पढ़ना तो यही है : वामपंथियों की कलई खोलती किताबें

वैसे तो दौर नामों के “रसुलिकरण” का है, फलाने ने कहा था इसलिए इसपर सवाल मत करो, चिलाने ने कहा था इसलिए यही आखरी सत्य है जैसे जुमले उछाले जाते रहते हैं. लेकिन इस दौर में भी कुछ लोगों ने “गांधीवाद” या “योग” जैसे शब्द सुने होंगे, उन्होंने कभी ना कभी “अपरिग्रह” शब्द भी सुना होगा. इसका मतलब होता है अपने पास कुछ भी जमा ना रखना, कई साधु इस अपरिग्रह का मतलब जरुरत से ज्यादा दान लेने से इनकार भी लगाते हैं. करपात्री जी अपने हाथों में जितना आये उतनी ही भिक्षा लेते और उस से ज्यादा से इनकार कर देते थे. इसलिए संन्यास लेने के बाद कभी उनका नाम, “कर” यानि हाथों को अपना “पात्र” मतलब बर्तन बना लेना, करपात्री पड़ गया.

आम तौर पर वो संस्कृत और वेदों के जानकार माने जाते हैं, लेकिन उनका अन्य विषयों में भी दखल था. सन 1966 में जब गौरक्षा के लिए आन्दोलन हुआ तो आन्दोलन-प्रदर्शन में आये कई साधुओं को इंदिरा गांधी ने दिल्ली में संसद के सामने गोली मरवा दी थी. उसी आन्दोलन में करपात्री जी भी जेल में थे और कैद के दौर में ही उन्होंने “मार्क्सवाद और रामराज्य” लिखी थी. ये लम्बी-चौड़ी करीब 800 पन्ने की किताब है, घबराइये मत, गीता प्रेस से आती है इसलिए डेढ़ सौ रुपये में आ जाएगी. उस दौर में, यानि 60-70 के दशक में आज जैसा फेसबुक तो होता नहीं था लेकिन बहसें उस टाइम भी होती थी. तो इस किताब से थोड़े समय बाद राहुल संकृत्यायन जी आहत हो गए.

इस से हुआ ये कि राहुल संकृत्यायन जी ने ढूंढ के इसमें से गलतियाँ निकाली और जवाब में लिख डाली “रामराज्य और मार्क्सवाद”. वो एक दुबली पतली सी किताब है, जिसके जवाब में फिर से करपात्रीजी महाराज ने “रामराज्य और मार्क्सवाद पर राहुलजीकी भ्रान्ति” लिख दी.

किताब के नाम में रामराज्य लिखा देखकर अगर आप ये सोच रहे हैं कि ये “संघी” टाइप किताब है तो आपको याद दिला दें कि किसी भी बौद्धिक या धुर दक्षिणपंथी की कभी आर.एस.एस. से नहीं पटती है. राम स्वरुप जी (अरविन्द दर्शन पर लिखने वाले) की, सीताराम गोयल (इतिहासकार) की, यहाँ तक कि राममंदिर के समर्थक कोएनार्ड एल्स्ट (इंडोलोजिस्ट) की भी संघ से नहीं पटी. जैसे अभी के कुछ लोग असहमत हैं, वैसे ही करपात्री महाराज भी आर.एस.एस. से सहमत नहीं रहते थे.

किताब आसानी से स्टेशन की गीता प्रेस वाली दुकानों में मिल जायेगी. ढूंढिए पढ़िए, क्योंकि पढ़ना जरूरी होता है.
– आनंद कुमार

उधर, पिछले दिनों जब एनडीटीवी ने स्यापा मचाया, उसके मुख्य किरदार अरुण शौरी जी ने कम्युनिस्टों की जो कलई खोली है, उन किताबों के पढ़ने का भी समय आ गया है. तो, पढ़ाई की शुरुआत इन दो किताबों से भी की जा सकती है.

नंबर 1 पर है किताब एमिनेंट हिस्टॉरियंस, जिसमें कौमियों के एक-एक झूठ को सबूत और दस्वाजेों के साथ शौरी जी ने दिखाया है. दूसरी किताब है, वर्शिपिंग फॉल्स गॉड्स जो कि उनके इस बार केंद्रीय मंत्री न बनने का एक प्रमुख कारण रहा है.

दोनों किताबे अमेजन पर उपलब्ध हैं और 1000 रुपए के अंदर आ जाएंगी. तो, देर किस बात की……
#पढ़ना_तो_यही_है
– व्यालोक पाठक

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