स्वतंत्रता आंदोलन में संघ के योगदान पर सवाल उठाने से पहले ये तो जान लीजिए

संघ के विरोधी अक्सर एक प्रश्न उठाया करते हैं कि संघ का स्वतंत्रता आंदोलन में क्या योगदान था? और यदि संघ के विरोधियों की बात करें तो पहला नाम कांग्रेस का ही आता है. इस पार्टी के वर्तमान तारणहार और स्वयं को भविष्य का प्रधानमंत्री मानने वाले राहुल गाँधी एक निश्चित समय अंतराल के बाद यह प्रश्न खड़ा करके अपनी कॉलर ऊँची कर लेते हैं.

पर इसमें राहुल की भी गलती नहीं है… क्योंकि उन्हें यही लगता है कि जिस पार्टी की स्थापना ए. ओ. ह्यूम ने 1885 में की थी वे उसी पार्टी के वर्तमान उपाध्यक्ष हैं. हालाँकि यह गलतफहमी उनके अलावा और भी बहुत लोगों को है.

नहीं समझे तो इसे कुछ इस प्रकार से समझें –

कांग्रेस पहले एक पब्लिक लिमिटेड संस्था थी जिसे गाँधीजी ने उसे पब्लिक-प्राइवेट- पार्टनरशिप के तर्ज पर उसकी कमान अपने हाथों में ली. अब वे अँगरेजों से खूब लड़े, बाद में इस लड़ाई में नेहरू जी कूद गये और फिर दोनों ने मिलकर चाणक्य-चंद्रगुप्त के तर्ज पर अँगरेजों के दो सौ वर्षों से चले आ रहे निरंकुश शासन को जड़ से उखाड़ फेंका.

तब गाँधी जी ने कहा था कि अब इस कम्पनी को बंद करते है लेकिन नेहरू नहीं माने… बाद में नेहरू ने इस पार्टनरशिप फर्म के सभी शेयर खुद के नाम करके एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनायी, जिसकी वर्तमान मालकिन सोनिया गांधी हैं.

ये किस हक से देश की आजादी का श्रेय ले सकते हैं? और इन्हें क्या हक है संघ से जवाब माँगने का?

एक और बात जो इनके द्वारा पूछी जाती है कि संघ के कितने नेताओं ने देश के लिए शहादत दी है?

तो अपनी देशभक्ति को साबित करने के लिए क्या शहादत देने की शर्त अनिवार्य थी? यदि ऐसा है तो क्या आप आज़ादी के वक्त तक जिन्दा बचे गांधी-नेहरू या अन्य कांग्रेसियों को देशभक्त कहना बंद कर देंगे?

नहीं ना… फिर क्यों अपनी भद्द पिटवाते हो ऐसा कहकर?

रही बात संघ की तो, संघ है क्या… संघी कौन है… जब तक ये बातें आपके दिमाग में नहीं घुसेगी तब तक ऐसे ही वाहियात प्रश्न पूछते रहेंगे.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना भले ही आजादी के मात्र बाईस वर्ष पहले 1925 में हुई हो परंतु जिस बुनियाद पर इसकी नींव रखी गई थी वो बुनियाद सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों सालों की है.

हृदय में राष्ट्रप्रेम उमड़ता रहता था जिसका वो संघी था, माँ भारती की रक्षा के लिए स्वयं को न्यौछावर करने वाला हर नौजवान संघी था… परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ी भारत माता को स्वतंत्र कराने का बीड़ा उठाने वाला हर वो आजादी का मतवाला जिसने इस यज्ञ में स्वयं को आहूत कर दिया वो संघी था… कितनी गिनतियाँ करेंगे?

संघ जिसे स्वतंत्रता संग्राम की पहली सुनियोजित लड़ाई कहता हैं उसे तुम सिपाही विद्रोह कहते हो?… म्युटिनी कहते हो? शर्म करो कुछ. उन अँगरेजों की भाषा बोलते हो जो इस लड़ाई को षड्यंत्र के तहत “गदर” कहते थे?

अरे तब तो कांग्रेस भी नहीं थी, इस संग्राम के बाद तो अँगरेजों की चूलें हिल गई थी, फिर उन्होंने ही लंबे वक्त तक राज करने के लिए कांग्रेस को पैदा किया था.

सन 1883 में ए. ओ. ह्यूम को लंदन बुलाकर वहाँ के सांसदों ने जब उससे विचार विमर्श किया, तब यह तय हुआ था कि एक ऐसी अखिल भारतीय संस्था बनाने की जरूरत है जिससे उनका स्वार्थ सिद्ध हो और फिर 1885 में कांग्रेस बनी थी.

इसमें उन्हीं भारतीयों को रखा गया था जो अँगरेजों के पिठ्ठू हों, अँगरेजीदां हों, उनकी बातें मानने वाले हों. ये लोग कौन थे? गोखले, नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, व्योमेश बनर्जी, बदरूद्दीन तैयबजी… ( लिस्ट लंबी कर लें)…

कांग्रेस की स्थापना का मुख्य उद्देश्य तो आपने इतिहास में लिखा ही नहीं, कि वह कोई स्वतंत्रता के लिए बनाई गई पार्टी नहीं थी बल्कि अँगरेजों की दलाली करने वालों की पार्टी थी… ताकि भारतीयों द्वारा किए जा रहे विद्रोहों को दबाया जाये.

इतिहास की बात चली है तो आपको बता दूँ कि 1857 की युगांतकारी घटना से लेकर अगले पचास सालों तक के स्वतंत्रता संग्राम को कई अंग्रेज लेखक एवं इतिहासविदों ने अपने-अपने हितों को ध्यान में रखकर.. लेखों-ग्रंथों में इस संग्राम के बारे में कई तरह की गलतफहमियाँ एवं भ्रम पैदा कर इसे इतिहास की कलंकित एवं महत्वहीन घटना के रूप में खपाने का प्रयास किया था.

परंतु इस कलंक को धोया था विनायक वीर सावरकर के अत्यंत ही प्रामाणिक एवं महत्वपूर्ण ग्रंथ The Indian war of independence -1857 ने जो 1909 में हालैंड में पहली बार प्रकाशित हुआ था.

आप जानकर हैरान हो जाएंगे कि यह विश्व की पहली पुस्तक है जिसे अंग्रेजी सरकार ने इसकी पाण्डुलिपि सहित प्रतिबंधित कर दिया था. बाद में 1928 में शहीद भगतसिंह ने इसे छपवा कर गुप्त रूप से वितरित किया था. वे स्वयं इसकी दो प्रतियाँ लेकर सावरकर को भेंट करने रत्नागिरी गए थे जहाँ उन्हें नजरबंद रखा गया था.

परंतु हुआ क्या? इतिहास के तमाम तथ्य और सत्य बाहर आने के बाद भी हमारे यहाँ के विद्वान एवं इतिहासकार, अँगरेजों द्वारा स्थापित मान्यताओं को ही दोहराते रहे, वे अपने पूर्वाग्रहों से बाहर नहीं निकल सके.

यही हाल स्वतंत्रता मिलने के बाद भी हुआ था जब इतिहासकारों की नई पौध इस उत्तराधिकार को पूरी जिम्मेदारी के साथ निर्वहन करके खुश होती रही थी.

अँगरेजों से स्वतंत्रता मिली थी या सत्ता हस्तांतरण हुआ यह विषय विचारणीय हो सकता है… परंतु संघ के लोग तो 1961 तक अपनी आहुतियाँ देते रहे थे जब गोवा को पुर्तगालियों से मुक्त कराने के लिए 30 स्वयंसेवकों ने अपनी जान दी थी.

आजादी से पहले वामपंथियों एवं कांग्रेसियों ने कितने स्वयंसेवकों को पकड़वाया था इसकी कोई गिनती नहीं है.

संघ संस्थापक डॉ हेडगेवार के असहयोग आंदोलन के दौरान कारावास की सजा से लेकर गोवा की मुक्ति तक… गुरुजी के द्वारा हरि सिंह को काश्मीर विलय के लिए राजी करने से लेकर भारत-चीन युद्ध में स्वयंसेवकों की प्रासंगिकता तक के इतिहास पर नजर डालें तो संघ के योगदान को समझा जा सकता है.

जो समझना ही नहीं चाहते उन्हें समझाया नहीं जा सकता है… परंतु अब वो समय नहीं रहा कि लोग आँखें मूँद कर आपके कहे पर विश्वास कर लेंगे… कुर्ते की कॉलर अब आराम से नीची कर लें, आपके कुर्ते की फटी जेब को देश की जनता देख रही है.

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