अग्नि : देह से परे, दृष्टि से ओझल, अथाह प्रेम से सज्जित

अग्नि तो बस अग्नि होती है,
फिर चाहे यज्ञ की हो या विरह की,
द्रौपदी भी उत्पन्न कर सकती है और
धृष्टद्युम्न भी,
विनाश का कारक भी हो सकती है,
और धर्म की स्थापना का निमित्त भी…

स्वर्ण को शुद्ध भी कर सकती है
और देह को भस्म भी,
भौतिक को फिर भूत कर सकती
और पाणिग्रहण की रस्म भी…

क्रोधाग्नि हो तो साधु को भृगु बना दे,
वैश्वानर होकर पांचों अन्नों को पचा दे,

हाँ, अग्नि ही जीवन है,
पंच महाभूतों में गहन है,
जीवन का आधार है,
अनाहत है, मूलाधार है…

प्रसन्न हूँ अग्नि का यह नवरूप देख मैं,
हृदय से तपकर प्रकटते हुए वाक् वेग में,
विरह की अग्नि इतनी सुंदर भी होती है,
अस्तित्व को स्पष्ट कर दे भाव संवेग में…

है स्वर्ण! तुम्हारी सिद्धि एवं प्रसिद्धि के लिए,
मेरे हृदय में यह पवित्र अग्नि सदा रहेगी प्रज्वलित,
जन्मों जन्मों, युगों युगों, काल और अंतराल में,
देह से परे, दृष्टि से ओझल, अथाह प्रेम से सज्जित.

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