भीष्म-द्रौपदी संवाद : कृष्ण तो आज भी मुस्कुरा रहे हैं!

महाभारत युद्ध की समाप्ति के पश्चात बाणों की शर-शय्या पर लेटे भीष्म पितामह को देख पांडव शोकातुर थे, जबकि पितामह हमेशा की तुलना में ज़्यादा प्रसन्न मुख….!! भगवान श्री कृष्ण ने पांडवों को कुशल राज- काज संचालन के लिए पितामह से नीति सीखाने का निवेदन करने के लिए प्रेरित किया.

युधिष्ठिर दुविधा में थे कि इतने कष्ट से विह्वल पितामह से क्या पूछे..! ये तो स्वार्थपरता की पराकाष्ठा समझी जाएगी…. पर परमभक्त पितामह के हृदय में बसने वाले भगवान से प्रेरणा पाकर भीष्म ने पांडवों को स्वयं सम्बोधित करते हुए नीति के गुह्यतम सिद्धांतों के विषय में विमर्श किया.

पितामह का सम्बोधन जारी ही था कि सौभाग्यवती नारियों में परम अग्रणी महारानी द्रौपदी के ज़ोर से हँसने की आवाज़ आयी! संकोचवश सबने मौन रखा और पितामह ने पुनः उपदेश देना शुरू किया. अचानक द्रौपदी के फिर से हँसने की आवाज़ सुन पितामह को उसमें थोड़ा अपमान का पुट लगा. कृष्ण मुस्कुरा रहे थे और पांडव द्रौपदी के इस व्यवहार पर थोड़ा लज्जित महसूस कर रहे थे. द्रौपदी को टोकने का साहस फिर भी कोई ना कर सका और भीष्म ने पुनः बोलना शुरू किया.

पर ये क्या…. कुछ समय पश्चात द्रौपदी की हँसी ने तीसरी बार ज्ञान- गंगा के प्रवाह में हस्तक्षेप किया. पितामह थोड़ा आक्रोशित होकर बोले- “तुम इतने बड़े कुल की वधु हो. मायक़े से लेकर ससुराल तक की अनेकानेक ज्ञानसभाओं में तुमने अपने विद्वता का परिचय दिया है.

भारतमंडल का विद्वत समाज तुम्हारी ज्ञान प्रतिभा लोहा मानता है. हे कृष्णा! स्वयं कृष्ण तुम्हें मान देते हैं, फिर ज्ञान- परिचर्चा के इस वातावरण में ऐसा अशोभनीय आचरण क्यूँ..? मैं जानता हूँ, तुम्हारा कोई कर्म अकारण नहीं हों सकता. मैं पांडवों की तरह तुम्हारे इस आचरण पर क्षुब्ध नहीं, अपितु जिज्ञासु हूँ, कृपया उत्तर दो.

और द्रौपदी ने एक पंक्ति में कह दिया- “मान्यवर आपके मुख से ये ज्ञान गंगा उस दिन क्यूँ ना निकली जब भरे दरबार में इसी कुलवधू पर इतिहास और पूर्वजों को लज्जित करने वाला भीषण अन्याय हुआ? उस समय क्यूँ ना निकली जब आपके इन्ही प्रिय पांडवों पर एक के बाद एक अत्याचार होते रहे और सब जानते हुए भी आप मूक रहे! बस जब – जब आप अपने आज के ज्ञान प्रवाह में “स्त्री- रक्षा”, ” निर्बल- हित”, “सत्य के प्रति न्यायपूर्ण” जैसी नीतियों का वर्णन कर रहे हैं, मैं मंदमति अपने इस रोषपूर्ण और अवसादयुक्त हास्य को रोकने में असमर्थ पा रही हूँ.

निस्तब्ध रह गए पांडव और भावुक हो गए जीवन भर दृढ़ता का आवरण ओढ़े भीष्मपितामह. कृष्ण अभी भी मुस्कुरा रहे थे. और जो उत्तर दिया है भीष्म पितामह ने, वहीं आज भी हमारे समाज में होने वाली अनेक प्रकार की अनीतिपूर्ण घटनाओं के प्रति पर्याप्त कार्यवाही ना हो सकने का भी कारण हैं। पितामह ने कहा-

भद्रे !जो नीति मुझे आज याद है वो तब भी याद थी जब तुम सबके साथ समस्त अन्याय हो रहा था.. पर तब सब प्रकार का सामर्थ्य होते हुए भी मैं असमर्थ और अक्षम था और आज असहाय होते हुए भी सामर्थ्यशाली… जानती हो क्यूँ?

क्यूँकि-
1. तब मैं कुशासन में लिप्त राजा का वेतनभोगी कर्मचारी मात्र था…

2. तब मेरे शरीर में अन्याय युक्त संचालित राज्य से अर्जित जीविका का अन्न था….

3. तब मेरी शारीरिक शक्ति, मानसिक बुद्धि और आत्मिक चेतना तीनों अधर्म के पराधीन थे.

आज तुम्हारे पति के धर्मपूर्ण बाणों ने वो अधर्म का रक्त निकाल दिया है. आज का राज्य धर्मशिरोमणि युधिष्ठिर के हाथो में है. पुत्री याद रखना-

1. “जब तक अर्जित आजीविका का स्त्रोत और उस से प्राप्त अन्न शुद्ध नहीं- वाणी, विचार और आचरण कभी शुद्ध नहीं हो सकते.”

2. जब तक राज्य का राजा धर्मसम्मत, शास्त्र सम्मत- नीतिपरक, स्वार्थहीन और शाकाहारी- सदाचारी ना होगा, प्रजा सदैव प्रकृतिक और सामाजिक आपदाओं से घिरी रहेगी.

कुछ ग़लत तो ना कहा भीष्म पितामह ने!

माँसभक्षण और मदिरापान करने वाली राजा और प्रजा से तो स्त्री, समहितकारी व्यवहार की उम्मीद नहीं की जा सकती!

“जैसा होगा अन्न, वैसा होगा मन”
कृष्ण तो आज भी मुस्कुरा रहे हैं.

बाक़ी अगर पश्चिम का ही अनुकरण करना है तो सबके लिए एक जैसे डंडे की भाषा स्वीकार करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए.

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