भारतीय राजनीतिज्ञों की मूक सहमति से सटोरियों के हाथ गिरवी क्रिकेट

कल भारतीय क्रिकेट बोर्ड की क्रिकेट की टीम जो भारत का प्रतिनिधित्व करती है, चैंपियंस ट्रॉफी के फाइनल में पाकिस्तान से 180 रन आखिर हार ही गयी.

यह तो हमेशा से कहा जाता है कि खेल में हार और जीत लगी ही रहती है लेकिन आज की हार, जीत पर हार की जीत है. मैं कई दशकों से क्रिकेट और उसके साथ घट रही घटनाओं पर नज़र रखे हूँ और इसी कारण, मेरा क्रिकेट से पिछले एक दशक से मोह भंग हो चुका है.

आज की हार क्रिकेट के खेल में भारत की हार नहीं है, यह हार रची हुयी है जिसके बारे में मैं ट्विटर व अन्य व्हाट्सएप समूह में कल दोपहर से ही जिक्र करता रहा हूँ. दाऊद के दुबई सिंडिकेट और इंग्लैंड के बुकी की बेटिंग यह स्पष्ट बता रही थी कि जीत सट्टा लगाने वालों की नहीं होगी बल्कि उनके साथ खेलने वालों की होगी.

इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था कि भारत पहले खेलता या बाद में, परिणाम पहले से तय था. सबसे बड़ा सट्टा इस बात पर था कि पाकिस्तान की प्रारंभिक बल्लेबाज कितना रन खींचेंगे और भारत के प्रारंभिक विश्व प्रसिद्ध 3 बल्लेबाज़ कितने पर आउट होंगे.

इन सब में कोहली और उसके साथी खिलाड़ियों को गाली देने से कोई फायदा नहीं है क्योंकि उन्होंने खेल नहीं हारा है बल्कि उन्होंने हार स्वीकार की है. वो चाह कर भी मैच नहीं जीत सकते थे.

उसका कारण भी बड़ा स्पष्ट है. ये लोग भारतीय क्रिकेट बोर्ड के अनुबंधित खिलाड़ी है और वो बोर्ड के खिलाफ नहीं जा सकते हैं. अब सवाल यह पैदा होता है कि वो क्यों विरोध नहीं कर सकते है?

वह इसलिए नहीं कर सकते है क्योंकि उन्हें मालूम है कि क्रिकेट बोर्ड पर आम भारतीय लोगो का कब्ज़ा नहीं है बल्कि उस पर राजनैतिक लोगो का कब्ज़ा है और उसमें भारत के सत्ताधारी और विपक्ष दोनों साथ हैं.

हकीकत यह है कि क्रिकेट के हमाम में कांग्रेस और बीजीपी दोनों नँगे है.

भारत की क्रिकेट प्रेमी जनता के जनून ने यह समझा है कि उन्होंने क्रिकेट के देवता बनाये है लेकिन इन कूढ़-मगजों को यह नहीं पता चला कि इन देवताओं की जान भारतीय क्रिकेट बोर्ड नामक राक्षस ने अपने पिंजरे में कैद रखी है.

यह कहानी आज की नहीं है, यह कहानी 1980 के दशक में शुरू हुई है. क्रिकेट में आपराधिक लोगों की संलिप्तता, शरजाह में खेले जाने वाले क्रिकेट टूर्नामेंटों से शुरू हुयी जिस पर बाद में एकाधिकार मुम्बई के दाऊद अब्राहम के गैंग का हो गया था.

दाऊद की इस गैरकानूनी सट्टेबाजी में शरजाह के क्रिकेट बोर्ड के लोग, जो टूर्नामेंट कराते थे, वह भी शामिल थे. कालांतर मे सट्टे पर भाव और अधिकतम लाभ के लिये, दाऊद सिंडिकेट ने ग्राउंड्स मैन, अंपायर, कुछ खिलाड़ियों के साथ बोर्ड के अधिकारियों को धन और दबाव में तोड़ लिया.

भारत की क्रिकेट प्रेमी जनता के जुनून को भुनाते हुये, 80/ 90 के दशक में क्रिकेट में हुये भ्रष्टाचार से दाऊद इब्राहिम के सिंडिकेट को जो बिना खून खराबे के अकूत धन की आवक हुयी उससे भारतीय राजनीतिज्ञों को इसमें धन अर्जित करने की असीमित संभावनायें दिखाई दी और वह इसको प्रश्रय देने लगे.

इसी का ही परिणाम है कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड से लेकर विभिन्न राज्यों के क्रिकेट बोर्डो पर राजनैतिक लोगों द्वारा कब्जा किया जाने लगा.

क्रिकेट में जब एक बार भ्रष्टाचार को मौन स्वीकृति मिल गयी तब वह टीवी प्रसारण के अधिकार से लेकर आईपीएल टूर्नामेंट तक फैल गयी. जिसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय क्रिकेट के विभिन्न बोर्डो पर कब्जे को लेकर भारत की केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकारों की परोक्ष रूप से महत्वपूर्ण भूमिका होने लगी है.

2000 के बाद से तो कांग्रेसी राज ने भारतीय समाज मे भ्रष्टाचार को एक सामाजिक प्रतिष्ठा ही दे दी और भारतीय कंट्रोल बोर्ड कांग्रेस पार्टी के लिये धन का मुख्य स्रोत बन गया है.

यहां ऐसा नहीं है कि क्रिकेट की भ्रष्ट व्यवस्था में सिर्फ कांग्रेसी या उनके समर्थित लोग ही सांस ले रहे है बल्कि इसमें राजनैतिक दलगत हितों से ऊपर उठ कर भाईचारा है.

क्रिकेट प्रशासकों के हाथों में धन की इतनी बड़ी शक्ति आ गयी है कि जनता के बीच दो धुर विरोधी भी क्रिकेट के मुद्दे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने से बचते है. आज, भारतीय क्रिकेट बोर्ड के प्रशासकों का समूह एक ऐसा ‘विशिष्ट क्लब’ बन गया है, जिस पर लगाम लगाना मोदी सरकार के बस की बात नहीं है.

ऐसा नहीं है कि भारत की सरकार को यह सब नहीं मालूम है क्योंकि स्वयं नरेंद्र मोदी गुजरात क्रिकेट बोर्ड के लंबे समय तक अध्यक्ष रहे है और आज भी अध्यक्ष पद पर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह आसन्न है.

आज भारत मे क्रिकेट एक खेल के रूप में मर चुका है वह अब भारतीय राजनीतिज्ञों की मूक सहमति से सिर्फ सटोरियों के हाथ गिरवी है.

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