बहारें फिर से आयेंगी तो नज़ारा हम भी देखेंगे

हाल फ़िलहाल में कुछ ऐसे समारोहों में जाना पड़ा है जिसमें राज्यपाल महोदय भी शिरकत कर रहे होते थे. हमने भी उन्हें (स्टेज से चालीस फुट दूर से ही सही) देखा तो है. जहाँ तक नाम का सवाल है, नाम की महिमा हमने सुनी है लेकिन उनका नाम पता नहीं था.

जब नाम पता चला तो हमें बस इतना याद आया कि सन 2015 में जब बिहार के विधानसभा चुनाव होने वाले थे, उसी वक्त इन्हें बिहार का राज्यपाल बनाया गया था. उस वक्त शायद आरएसएस प्रमुख के आरक्षण सम्बन्धी बयान को लेकर विवाद खड़ा हुआ था और डैमेज कण्ट्रोल की जरूरत थी.

अब ये मत पूछियेगा कि “दलित चेहरे” को राज्यपाल बना कर बिहार में कितने दलित वोट मिले और कौन जीता, या नहीं जीता. दलित चेहरा उस दौर के समर्थक जीतन राम मांझी भी थे, लेकिन उनका नाम (मेरे अलावा) कितनों को याद होगा पता नहीं.

पटना में हाल में ही नगर निकायों के चुनाव हुए हैं, जिसमें (बाहुबली) अनंत सिंह का शिरकत ना करते दिखना एक बड़ी खबर रही. फेसबुक के जरिये हमें पता चल गया है कि सीता अब हमारे शहर की फर्स्ट लेडी (अर्थात मेयर) होंगी, और हमारे राज्य के फर्स्ट पर्सन (राज्यपाल) श्री राम (नाथ कोविंद) अब भारत के प्रथम पुरुष होने जा रहे हैं.

हमने ये पढ़कर जब अपने मित्रों को बताया तो कहा गया कि हाँ जिस स्पीड से कांग्रेस, राजद, जद(यू) सब भाजपा होती जा रही है, अब तो बस सीताराम (येचुरी) का भगवा ओढ़ लेना बाकी रहता है.

हम शिव-शिव कहते कान को हाथ लगाने को हुए तो बताया गया कि वो लोग अपना न्यू इयर भी किसी मठ में मनाते पाए जाते हैं. “मठ” का अर्थ हम साहित्य सदन / यूनिवर्सिटी जैसा कुछ समझ रहे थे तो और तस्वीरें भी निकल आई.

लोग ज्योति बासु के सुपुत्र के मंदिर में सोने का हाथ दान करने की फोटो भी बचाए रखते हैं, ये 32 जी.बी. की इनबिल्ट फ़ोन मेमोरी भी अलग ही आफत है. मेरा विश्वास पक्का हो चला है कि अगला विश्व-युद्ध स्क्रीन-शॉट से ही लड़ा जाएगा.

भारत के अहिंसावादी प्रवचनों के बीच एक विडंबना ये भी है कि यहाँ चुनाव ‘लड़े’ जाते हैं. शांतिपूर्ण तरीके से ठप्पा लगाकर या बटन दबाकर होने वाले मतदान को ‘लड़ना’ क्यों कहते हैं ये भी हमारी समझ में कभी नहीं आया.

मेरे ख़याल से दार्शनिकों-साहित्यकारों-राजनीतिज्ञों और चौथे खम्भे की तुलना में जनता की भाषा सच्चाई के ज्यादा करीब होती है. लोग जमीनी सच्चाई पर फरेब की चाशनी नहीं लपेटते, इसलिए जहाँ साम, दाम, दंड, भेद सब चलता हो उसे चुनावी दंगल और उसमें उम्मीदवारों का उतरना, खड़े होना, पछाड़ना, धूल चटाना, से लेकर जमानत जब्त के लिए जमीन सूंघना भी इस्तेमाल कर लेते हैं. कुश्ती जैसे चुनावों में ये राष्ट्रपति चुनाव बिलकुल नूरा कुश्ती जैसा ही होता है.

इस में अच्छी बात ये है कि प्रतिद्वंदी असली वाले चुनावों टाइप सच में गुत्थमगुत्था नहीं होते. कम से कम एक पद की मर्यादा बची रहती है, वरना प्रधानमंत्री पद की गरिमा तो वी.पी. सिंह के प्रत्याशी बनते ही जाती रही थी.

भारतीय लोकतंत्र के इस 1950 के बाद वाले दौर में जब से दो ही बड़ी पार्टियों के बदले कई छोटी-छोटी पार्टियों का युग ‘स्वतंत्र पार्टी’ के आने के समय से आया राष्ट्रपति चुनाव बदल गए हैं.

बीच-बीच में रबर स्टाम्प कहे जाने वाले राष्ट्रपति भी आये. भारतीय लोकतंत्र में दो बार महिलाओं ने ही रबर स्टाम्प राष्ट्रपति स्थापित किये हैं, सास का तो वैसे ही पक्का पता है, बहुरानी तो खैर खुल्ला ही घोषणा कर देती हैं कि वो फलाने की बहू हैं, किसी से नहीं डरती.

जिन्हें ये रबर स्टाम्प राष्ट्रपति अजीब लगते हों, उन्हें ये भी सोचना चाहिए कि पार्टी प्रमुख के लिए भारतीय यात्रियों से भरा विमान लखनऊ से हाईजैक करने वालों की हरकत की तुलना जिसने संसद में ही गांधी के नमक सत्याग्रह से कर दी थी, भारत ने उन्हें भी राष्ट्रपति होते देखा है.

अब राष्ट्रपति चुनाव में जीत-हार मायने नहीं रखती. चुनाव तय होते ही इस बात का फैसला शुरू होता है कि इस प्रत्याशी के खिलाफ किसी को “खड़ा” किया जा सकता है या नहीं. राष्ट्रपति बिना लड़े ही जीतता हुआ दिखना भी जरूरी है. पिछली बार के राष्ट्रपति कलाम को दुबारा चुनने जैसा मामला नहीं होना चाहिए. विरोध करने लायक दम ही ना रहे विपक्ष में, ये भी जरूरी है.

कल दोपहर से आज तक में जब गंगा से काफी सारा पानी बह चुका है और पक्ष-प्रतिपक्ष-विपक्ष कोई भी श्री रामनाथ कोविंद के मुकाबले में कहीं से मजबूत नाम पेश नहीं कर पाया है तो इसे राजनैतिक जीत मान लेना चाहिए.

वैसे ये जो सन्नाटा है इसकी वजह ये भी हो सकती है कि गर्मियों की छुट्टियाँ हैं, हो सकता है कि बच्चों के ननिहाल जाने पर कई घरों में माहौल सन्नाटे जैसा है. बरसात के साथ बहारें फिर से आयेंगी तो नजारा हम भी देखेंगे. लाजमी है कि… हम भी देखेंगे…

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