सिर्फ अंग्रेजों के पट्टाधारी ग़ुलाम मुल्क और कौमें ही खेलती-देखती हैं क्रिकेट

तथाकथित ब्रिटिश इंडिया की कपूरथला स्टेट के प्राइम मिनिस्टर दीवान जरमनी दास ने ब्रिटिश राज में तत्कालीन राजे रजवाड़ों की अय्याशियों का वृतांत विभिन्न किताबों में किया है जो बेस्ट सेलर्स हैं और आज भी किताबों की दुकानों में खूब बिकती हैं.

इनमें 4 किताबें प्रमुख हैं जो The Maharaja, The Maharani, The Prince, The Princess… इनमें से एक पुस्तक में दीवान जरमनी दास ने उस ज़माने की क्रिकेट डिप्लोमेसी का ज़िक्र किया है. वो पुस्तक पढ़ के पता चलता है कि इस गुलाम मुल्क में कैसे क्रिकेट का प्रवेश हुआ.

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तो हुआ यूं कि अंग्रेज जब भारत पे राज करने लगे और उन्होंने जगह-जगह अपनी फौजी छावनियां बना लीं… तो उन छावनियों में वो अपने मनोरंजन के लिए क्रिकेट खेलते थे, और दिन भर दारू पीते एन्जॉय करते.

उनके क्लब्स में देसी लोग और देसी कुत्तों का प्रवेश वर्जित होता था. क्रिकेट की टीमें अंग्रेजों की होती थीं… देसी दास तो सिर्फ सेवा पानी मे रहते थे.

अब देसी राजा-महाराजा लोगों ने अंग्रेज हाकिम से मिलने-जुलने, सामाजिकता बढाने के लिए क्रिकेट को हथियार बनाया और अपनी-अपनी स्टेट में क्रिकेट की टीमें बनानी शुरू की.

इसी क्रम में विजयनगर, ग्वालियर, बड़ोदा, पटियाला, कपूरथला, नाभा जैसे स्टेट्स ने अपनी टीमें बना लीं. जाहिर सी बात है कि शाही टीम में कोई आम गरीब गुरबा तो खेलेगा नही… सो सभी राजसी परिवार और उनके मंत्री और उनके परिवार ही क्रिकेट खेलते थे.

जब ये टीमें बन गईं तो महाराजा साहब लोग अंग्रेजों को दोस्ताना मैचों के लिए आमंत्रित करने लगे. पर ऐसे मैचों में अंग्रेज हाकिम लाट बहादुर की मेहमान टीम को हराना शिष्टाचार के विपरीत, धृष्टता माना जाता था.

गेम में हार जीत का फैसला टीम के खिलाड़ियों के पद ओहदे status के हिसाब से निर्धारित होता…

मने अगर गवर्नर लाट साब खेल रहे हों तो उन्हें आउट करना सामान्य शिष्टाचार के विपरीत था और इसी तरह उनकी गेंद पे चौका-छक्का मारना भी अपमानजनक माना जाता.

परंतु यदि अंग्रेजों की टीम में सिर्फ सिपाही और लफटंट साहब खेल रहे हों तो राजा साहब की टीम जीतती थी.

इस प्रकार हिंदुस्तानी राजाओं ने अंग्रेज लाट बहादुर की सोहबत हासिल करने और उनकी चाटुकारिता करने के लिए क्रिकेट को माध्यम बनाया.

इसी तरह देस का क्लर्क, आम आदमी और गरीब गुरबा भी तो राजा साहब की सोहबत और कृपा आशीर्वाद हासिल करने को मरा जाता था, तो उन्होंने भी राजा साहब तक पहुंचने के लिए क्रिकेट खेलना-देखना, ताली बजाना शुरू किया.

चाटुकार किस्म के लोग जिनकी कृपा रुकी हुई थी उन्होंने उस रुकी हुई कृपा प्राप्ति के लिए राजा साहब की टीम से हार कर उन्हें खुश करने का तरीका खोज लिया.

कहने का मतलब ये कि उस ज़माने में चापलूस किस्म के लोग ही क्रिकेट खेलते और देखते थे. अंग्रेज हाकिम और राजा साहब की चापलूसी कर उन्हें खुश करने का माध्यम था क्रिकेट.

यही कारण है कि सिर्फ अंग्रेजों के गुलाम देशों ने ही इस खेल को अपनाया और सिर्फ और सिर्फ गुलाम प्रवृत्ति के लोग ही क्रिकेट का शौक रखते हैं.

कोई भी स्वाभिमानी, खुद्दार मुल्क और खुद्दार कौम क्रिकेट पर मरी नहीं जाती. सिर्फ अंग्रेजों के पट्टा धारी गुलाम मुल्क और कौमें क्रिकेट खेलती-देखती हैं.

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