अचानक सबको हॉकी से मुहब्बत हो गई!

“बाह मजा आगिया, ओह क्या बात है, का मारा है ससुर के नाती सब को.” चौक पर सभी लटके चेहरों ने एक साथ सामने से नाचते झूमते आते भुनेसर को देखा तो गुस्से से लाल हो गये. साला हम मैच हारने का दुःख मना रहे और ये साला नाच रहा.

“रे भुनेसरा, पगला गए हो ससुर? तोहर बाबू के बिआह है का जो एतना खुसी मना रहा है ?” रमेसर ने भुनेसर को डांट लगाते हुए कहा.

“अरे भईया काहे न नाचे बताओ. भारत पाकिस्तान से जीत गया है.”

“अरे भईया जीता है ऊहो 7-1 से”

“ऐ ससुर ऊ तऽ हाकी का मैच है.”

“तऽ का हुआ ओई में खेले बला खेलाड़ी भारतीय ना है जा हाॅकी अपन देस के खेल ना हए ?”

“हाॅकी तऽ अपन रास्ट्रीय खेल है.”

“हँ तऽ हम काहे नऽ नाचे झूमें ?”

“हँ भाई सही कह रहे हो. चलऽ नाचल जाए.”

“भक्क ससुर भागा इहां से जा अपन किरकेट पर रोआ धोआ. पहिले हाॅकी याद ना आया आ अब जब जीत गया तऽ चले आए अपन दुःख दूर करने. जसन मनाना है तऽ अगिला बेर से पूरा तरह समर्थन करिए हाॅकी का नहीं तऽ ई झूठो के दोगलापन्नी न देखाईए. हटिए हमको जसन मना के फाईनल का तईयारी करने दीजिए.”

सब चुप भुनेसर का नाच गाना फिर से शुरू.

– धीरज झा

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