाम धन्य महापुरुष से पूछने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ. मेरी जानकारी के अनुसार भारत में लोकतंत्र है. किसी भी राजनेता को भारत का प्रधानमंत्री बनने का स्वप्न पालने का अधिकार है मगर इसके लिये पहले जनता का समर्थन, फिर सांसदों का समर्थन चाहिए. वो कहाँ से आएगा? जनता जुतियाने को घूम रही हो तो ऐसे स्वप्न मुंगेरी लाल के हसीन सपने ही साबित होंगे.

मेरे एक मित्र का कहना हैं ज़ंग लगे कबाड़ को हटाने में टिटनेस का ख़तरा है. ज़रूर होगा, राष्ट्रोत्थान के इस महायज्ञ के लिये नींव खोदने के लिये भूमि साफ़ तो करनी ही होगी. इसमें पहली आहुति मेरी पड़े तो धन्यभागी, यशस्वी होऊंगा. वैसे मैं आश्वस्त हूँ कि समाज इस भंगार को हटाने पर आमादा है. अब बहुत हो गयी.

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