हर इश्क़ मुकम्मल नहीं होता, पर इश्क़ ज़िंदा रहता है…

हर खेल मुझे प्रिय है…पर हॉकी सबसे ज्यादा प्रिय है. पर कल हॉकी में भारत की 7-1 से जीत का ज़िक्र नहीं किया सिर्फ इसलिए कि कोई यह ना कहने लगे कि अंगूर खट्टे हैं, क्रिकेट में हार गए इसलिए हॉकी की बात कर रहे हो.

क्रिकेट 6 साल की उम्र से फॉलो कर रहा था. मुझे एल्विन कालीचरण की वह टीम याद है जिसके विरुद्ध नए-नए आये कपिल देव ने 103 डिग्री बुखार में खेलते हुए मैच जिता दिया था… वह गावस्कर की पहली कैप्टैनशिप सीरीज थी.

एक वक्त था जब अपने समय के खिलाड़ियों की क्या, वाडेकर, बापू नादकर्णी, चार्ली ग्रिफ्फिथ और फ्रैंक वारेल तक के रिकार्ड्स याद रहते थे. आज क्रिकेट में क्या चल रहा है, मुझे मालूम नहीं रहता.

कोहली की गर्लफ्रैंड कौन-कौन है, उसने कितनी सेंचुरी मारी मुझे पता नहीं… मुझे तो यह भी नहीं मालूम कि कौन दाएं हाथ से खेलता है, कौन बाएं से… कौन तेज़ बॉलर है, कौन स्पिनर… किस टीम का कप्तान कौन है… सच्ची, मुझे नहीं पता…

कुछ दिन पहले ही मालूम हुआ कि धोनी कप्तान नहीं रहा… क्रिकेट खेलना अब भी अच्छा लगता है. पर क्रिकेट से इश्क़ नहीं रहा.

क्रिकेट मोहल्ले की उस खूबसूरत लड़की जैसी है जिसे फैंटेसाइज़ सब करते हैं, पर वह इतनी बदनाम हो चुकी है कि उससे इश्क़ नहीं किया जा सकता.

भारतीय क्रिकेट आज वेश्या की तरह है… आज भी हसीन है, पर उसका हुस्न किसी तवायफ का हुस्न है… जब जीतो तो लगता है, उसने मुस्कुरा कर देख लिया… जब हारो तो समझ में आता है कि वह तो बदचलन है…

पर हॉकी का हुस्न सदाबहार है. एक समय था जब सपने में हॉकी नज़र आती थी. जब असली हॉकी स्टिक नसीब नहीं होती थी, पर पुटूस के डंडे की बनी हॉकी स्टिक से ही पेनल्टी कार्नर लिया करते थे.

कहीं भी घनी झाड़ियों में किचन का चाकू लिए घुस जाते थे, स्टिक काटने के लिए. हाथ पुटूस के कांटों से लहूलुहान हो जाते थे, पर जब उससे दनदनाती हुई शॉट गोल में जाती थी तो उस खुशी का मुकाबला नहीं था…

तब गुरमैल सिंह, सुरिंदर सिंह सोढ़ी और शाहिद बनने के सपने देखा करते थे… परगट सिंह और नेगी के पोस्टर कमरे में लगाया करते थे…

हॉकी खेलने नहीं मिली… कभी जिंदगी में एस्ट्रो टर्फ पर कोई प्रॉपर मैच खेलने नहीं मिला… हर इश्क़ मुकम्मल नहीं होता… पर इश्क़ ज़िंदा रहता है… रोजमर्रा की ज़िंदगी में उस गुजरे जमाने के इश्क़ की फुरसत नहीं है.

आज भी कहीं हॉकी हो रही होती है तो मुड़ कर देखता जरूर हूँ. मैच फॉलो नहीं करता. टीम में आज कौन-कौन से लड़के हैं, मुझे नहीं पता. पर दिल हॉकी के लिए धड़कता है.

हॉकी ने भी बहुत दिल तोड़ा है. हर ओलिंपिक और वर्ल्ड कप में जरा-जरा से सेमीफाइनल स्पॉट मिस करने की कहानी पुरानी हो गई… 1982 के वर्ल्ड कप से हर 2 साल में बारी-बारी से बदस्तूर यही कहानी दुहराई गई है…

अब हौसला नहीं रहा कि दिल पर पत्थर रख कर स्कोर मालूम रखूं… पर टूटे दिल का इश्क़ भी इश्क़ ही है…

कल भारत की पाकिस्तान पर 7-1 से जीत का मूल्य उन्हें समझ में आएगा, जिन्होंने 1 दिसंबर 1982 को नेशनल स्टेडियम में एशियाड के फाइनल में इसी पाकिस्तान से 1-7 की हार के बाद तकिये गीले किये हों…

बाकियों को क्रिकेट का यह तमाशा मुबारक हो…

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