बलिदान दिवस : खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

रानी लक्ष्मीबाई को 1851 में पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी. दुर्भाग्यवश चार माह बाद ही पुत्र का देहावसान हो गया. महाराज का स्वास्थ ठीक नहीं होने के कारण रानी ने दामोदर राव को दत्तक पुत्र लेकर राजकाज संभालना शुरू कर दिया.

पुत्र गोद लेने के अगले दिन ही उनके पति का निधन हो गया. अंग्रेजों ने इसे अपने लिये सुअवसर माना. उन्होंने दत्तक पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया. उन्होंने झांसी को पत्र भेजकर चेतावनी दी कि अब झांसी पर ब्रिटिश झंडा लहरायेगा.

रानी लक्ष्मीबाई यह पत्र पढ़कर क्रोध से भर गयीं. उन्होंने दरबार में खुलेआम घोषणा की कि ‘मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी’ …इसी के साथ उन्होंने युद्ध की तैयारी शुरू कर दी. हथियार, तोप-गोले और तलवार-भाले के लिये खजाना खोल दिया. किलेबंदी कर किले की प्राचीर पर तोपे तैनात कर दी.

अंग्रेज सेना ने किला जीतने के लिये हमला कर दिया. अंग्रेजी तोपे 8 दिन तक किले पर गोले बरसाती रही, किंतु वे किला नहीं जीत सके. अंग्रेज सेनापति ह्यूरोज रानी के युद्ध कौशल को देखकर चकित रह गया. तब उसने षड़यंत्रपूर्वक झांसी के एक विश्वासघाती सैन्य सरदार दूल्हासिंह को अपनी ओर मिला लिया. उसने किले का दक्षिणी द्वार खोल दिया. इस धोखे से रानी क्रोधाग्नि मे जल उठी.

अपने पुत्र को पीठ पर बांधकर तलवार ले वह अंग्रेज सेना पर टूट पड़ी…”जय भवानी”..”हर हर महादेव” के उद्घोष से युद्ध भूमि गूंज उठी… किंतु रानी की सेना छोटी थी… वह शत्रुओं से घिर गयी… एक गोली उनके पैर में लग गयी… वे कुछ साथियों की सलाह पर कालपी की ओर बढ़ने लगी.

रानी ने सिंधिया राजवंश से भी सहायता मांगी पर सिंधिया राजवंश ने उन्हें किसी प्रकार की सहायता देने से इंकार दिया. वे ग्वालियर से आगे बढ़ी किंतु घायल होने ओर रास्ते में नाला आने के कारण वे अंग्रेज घुड़सवार सेना से घिर गयी.

घायल रानी ने अकेले अंग्रेज घुड़सवार सेना का सामना किया. एक अंग्रेज सैनिक ने धोखे से रानी के सिर पर पीछे से वार किया. रानी के सिर का दाहिना भाग कट गया. उनकी एक आंख बाहर निकल आयी. उसी समय दूसरे सैनिक ने संगीन से उनके ह्रदय पर वार किया. बेहद घायल होने और लगातार रक्त बहने के बाद भी रानी लगातार तलवार चलाती रही. उन्होंने  उन दोनो अंग्रेज सेनिकों का वध कर दिया जिन्होंने उन पर धोखे से वार किये थे. उनका यह रौद्र रूप देखकर बाकि के अंग्रेज सेनिक डरकर भाग गये.

स्वामीभक्त रामाराव देशमुख अंत तक रानी के साथ थे… उन्होंने रानी के खून से लथपथ शरीर को समीप की बाबा गंगादास की कुटिया मे पहुंचाया. रानी को असहनीय वेदना हो रही थी.. किंतु उनके मुख पर वीरता की कांति दमक रही थी. बाबा गंगादास ने उन्हें जल पिलाया. तब उन्होंने अपने पुत्र को अंतिम बार देखा और अपने नैत्र सदा के लिये बंद कर लिये. वह 18 जून 1858 का दिन था.

उसी कुटिया में उनकी चिता बनाकर उनके पुत्र दामोदर राव ने मुखाग्नि दी. रानी का शरीर पंचमहाभूतों में विलीन हो गया… पर वे भारत के गौरवमय इतिहास में सदा के लिये अमर हो गयी.

“खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी”

-सुभद्राकुमारी चौहान

‘बलिदान दिवस’ पर सादर नमन्…

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