सिनेमा के बहाने : बंगाल का सिनेमा, संक्षिप्त इतिहास और सौमित्र चटर्जी

saumitra chatterji Legion of Honour

बंगाल का सिनेमा एक समय में भारत का प्रतिनिधि सिनेमा ही था. अतिशयोक्ति तो नहीं पर अब भी यही लगता है कि क्षेत्रीय/राष्ट्रीय की परिभाषा से हटकर और किसी सिनेमा ने वो मुकाम, प्रभुत्व और दर्जा हासिल नहीं किया जो बंगाल के सिनेमा का रहा.

हालांकि, इसके पैरोकार भी सत्यजित रे जैसे निर्देशक ही रहे और फिर बाद में ऋत्विक घटक, मृणाल सेन तक बंगाल का सिनेमा कला सिनेमा का मानक बना रहा. यहाँ बात क्षेत्रीयता की नहीं विशुद्ध रूप से केवल सिनेमा कला के उत्थान में योगदान की है और इस सच को तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि रे के युग ने भारतीय सिनेमा को एक राह दिखाई और जिसका नेतृत्व बंगाली सिनेमा ने ही किया.

पर ये भी उतना सच है कि पिछले कुछ तीन दशकों में जहां बंगाल का सिनेमा खुद अपने ही बनाए हुए मानक से नीचे रहा वहीं तमिल, तेलुगू, मलयालम और मराठी सिनेमा ने भारत के सिनेमाई अतीत को फिर से चमक देना शुरू किया है. हालांकि, सन 1940 से 1960 तक के समय को भारतीय सिनेमा का स्वर्ण युग कहा जाता है जब न केवल बंगाली बल्कि मराठी, मलयालम, तेलुगू, कन्नड़, तमिल और हिन्दी सिनेमा के जुनूनी लोगों ने भारत के सिनेमा को अपनी क्षमताओं से समृद्ध कर दिया.

यही वह दौर था जब भारत आज़ाद हुआ था और सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक विचलन/असमंजस हर जगह व्याप्त था. बंबई का सिनेमा उद्योग हालांकि तब अपने वजूद में आ चुका था और सिनेमा ने अवाम के बीच एक मुकाम हासिल कर लिया था. कलकत्ता से सिनेमा बनाने वाली कंपनियाँ और कलाकार बंबई की ओर रुख कर चुके थे.

ऐसे में यह दौर वाक़ई वो सुनहरा दौर था जब हर कोई बड़ा और अद्भुत रच रहा था. यहाँ सत्यजित रे और ऋत्विक घटक दो ऐसे नाम उल्लेखनीय हैं जिन्होंने बंगाल के सिनेमा को अपना सब कुछ दिया. रे तो फिर भी भाग्यशाली थे जिन्होंने अपने जीते जी ही महानता को हासिल कर लिया पर घटक दुर्भाग्य से अपने समय में हाशिये पर रहे और वो स्थान न पा सके जिसके वो उत्तराधिकारी थे.

बंगाल यूं भी साहित्यिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से समृद्ध था पर एक बात जो इस सिनेमा के पक्ष में जाती है वो ये कि इसे बनाने वालों ने अपनी स्वतंत्र चेतना और विचारों को दमखम के साथ प्रदर्शित किया. मृणाल सेन, तपन सिन्हा, सुचित्रा सेन, उत्तम कुमार, अतनु घोष, माधबी मुखर्जी, सुप्रिया देवी, सुब्रत मित्रा, सौमित्र चटर्जी, अपर्णा सेन, अजॉय कर, बुद्धदेव दासगुप्ता, ऋतुपर्णो घोष आदि तक एक लंबी फेहरिस्त बनती है.

और फिर लेखक, संगीतकार, गायक, निर्देशक आदि जो हिन्दी सिनेमा को समृद्ध कर रहे थे वो अलग. बंगाल का सिनेमा अपने पूरे दमखम के साथ भारतीय सिनेमा का प्रतिनिधित्व करता रहा. विश्व सिनेमा जहां निओ-रीयलिज़्म के प्रभाव में पूरी तरह सिनेमा की नई परिभाषा गढ़ रहा था वही काम रे और घटक ने कलकत्ता और बंगाल की पृष्ठभूमि के प्रभाव में किया.

बंगाल ने जो परंपरा अपने पूर्वजों से पायी और कथा, कविता, संगीत तथा कला में जो बोया उसी बुनियाद के सहारे सिनेमा की नई अवधारणा बंगाली सिनेमा ने पाई. बंगाल की समृद्ध लोक-सांस्कृतिक विरासत अपने भरे-पूरे वातावरण और ‘ग्रिट’ के साथ फ़िल्मकारों के साथ आई.

यहाँ इन फ़िल्मकारों का अपनी मिट्टी से प्रेम और आधुनिकता तथा परंपरा के मेल का उल्लेख ज़रूरी है. पाथेर पांचाली, अपराजितो, अपूर संसार, मेघे ढाका तारा, सुबर्णरेखा, काबुलीवाला, आपनजन, अजान्त्रिक, अशनि संकेत, चारुलता, कलकत्ता 71, मृगया, अकालेर संधाने, चराचर, खारिज, सोनार केला जैसी फ़िल्में बंगाली सिनेमा का खजाना हैं.

बंगाली सिनेमा के बीते की याद का बहाना इस बार सौमित्र चटर्जी हैं. पिछले दिनों ही ये ख़बर आई कि सदाबहार अभिनेता सौमित्र चटर्जी को फ्रांस का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘Legion of Honour’ दिया जाएगा.

सौमित्र चटर्जी उन बिरले अभिनेताओं में हैं जिन्होंने सिनेमा का एक पूरा युग देखा है. आधी सदी से भी ज़्यादा का वक़्त एक युग ही होता है. समय के इस दायरे और सत्यजित रे जैसे निर्देशक ने उन्हें विश्व सिनेमा के पन्नों पर वो जगह दिलाई जहां उनकी उपस्थिति बंगाल के सिनेमा इतिहास के एक अध्याय की तरह है.

पर केवल एक अभिनेता बतौर ही उनका परिचय मुकम्मल नहीं. रंगमंच पर भी सौमित्र उतनी ही शिद्दत और तल्लीनता से सक्रिय रहे और इस तरह अभिनय उनके लिए कर्म का वो सबक है जिसके बगैर उनके अस्तित्व की कल्पना नहीं. सिनेमा और रंगमंच पर समान रूप से सक्रिय सौमित्र विश्व के उन बिरले अभिनेताओं में हैं जिनसे अभिनय कला ही समृद्ध हुई है और निश्चय ही भारत का सिनेमा जिस पर गर्व कर सकता है.

हिन्दी पट्टी के लोग सौमित्र से उतना परिचय नहीं रखते होंगे पर बंगाल का कला जगत उन्हें सर आंखों पर ही रखता है. सत्यजित रे जैसे फ़िल्मकार के लिए सौमित्र कितने अहम हैं ये तभी पता लग जाता है जब उनकी छत्तीस फ़िल्मों में से 14 के अभिनेता सौमित्र ही रहे.

‘अपूर संसार’ के बड़े हो चुके अपू की भूमिका से शुरुआत करते हुए सौमित्र की अभिनय यात्रा रे के सिनेमाई संसार में तारे की तरह चमकती रही. खासतौर से मैं ‘अरण्येर दिन रात्रि’ और ‘चारुलता’ का ज़िक्र करना चाहूँगा. ख़ास तरह की मौलिकता और विचारधारा वाली ‘अरण्येर….’ एक कमाल की फ़िल्म है और सौमित्र द्वारा अभिनीत किरदार आशिम बहुत भीतर की यात्रा करता है.

किरदार के भीतरी द्वंद्व और असहजता को निभाना आसान नहीं. ऐसे में अभिनेता किरदार की आत्मा को किस तरह ओढ़ता है और खासकर उस किरदार में जहां बहुत गुंजाइश नहीं होती, उसका यह एक अद्भुत उदाहरण है. बहुत ही सहजता से सौमित्र अपने दोस्तों के उस दल का हिस्सा बने हैं जो केवल कुछ दिन छुट्टियाँ बिताने शहर से दूर जाते हैं.

‘चारुलता’ में अमल के रूप में सौमित्र की रूमानियत दिलकश है. चारुलता का ज़िक्र इसलिए भी ज़रूरी है क्यूंकि कहानी और अपने पूरे प्रभाव के रूप में चारु बनी माधबी मुखर्जी के आसपास भी सिनेमाई इतिहास का कोई किरदार नहीं ठहरता. उस पर खुद रे इसे अपनी सबसे दक्ष और सम्पूर्ण फ़िल्म मानते हैं. जिसने भी ‘चारुलता’ देखी है उसके लिए मुग्ध होने के सिवा और कुछ नहीं बचता.

यहीं अमल बने सौमित्र ख़ामोशी से चारु के जीवन में प्रवेश करते हैं और उतनी ही ख़ामोशी से निकल भी जाते हैं. यह कहना भी कम ही होगा कि चारुलता के बहाने ही सौमित्र के जीवन में सिनेमा की वह रीलें आई हैं जिनमें अद्भुत एस्थेटिक्स और अदाकारी है. और यह उनकी खुशनसीबी ही है कि रे एक चमत्कार की तरह उनके जीवन में घटित होते हैं.

तोशिरो मिफ़्यून-अकीरा कुरोसावा, रॉबर्ट डी नीरो-मार्टिन स्कोर्सिज़ी, मार्सेलो मस्त्रोजनी-फ़ेद्रिको फेलिनी जैसी विश्वविख्यात अभिनेता-निर्देशकों की जोड़ी की तरह वे भी रे के फेवरेट बने रहे. हालांकि, अन्य फ़िल्मकारों के साथ भी सौमित्र ने फ़िल्में की हैं जिनमें मृणाल सेन की ‘आकाश कुसुम’, तपन सिन्हा की ‘क्षुधित पाषाण’, अजॉय कर की ‘सात पाके बंध’, तरुण मजूमदार की ‘जनदेवता’, असित सेन की ‘स्वरलिपि’ आदि प्रमुख हैं. सिनेमा में अभिनय का आसमान तय करना आसान नहीं. दर्शक के दिलों में उतरना और गहरे बैठना तो और भी मुश्किल है. सौमित्र चटर्जी शायद इतिहास बनाने ही आए थे, ऐसा लगता है !

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