भारतीय उपमहाद्वीप में क्रिकेट का इतिहास : भाग-3

क्रिकेट में इतना भ्रष्टाचार क्यों है?

क्रिकेट अंग्रेजों का खेल था. भारत में इसकी शुरुआत अंग्रेजों की चाटुकारिता के लिए हुई.

जब दो अंग्रेज टीमें मैदान में आमने सामने होतीं तो मैच कांटे का होता था. पर यदि मैच हाकिम और गुलाम के बीच होता तो चापलूसी में बदल जाता था. गुलामों की टीम हाकिम को खुश करने के लिए खेलती थी.

इतिहास में एक क्रिकेट मैच का ज़िक्र मिलता है जहां पटियाला की शाही टीम का मैच नाभा की रॉयल टीम से चल रहा था. पटियाला की टीम के कप्तान खुद महाराजा भूपेंद्र सिंह थे.

[भारतीय क्रिकेट का इतिहास : भाग-2]

वर्तमान में आज जहां पटियाला के YPS मने Yadvendra Public School का स्टेडियम हैं किसी ज़माने में वहीं पटियाला का क्रिकेट स्टेडियम हुआ करता था. इसी के बगल में पोलो ग्राउंड था जो आज पंजाब के खेल विभाग के पास है.

[भाग-1 : सिर्फ अंग्रेजों के पट्टाधारी ग़ुलाम मुल्क और कौमें ही खेलती-देखती हैं क्रिकेट]

तो पटियाला का मैच नाभा से था. नाभा पटियाला की तुलना में छोटी और गरीब रियासत थी. उसकी औकात नही थी कि पटियाला को ‘हरा’ सके.

उस ज़माने में friendly matches में टॉस नहीं होता था. बड़ा राजा या हाकिम फैसला करता था कि पहले बैटिंग कौन करेगा.

उस मैच में ज़ाहिर सी बात है कि महाराजा पटियाला भूपेंद्र सिंह बैटिंग करने उतरे. भूपेंद्र सिंह डेढ़ क्विंटल के हाथी जैसा पेट लिए हुए लदभोसर आदमी थे. खड़े-खड़े सिर्फ चौका छक्का मारते थे.

उनके बस में नहीं था कि भाग के रन ले लें. सो रनर ले के खेलते थे. गेंदबाज उनको जान बूझ के ऐसी गेंद फेंकते कि महाराज उसपे चौका या छक्का मार सकें.

पर महाराज इतने लदभोसर थे कि उनसे कायदे से बल्ला ही नही उठता. कभी क्लीन बोल्ड हो जाते तो कभी कैच उछाल देते. पर अम्पायर और फील्डर इतने वफादार कि फील्डर कैच छोड़ देते और क्लीन बोल्ड होने पे अम्पायर नो बॉल दे देता.

महाराज शॉट खेलते तो फील्डर जान बूझ के मिस्फील्ड करते कि चौका हो जाये. कई बार शॉट इतना कमजोर होता कि गेंद बाउंडरी के पास जा के रुक जाती… तो फील्डर जान बूझ के पैर मार के गेंद बाउंडरी के बाहर कर देता.

भारत मे क्रिकेट की शुरुआत इसी मूल चरित्र के साथ हुई और सालों तक क्रिकेट ऐसे ही खेला जाता रहा. बाद में जब आज़ादी मिली तो निश्चित रूप से खेल का स्वरूप बदला पर बेईमानी यानी फिक्सिंग उसका मूल चरित्र बन चुका था.

ट्रेनिंग से आप चीजों को सुधार सकते हैं पर रह-रह के मूल चरित्र तो सामने आएगा ही. इसीलिए क्रिकेट में ये मैच फिक्सिंग का नाग रह-रह के फन उठाता रहता है.

इसी लिए भारतीय उप महाद्वीप में क्रिकेट का खेल जी-हुजूरी, चाटुकारिता और मैच फिक्सिंग का खेल है. आजकल खेलने वाले तो चलो इसलिए खेलते हैं कि उनको पैसा मिलता है. सवाल है कि इस फ़र्ज़ी गेम को देखते कौन लोग हैं?

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