स्वेतलाना और सोनिया : देश की ‘बहुओं’ के साथ कांग्रेस का भेदभाव

2004 में लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाने की पूरी तैयारियां हो चुकी थी. विदेशी मूल का होने पर भी कांग्रेस देश के सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री पद पर सोनिया को आसीन कराना चाहती थी यह कहकर कि वे पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पत्नी है और इंदिरा गांधी के साथ सारे देश की भी बहू है.

सभी तैयारियां पूरी हो चुकी थी पर सुषमा स्वराज और उमा भारती के नैतिक विरोध के चलते उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ नहीं ली. पर वे दल की सर्वोच्च नेता बनी रही और वे दस साल तक अपने पसंद के व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाकर पूरे दल और देश पर अपनी पकड़ बनाये रही.

जनता ने भी उनको समर्थन दिया क्योकि ये उस दल का आंतरिक मामला था और सोनिया सच में देश की ‘बहू’ थी और यदि वे प्रधानमंत्री पद की शपथ भी ले लेती तो उसमें कुछ भी असंवैधानिक नहीं था, पर अतीत में इसी दल की सरकार ने एक ऐसी ‘बहू’ के साथ अन्याय किया और उसे देश से निकलने पर मजबूर कर दिया जो दुनिया की एक “सुपर पावर” के सबसे “शक्तिशाली राजनेता” की बेटी थी.

उत्तर प्रदेश राज्य के प्रतापगढ़ की चर्चा रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया के चलते समय समय पर पूरे देश में होती रहती है, लेकिन यह शहर सिर्फ राजा भैया के कारण ही पूरे देश मे प्रसिद्ध हुआ हो ऐसा नहीं है. ये शहर अपने में तमाम कहानियां समेटे हुए है. कुछ कहानियां तो इतनी रोचक हैं कि देश की सीमाओं के बाहर भी उनकी चर्चा होती थी.

इन्हीं कहानियों में एक प्रेम कहानी कालाकांकर प्रतापगढ़ के राजकुमार ब्रजेश सिंह की है. इस प्रेम कहानी ने साठ के दशक में देश में भूचाल ला दिया था. देश की संसद में इस प्रेम कहानी से उपजे संकट पर चर्चा हुई थी. रूस के तानाशाह स्टालिन की बेटी Swetlana Allilujewa और बृजेश सिंह की प्रेम कहानी ने भारत, रूस और अमेरिका के राजनीतिक व कूटनीतिक संबंधों में तनाव पैदा कर दिया था.

कालाकांकर राजघराने के बृजेश सिंह काफी पढ़े-लिखे, आकर्षक और सौम्य थे, जो भारत के बड़े कम्युनिस्ट नेताओं में से एक थे. देश की आजादी की लड़ाई में उन्होंने ज़ोर-शोर से हिस्सा लिया था. उनके भतीजे दिनेश सिंह केंद्र सरकार में मंत्री रहे थे.

उनके बारे में बताते हुए प्रतापगढ़ के बुज़ुर्ग छवि नारायणसिंह कहते हैं- ‘हम लोगों के जवानी के दिनों में ब्रजेश सिंह हमारे आदर्श हुआ करते थे. बिल्कुल गोरे-चिट्टे, सूट-बूट पहनने और धाराप्रवाह अंग्रेज़ी बोलने वाले ब्रजेश बहुत सहज थे. उस ज़माने में अंग्रेज़ों को छकाने वाले उनके क़िस्से हर क्रांतिकारी गाया करता था. कहा जाता था कि उन्हें अंग्रेज़ी हुकूमत ने काला पानी की सजा दे दी थी पर जिस पानी के जहाज़ से उन्हें भेजा जा रहा था चकमा देकर वे उससे निकल गए थे. वे युवाओं को खूब पसंद करते थे और हम लोगों से जब भी बातचीत होती थी तो बहुत जोश भरा करते थे.’

ब्रजेश सिंह एक बार बीमार पड़े तो अपना इलाज कराने रूस गए थे जहां उनकी मुलाकात स्टालिन की बेटी स्वेतलाना से हुई. ब्रजेश को स्वेतलाना से प्रेम हो गया. हालांकि तत्कालीन सोवियत सरकार ने उन्हें शादी की अनुमति नहीं दी. पर उन्होंने सरकार की परवाह न करते हुऐ गुप्त रूप से शादी कर ली थी.

दुर्योग से ब्रजेश सिंह की 31 अक्टूबर, 1966 को मॉस्को में मौत हो गई. स्वेतलाना ने हिंदू रीति से उनका अंतिम संस्कार किया. वे उनकी अस्थियां गंगा में प्रवाहित करना चाहती थी. लेकिन सोवियत प्रधानमंत्री ‘ऐलेक्सी कोसिगिन’ ने उन्हे बताया कि वे भारत न जाये क्योंकि कट्टर हिंदू विधवाओं को मृत पति के साथ ही जिंदा जला देते है पर स्वेतलाना अपने पति की अस्थियां गंगा में प्रवाहित करने भारत आईं. वे उनके असामयिक निधन से बहुत आहत थीं और भारत आकर बसना चाहती थीं. स्वेतलाना ने कालाकांकर में गंगा के किनारे रहने की बात भी कही थी. एक साक्षात्कार में स्वेतलाना ने कहा कि उन्होंने ब्रजेश सिंह से शादी की थी.

स्वेतलाना के कालाकांकर आने की खबर 20 मार्च 1967 में न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी थी. उन दिनों सोवियत संघ में स्टालिन की आलोचक ख्रुश्चेव की सरकार थी और वह न सिर्फ़ स्टालिन के परिवार को प्रताड़ित कर रहा था बल्कि उनका नामोनिशान मिटाने पर तुला था. लेकिन तब भारत की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने स्वेतलाना को भारत में बसने देने का विरोध किया क्योकि उन्हें सोवियत संघ की नाराज़गी का डर था.

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने चुप्पी साध ली वे कुछ नहीं बोलीं जबकि दिवंगत ब्रजेश सिंह के भतीजे और कांग्रेस के बड़े नेता दिनेश सिंह ने स्वेतलाना से कहा कि अगर सोवियत संघ सरकार इजाज़त दे तो भारत सरकार भी उन्हें इजाज़त देगी यानी परोक्ष रूप से इनकार. हालांकि स्वेतलाना तब राम मनोहर लोहिया से मिलीं. लोहिया ने स्वेतलाना के पक्ष में संसद में भाषण दिया. वे इस बात से दुखी थे कि भारत ने अपनी बहू को ठुकरा दिया है. हालांकि लोहिया को अपने प्रयासों में सफलता नहीं मिली और स्वेतलाना को भारत छोड़ना पड़ा.

स्वेतलाना ने दिल्ली से ही अमेरिका में शरण लेने की ठानी. सोवियत संघ ने भारत से इसका कड़ा विरोध जताया. स्वेतलाना सबको चकमा देकर अमेरिकी दूतावास में चली गईं, पर तब तक दूतावास बंद हो चुका था, तब स्वेतलाना ने ड्यूटी पर तैनात अधिकारी को बताया कि वह कौन है. तब अमेरिकी राजदूत ‘बॉवल्स’ को रात को ही आना पड़ा. अमेरिका उस समय सोवियत संघ से भागे हर व्यक्ति को शरण देता था. स्वेतलाना को वहां से सुरक्षित अमेरिका पहुंचा दिया गया.

अमेरिका पहुंचकर स्वेतलाना ने कालाकांकर में ब्रजेश की स्मृति मे अस्पताल का निर्माण कराने का निश्चय किया. उनका उद्देश्य था कि ब्रजेश सिंह स्मारक चिकित्सालय में गरीबों का अच्छे से अच्छा इलाज हो सके. इसके लिए उन्होंने बहुत सारे पैसे भेजे. साहित्यकार सुमित्रा नंदन पंत और महादेवी वर्मा जैसे लोगों ने अस्पताल का उद्घाटन किया था. उस समय यह इलाके का सबसे आधुनिक अस्पताल था. इसके लिए विदेशों से उपकरण मंगाए गए थे. हालांकि एक दशक बाद यह बंद हो गया. फिलहाल अब अस्पताल की जगह इस इमारत में कोई निजी स्कूल चल रहा है.’

अमेरिका पहुंचने पर पूरे अमेरिकी मीडिया में वो छा गयी. उनकी बायोग्राफी लिखने के लिये उन्हें उस जमाने में 25 लाख डॉलर मिले, लेकिन सरल ह्रदय स्वेतलाना ने बहुत सारी राशि दान कर दी और कुछ राशि अपनी ही तरह आये हुऐ सोवियत शरणार्थियो के लिये खर्च कर दी.

अंतिम समय मे वे आर्थिक बदहाली मे थी. स्वेतलाना ने चार शादियां की थीं. आखिरी शादी उन्होंने विलियम पेट्रास से की थी. 22 नवंबर, 2011 को स्वेतलाना की मृत्यु हो गई. उनकी मृत्यु की खबर भारतीय मीडिया और अखबारों में बेहद छोटे से कॉलम में छपी. स्वेतलाना की बेटी ओल्गा पोर्टलेंड मे रहती है जबकि उनके बेटे जोसफ की मृत्यु 2008 में ही हो गयी थी.

पहले और दूसरे चित्र मे स्वेतलाना क्रमश: अपने पिता स्टालिन और पति ब्रजेश सिंह के साथ तीसरे चित्र मे इंदिरा अपनी बहू सोनिया के साथ.

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