गोमांतक : वीर रस का योद्धा ही कर सकता था मानसिक रूप से गेय पद्य के रूप में महाकाव्य की रचना

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जब भी विनायक दामोदर सावरकर जी के बारे में सोचता था एक क्रांतिकारी व्यक्ति की छवि मानस में उभर जाया करती थी. उनकी रचनाओं के बारे में सुन रखा था. पर जब पहली बार उनकी कालजयी रचना ‘मोपला’ पढ़ा तो उनके भीतर के साहित्यिक कौशल को देखकर अभिभूत हो गया. इस पुस्तक में अनंत संभावनाएं हैं. उनके इस उपन्यास पर सैकड़ों समीक्षाएं लिखी जा सकती हैं, अनेक शोध हो सकते हैं. पर साहित्य जगत के विद्वान इस ओर से जानबूझकर अपना मुँह फेर रखे हैं.

आज उनकी एक दूसरी रचना ‘गोमांतक’ पढ़ रहा था. इसकी रचना उन्होंने अण्डमान के पोर्ट ब्लेयर जेल में की थी. उन्हें आजीवन कालापानी की सजा हुई थी, वो भी दो बार अर्थात कुल पचास वर्षों की सश्रम कैद.

चूंकि उन्हें भयंकर बन्दी समझा जाता था, इस कारण उन्हें कागज, लेखनी तक भी नहीं देने का स्पष्ट निर्देश था. उन्हें वहाँ बैलों की तरह कोल्हू में जुतकर तेल निकालना पड़ता था. ऐसे विपरीत परिस्थितियों में उन्होंने मानसिक रूप से गेय पद्य के रूप में गोमांतक महाकाव्य की रचना की.

बाद में जेल से छूटने के बाद उसे लिखित रूप प्रदान किया. इस पुस्तक का कथानक गोवा (गोमांतक) में पुर्तगाली शासन की क्रूरता और हिन्दुओं के दमन पर आधारित है. इसे पहले मराठी भाषा में गद्य रूप में लिखा गया फिर बाद में उसका हिंदी अनुवाद किया गया.

मेरी नजर इस महाकाव्य की पहली ही पंक्ति पर ठहर गया और मैं हैरान हूँ कि एक वीर रस का योद्धा कैसे ऐसे नवीन उपमानों का प्रयोग कर रहा है जैसे उसका मुख्य कार्य कवि कर्म ही हो. उस पहली पंक्ति में ही संपूर्ण महाकाव्य की नियति छिपी हुई है. वे कविता का आरंभ दारका नदी की सुन्दरता का वर्णन से आरंभ करते हैं –

“यह देखो ”दारका’, तापहारिणी लोक-माता! फेन-धवल उसका नीर देखो, कैसी प्रतिपदा के चन्द्रमा की कोर-सी उसकी कांति.”

यह ‘प्रतिपदा के चन्द्रमा’ से नदी की उपमा पढ़ कर मैं वहीं ठहर गया. मुझे 1960 में बनी फिल्म ‘चौदहवीं का चाँद’ का शकील बदायूंनी का लिखा गीत याद आ गया. जिसमें नायक नायिका को कहता है ‘चौदहवीं का चाँद हो, या आफ़ताब हो, जो भी हो तुम खुदा कि क़सम, लाजवाब हो’.

चौदहवीं पूर्णिमा से एक दिन पहले आता है और प्रतिपदा पूर्णिमा के एक दिन बाद आता है. जब सारे साहित्यकार अपनी रचना में पूर्णिमा के चाँद को ही तवज्जो देते रहे हैं, ऐसे में किसी कवि द्वारा नए प्रयोग करना अनायास नहीं है. वह अवश्य ही इसके पीछे कोई गूढ़ रहस्य छिपाए हुए है.

आइये पहले ‘चौदहवीं के चाँद’ को समझने का प्रयास करते हैं. शकील बदायूंनी अपनी नायिका के नूर को आफ़ताब मतलब सूरज के आसपास रखना चाह रहे हैं. इससे यह तो स्पष्ट हो ही रहा है कि यह चौदहवीं अमावस्या के पहले वाली नहीं है बल्कि पूर्णिमा से पहले वाली है.

इसका एक अर्थ यह हो सकता है कि नायिका जो अभी कोई प्रेयसी है या नवविवाहिता है वह अभी अपने उभार पर है और उसे अभी और निखरकर पूर्णिमा तक पहुँचना है. इसमें उसके भविष्य की सुखद संभावनाएं छिपी हुई हैं.

इस कारण यह एक सकारात्मक उपमान है जबकि पूर्णिमा से किसी की तुलना का अर्थ है कि उसे जो मिलना था मिल चुका है अब उसका ढलान आरंभ होने वाला है.

इसका दूसरा अर्थ यह हो सकता है कि समाज ने हमेशा अपने बीच जिसने प्रथम स्थान प्राप्त किया उसे ही सम्मान दिया और जो दूसरे स्थान पर रहा और सिर्फ संयोगवश ही दूसरे स्थान पर रहा, उसे उपेक्षित जीवन जीने के लिए अभिशप्त होना पड़ा.

वह कहीं से भी प्रथम स्थान प्राप्त विजेता से कम न था किंतु उसके पुरूषार्थ पर भाग्य, दैव, अदृश्य भारी पड़ गया और वह कायनात की साजिश द्वारा नेपथ्य में धकेल दिया गया. जिनके सम्मान में कवि नागार्जुन ने कहा – ‘जो नहीं हो सके पूर्ण-काम, मैं उनको करता हूँ प्रणाम.’

शायद शकील बदायूंनी पूर्णिमा के चकाचौंध में कहीं गुम हो गए चौदहवीं को समुचित सम्मान दिलाने का प्रयास कर रहे हैं.

मेरी नजर में इसका एक तीसरा अर्थ भी है जो कि ज्योतिषिय गणना के आधार पर है. हिन्दू तिथि का संबंध सूर्योदय के समय से संबंधित है. अर्थात सूर्योदय के समय जो तिथि होगी, व्यवहार में काम चलाने के लिए अगले सूर्योदय तक वही तिथि मानी जाती है. पर वास्तिवकता में सूर्य से चन्द्रमा के प्रत्येक 12 डिग्री पर एक तिथि बढ़ती जाती है, जो दिन-रात किसी समय अगली तिथि में जा सकती है.

उदाहरण के लिए मैं खुद की कुण्डली पर विचार करूँ तो मेरा जन्म चौदहवीं के दिन हुआ है क्योंकि उस दिन सुबह सूर्योदय के समय चौदहवीं तिथि चल रही थी. पर वास्तव में जब मेरा जन्म सायं 7:24 में हुआ तब पूर्णिमा तिथि आरंभ हो गई थी. अर्थात उस रात जिसे हम चौदहवीं का चाँद समझ रहे हैं वह अपनी किरणों में पूर्णिमा की प्रखरता धारण किये हुए है.

चूंकि अगले दिन सूर्योदय के समय पूर्णिमा चल रहा होगा, इस कारण इसे पूर्णिमा तिथि माना जाएगा पर सांय को जब हम चन्द्रमा को देखेंगे तब तक प्रतिपदा आ चुका होगा और उसकी रश्मि ढलान पर होगी.

इसका मतलब यह है कि अधिकांश बार जिसे हम चौदहवीं का चाँद समझते हैं वह वास्तव में पूर्णिमा का चाँद होता है. इस अर्थ में देखें तो गीतकार ने अपनी नायिका के लिए सर्वश्रेष्ठ उपमान का चयन किया है.

अब बात करते हैं सावरकर जी के उपमान की जिसमें वे दारका नदी की कांति की तुलना ‘प्रतिपदा के चन्द्रमा’ से करते हैं. इस नदी के तट पर एक छोटा सा ग्राम ‘भार्गव’ है, जो इस संपूर्ण कथानक का केन्द्रबिन्दु है.

‘भार्गव’ बहुत सुख-शांति से अपना जीवनयापन कर रहा था. पर अचानक पुर्तगाली ईसाई धर्मान्धों के अत्याचार से कराह उठा. जो हिन्दू, ईसाई बनने को तैयार नहीं होते थे उनको वे घर सहित जिन्दा जला देते थे.

ऐसे कथानक का आरंभ उसे प्रतिपदा का चन्द्रमा कहकर करते हैं जिसका अर्थ है कि इसका पूर्णिमा व्यतीत हो चुका है और यह लगातार पतन की ओर अग्रसर है. अब वैभव तो दूर की बात है इसे अपने अस्तित्व को बचाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ेगा. इस स्वाभाविक फिसलन की परिस्थितियों के बीच इसे ठहरे रहने के लिए भी लड़ना होगा.

यह एक अद्भुत संयोग है कि सावरकर जी की पत्नी यमुनाबाई सावरकर, जिन्हें माई सावरकर भी कहा जाता है, का जन्म भी प्रतिपदा के दिन ही हुआ था. वीर सावरकर को तो बचपन से ही खोने की आदत पड़ी हुई थी. जब वे मात्र नौ वर्ष के थे तो उनकी माता जी का हैजे की महामारी में देहान्त हो गया. उसके सात वर्ष बाद पिता जी प्लेग के महामारी में गुजर गये.

यमुनाबाई को भी विवाह के बाद लगातार कष्ट झेलने पड़े. उनका बड़ा पुत्र प्रभाकर छोटी उम्र में ही गुजर गया, जब पति लंदन में थे. एक पुत्री शालिनी भी गुजर गई. माता-पिता के लिए संतान वियोग से बढ़कर दूसरा कोई अन्य कष्ट नहीं हो सकता. यह सच है कि लेखक अपनी रचना में अपने जीवन को कहीं न कहीं अवश्य प्रक्षेपित करता है.

1943 के बाद साहित्य में सच्चिदानन्द हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय ने प्रयोगवाद का दौर आरंभ कर दिया था. प्रयोगवादी कवियों ने साहित्य में हर स्तर पर नए प्रयोग किये. इस काल में भाषा की दृष्टि से नए प्रयोग, उपमानों की दृष्टि से नए प्रयोग, शिल्प की दृष्टि से नए प्रयोग और काव्य वस्तु की दृष्टि से नए प्रयोग किये गए.

नए उपमान, नए प्रतीक और नए बिम्बों के प्रति इन कवियों का विशेष मोह जान पड़ता है. पुराने प्रतीकों का जादू और उनकी अर्थवत्ता अब खो गई है, अतः अब नए उपमानों की आवश्यकता है – ऐसी घोषणा अज्ञेय जी ने “कलगी बाजरे की” नामक अपनी कविता में की है : “देवता अब इन प्रतीकों के कर गए हैं कूच. कभी बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है..”

ऐसा बिलकुल हो सकता है कि शकील बदायूंनी ने पचास के दशक में प्रयोगवादी दौर से प्रभावित होकर अपनी गीत में “चौदहवीं का चाँद” नए उपमान का प्रयोग किया हो. पर ये बात हम सावरकर जी के बारे में नहीं कह सकते क्योंकि अज्ञेय का जन्म ही 1911 ई. में हुआ है और सावरकर 1911 ई. से 1921 ई. तक अण्डमान के पोर्ट ब्लेयर जेल में थे. गोमांतक उसी समय की रचना है. इसका मतलब है कि वे प्रयोगवादी समय से बहुत पहले मराठी साहित्य में अनेकों नए प्रयोग कर दिये थे.

उन्होंने सबसे बड़ा प्रयोग तो विषयवस्तु को लेकर ही कर दिया. जिस विषयवस्तु से दूसरे साहित्यकार दूर भागते थे कि उन्हें कहीं साम्प्रदायिक न घोषित कर दिया जाए, सावरकर जी ने उसी विषयवस्तु को अपने संपूर्ण साहित्यिक जीवन का आधार बनाया.

मुक्तिबोध ने कभी कहा था कि साहित्यकार को अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे. सावरकर ने साहित्य साधना के मार्ग में सहर्ष अभिव्यक्ति के खतरे उठायें और आने वाली पीढियों के लिए ऐसी समृद्ध साहित्य की मशाल सौंप गए हैं जिससे युगों-युगों तक क्रांति की लौ सुलगाई जा सकती है.

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