बाहुबली -2 : साहित्य समाज का दर्पण है तो सिनेमा उसका सजीव पदार्पण

बहुत दिनों से पढ़ते-पढ़ते माथा ख़राब हो गया था इसलिए थोडा मूड फ्रेश करना जरुरी था. कल हम चुपके से अकेले बाहुबली-2 देखने निकल्लिये. कई साल बाद अकेले कोई पिक्चर देखी. जो व्यक्ति बगल में बैठा था उससे ज्ञात हुआ कि कल सिनेमा घरों में बाहुबली-2 का 50वां दिन था. वह व्यक्ति स्वयं तीसरी बार देखने आया था. पिक्चर ख़तम होने के बाद जब लोग निकले तो बच्चे जिद कर रहे थे कि “पापा एक बार और देखने आयेंगे…”. किसी भारतीय फिल्म के लिए ऐसा उत्साह दशकों बाद देखने को मिला.

बाहुबली देखने के पश्चात् मैं स्तब्ध रह गया. अंग्रेजी में इसे jaw dropping experience कहा जाता है. सम्भवतः इसलिए भी क्योंकि मैंने पहली वाली नहीं देखी थी. ऐसी अद्भुत फिल्म के लिए यहाँ इतना कुछ लिखा जा चुका है कि मेरे कुछ कहने का कोई विशेष प्रयोजन नहीं बनता. फिर भी मन में विचार घुमड़ रहे हैं तो फूट कर निकलेंगे ही.

किसी ने लिखा था कि हॉलीवुड वाले बाहुबली जैसी फ़िल्में साल में दस ठो बनाते हैं किन्तु मेरा मानना है कि हॉलीवुड वाले दस जनम में भी बाहुबली नहीं बना सकते क्योंकि उनका ध्यान भारतीय मौलिक हिन्दू संस्कृति को पाश्चात्य रंगों में ढालने पर अधिक होता है. वे भारत को यूरोपीय ‘राष्ट्र-राज्य’ के चश्मे से देखते हैं. यही कारण है कि हॉलीवुड न चाहते हुए भी सेक्युलर चोला ओढ़ लेता है.

बाहुबली की सबसे बड़ी विशेषता है इसकी मौलिकता. बाहुबली में वास्तविक प्राचीन भारतीय संस्कृति का भव्य प्रदर्शन है. सिल्वर स्क्रीन पर पौराणिक कथानक का ऐसा विराट प्रस्तुतीकरण पहले नहीं हुआ. जब हम कहते हैं कि ऐसा पहले नहीं हुआ तो जो पहले हुआ उससे तुलना करना आवश्यक हो जाता है.

ऐतिहासिक-पौराणिक पृष्ठभूमि पर बनी फिल्मों की बात करें तो मुग़ल-ए-आज़म जैसी ऐतिहासिक फ़िल्में छद्म सेक्युलरई के प्रसार का माध्यम भर थीं. जहाँ मुग़ल-ए-आज़म में पश्चिमी नारीवाद की अवधारणा हावी है वहीं बाहुबली में नारी शक्ति स्वरूपा के रूप में दिखती है जो न्याय की भीख नहीं मांगती बल्कि स्वभावतः पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिला कर लड़ती है.

कहा जाता है कि मुग़ल-ए-आज़म में नायिका को कम कपड़ों में दिखाए बिना सलीम यानी युसूफ साहब अनारकली के बदन पर पंख के स्पर्श मात्र से प्रणय की उत्तेजना उत्पन्न कर देते हैं. उस दृश्य में नारी का सर्वस्व समर्पण का भाव एक गुलाम लौंडी के रूप में दिखाई पड़ता है जबकि बाहुबली में देवसेना अपनी प्रथम उपस्थिति में ही बिना किसी शारीरिक स्पर्श के मन मोह लेती है.

सिनेमैटोग्राफी में विविध रंगों के संयोजन में बाहुबली जोधा अकबर जैसी अनेक फिल्मों को कई योजन पीछे छोड़ देती है. बाहुबली हर वय के दर्शकों को इसलिये भी इतनी पसंद आई क्योंकि यहाँ मौलिकता का अतिरंजित नहीं बल्कि व्यावहारिक चित्रण है. शाहरुख़ खान की असोका में एक डायलाग है कि “पी कर गाड़ी नहीं चलाते.” असोका में जिस प्राचीन मौलिक परिवेश को दिखाने के लिए प्राकृतिक सौन्दर्य का सहारा लिया गया था प्रदर्शन की उस स्वतंत्रता को यह एक डायलाग ध्वस्त कर देता है. बीसवीं शताब्दी के डायलाग को ईसा पूर्व के कथानक में जोड़ने का हश्र यही हुआ कि आज असोका किसी को याद नहीं.

जबकि बाहुबली में एक साथ तीन शर-संधान के कौशल को सिखाने के लिए भी संस्कृत के सूत्र का सहारा लिया गया है. राजतिलक के समय संस्कृत में उच्चारण कहीं से भी भोंडा प्रतीत नहीं होता बल्कि दृश्यों में तेज उत्पन्न करता है. बाहुबली के किसी भी दृश्य में प्रकृति प्रदर्शन मात्र की वस्तु नहीं है बल्कि उस जमाने में मनुष्य प्रकृति से किस प्रकार interact करता था, प्राकृतिक वस्तुओं जैसे पेड़ पशु आदि का किस प्रकार उपयोग करता था इसका बेहतरीन प्रस्तुतिकरण है. यहाँ मनुष्य और प्रकृति के मध्य संघर्ष की स्थिति नहीं अपितु प्राकृतिक संतुलन हेतु आवश्यक विधान का चित्रण है. पेड़ों की सहायता से बख्तरबंद दस्ते उछालना कठिन तो है किन्तु फिल्म में दर्शाए गए काल के हिसाब से असंभव नहीं है.

युद्ध किसी भी संस्कृति का अभिन्न अंग हैं. युद्ध कौशल में पारंगत नायक समाज के हीरो होते हैं. कभी भी दबा कुचला नायक समाज का हीरो नहीं होता. लोकप्रियता के मानकों पर हमेशा शक्तिशाली किरदार ही स्वीकार किया जाता है जिसमें लड़कर जीतने का सामर्थ्य हो. जब हम पैन-एशियाई हिंदुत्व की बात करते हैं तो पता चलता है कि आजतक किसी भी बॉलीवुड फिल्म ने भारतीय हिन्दू युद्ध विद्याओं को उस स्तर पर नहीं दिखाया जिस स्तर पर बाहुबली दिखाती है.

बाहुबली में दिखाया गया युद्ध कौशल यानी “Warcraft” की प्रासंगिकता तब समझ में आएगी जब आप चीनी युद्ध विद्या को दिखाने वाली हॉलीवुड की फ़िल्में देखेंगे. दशकों से चीनी मार्शल आर्ट्स और जापानी कटाना तलवारबाजी को हॉलीवुड ने खूब प्रचारित किया है. एनिमेटेड कुंग-फू पांडा से लेकर पुराने जमाने की ब्रूस ली फिल्मों तक सबने चीनी युद्ध विद्या का प्रचार किया है. यह एक प्रकार से भारत के मानस को विश्व पटल पर हतोत्साहित करने का प्रयास है क्योंकि हॉलीवुड फ़िल्में सबसे ज्यादा भारत में देखी जाती हैं. यह एक रणनीति है जिसका एक उदाहरण उन विदेशी सामरिक विश्लेषकों के शोध में दीखता है जो यह कहते नहीं अघाते कि भारत की कोई सामरिक संस्कृति नहीं रही.

विडंबना ये है कि बाहुबली से पहले किसी भी लोकप्रिय फिल्म में भारतीय युद्ध कौशल की जटिलताओं को इतने विस्तार से नहीं दिखाया गया. बाहुबली में मानवीय बाहुबल तथा यांत्रिक शस्त्रों को थोड़ा बढ़ा चढ़ा कर भी दिखाया गया है किंतु सिनेमा में मनोरंजन के लिए अतिशयोक्ति प्रदर्शन की इतनी स्वतंत्रता तो मिलनी ही चाहिए.

बाहुबली का नायक अमरेन्द्र बाहुबली एक आदर्श भारतीय हिन्दू राजा का प्रतिनिधित्व करता है. पश्चिमी देशों के राजाओं के विश्व विजयी अभियानों से प्रेरित इतिहासकार यही मानते रहे हैं कि भारतीय राजा डरपोक थे अथवा धर्मांध थे इसीलिए अपनी सीमाओं का विस्तार करने भारत के बाहर नहीं गए. इसी को आधार बना कर अशोक और अकबर की महानता के किस्से गढ़े गये ताकि यह स्थापित किया जा सके कि महान राजा वही है जो राज्य की सीमाओं को विस्तार देने के लिए भूगोल को जीत ले.

इसके उलट भारतीय परम्परा में आदर्श राजा उसे कहा गया है जो जनप्रिय हो. राजा रामचन्द्र को जनता पूजती थी. काशीराज महाराज बनारस विभूति नारायण सिंह का जब देहावसान हुआ था तब पूरा बनारस रोया था जबकि अंग्रेजों के राज में और देश स्वतंत्र होने के उपरांत महाराज बनारस के पास वास्तविकता में कुछ था ही नहीं. हमारे हिन्दू राजाओं के आदर्श जन हितकारी व्यवस्था की स्थापना करना रहे हैं. इसका किसने कितना पालन किया यह चर्चा का विषय है. हमारी संस्कृति में भूमि विस्तार करने वाले से अधिक उस राजा को सम्मान दिया गया जिसके राजकाज का ध्येय public welfare रहा है. बाहुबली का नायक अमरेन्द्र बाहुबली इसी स्थापना को प्रमाणित करता है.

अंतिम दृश्यों में जब महेंद्र बाहुबली की शक्ति क्षीण होने लगती है तो उसे भगवान शंकर संबल प्रदान करते हैं. महेंद्र के घावों पर शिव को अर्पित भस्म मरहम का कार्य करती है. यह द्योतक है उस प्राचीन आयुर्वेदीय परम्परा का जिसमें औषधीय शास्त्रों में कई प्रकार की भस्मों का उल्लेख है जिनका लेपन घाव पर करने से घाव भर जाते हैं.

बाहुबली में बहुत कुछ है. मैं हतप्रभ सा सिनेमा हॉल से बाहर आया तो मुझे यही सब समझ में आया. मैं एंटरटेन्मेंट के लिए तो सिनेमा देखता नहीं. मनोरंजक न्यूज़ चैनल इस उद्देश्य को पूरा करते हैं. मेरी दृष्टि में यदि साहित्य समाज का दर्पण है तो सिनेमा उसका सजीव पदार्पण है. आज के समय में सिनेमा किसी देश की संस्कृति और समाज के मूल्यों के प्रसार व प्रचार का सशक्त माध्यम है. मैं हर सिनेमा में अपने आइडिया ऑफ़ इंडिया को खोजता हूँ. जहाँ मुझे मेरे भारत का विचार शक्तिशाली हिन्दू राष्ट्र के रूप में दीखता है वही सिनेमा मेरे लिए अच्छा है.

अंत में बस एक बात नहीं समझ में आई. भल्लालदेव जिस दूरबीन से देखता है प्राचीन भारत के वैज्ञानिक इतिहास में उसका उल्लेख मैंने कहीं पढ़ा या सुना नहीं. क्षमा कीजिये मेरी मनोवृत्ति ऐसी है कि हर चीज में विज्ञान खोज लेता हूँ. भल्लालदेव की दूरबीन बंद पाइप जैसी नहीं थी. बाहर से आ रहे प्रकाश के कारण स्पष्ट इमेज तो नहीं दिख सकती. उस समय गैलिलियो भी नहीं पैदा हुआ रहा. ऐसी कोई कहानी भी नहीं कि गैलिलियो को चर्च वालों ने मार के भगाया तो भारत आकर छुप गया. आखिर भल्लालदेव को ऐसी दूरबीन कहाँ से मिली? इसका उत्तर सम्भवतः बाहुबली-3 में मिलेगा…

जय हिन्द. जय भारत. जय हिन्द की सेना. जय माहिष्मती. _/\_

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