हमारा दोगलापन : माओवादी हिंसा बनाम धार्मिक हिंसा

विवेक उमराव, सिडनी, ऑस्ट्रेलिया

यदि माओ के द्वारा करवाई गई करोड़ों हत्याओं को संज्ञान में न लिया जाए तब भी पिछले लगभग सौ सालों से भी कम समय में कम्युनिज्म को प्रचारित, प्रसारित व स्थापित करने के चक्कर में 10 करोड़ से अधिक हत्याएं हुई हैं.

[विवेक उमराव की कलम से : विकास के प्रति आदिवासियों के बढ़ते विश्वास व भागीदारी से बढ़ रही माओवाद की फड़फड़ाहट]

मतलब यह कि प्रति वर्ष औसतन लगभग एक लाख से अधिक लोगों की हत्याएं की गईं, लगातार दशक-दर-दशक.

यह बताने की जरूरत नहीं कि अपवाद प्रतिशत छोड़कर लगभग सभी हत्याएं आम लोगों की हुईं, गरीबों की हुईं, शोषितों की हुईं, मासूमों की हुईं.

[विवेक उमराव की कलम से : बस्तर, पुलिस व बलात्कार]

यदि तर्क यह है कि हत्याएं शोषकों, अमीरों व सामंतों की हुईं, तो दुनिया में अमीर शोषक व सामंत बचने ही नहीं चाहिए थे. यदि करोड़ों अमीरों की हत्याओं के बावजूद अमीरों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, तो उससे एक बात सामने यह आती है कि करोड़ों अमीरों की हत्याएं होते रहने के बावजूद, अमीर लोग बने रहे, न केवल बने रहे वरन दिन प्रतिदिन अमीरों की संख्या बढ़ती भी रही….

अब इनमें से कोई एक बात सही है –

या तो दुनिया के तंत्र व ढांचे बेहतरीन तंत्र व ढांचे हैं जो दुनिया में करोड़ों-करोड़ लोगों को अमीर बनाते आए हैं, लगातर बढ़ते हुए क्रम में अमीर बनाते ही जा रहे हैं. इसलिए इन तंत्रों व ढांचों का विरोध करना बेबुनियाद है.

या यह कि मारे गए दसियों करोड़ लोग गरीब, शोषित व मासूम लोग थे न कि अमीर….

दोनों में से किसी भी बात को माना जाए, कम्युनिज्म के नाम जो होता आया है, उस पर गंभीर सवाल अपने आप खड़ा हो जाता है.

माओ ने चीन में करोड़ों लोगों की हत्याएं की साम्यवाद की स्थापना के लिए. यदि ये करोड़ों लोग अमीर व सामंत थे, अमीर थे तो चीन की व्यवस्था दैवीय व्यवस्था होगी जहां इतने लोग अमीर व सामंत थे. इतनी बेहतरीन व्यवस्था को ध्वस्त करके साम्यवाद लागू करने का औचित्य क्या रहा… शायद माओ की सत्ता लोलुपता.

यदि माओ के द्वारा मारे गए करोड़ों लोग अमीर व सामंत नहीं थे तो गरीबों, मजलूमों व मजदूरों की हत्याएं करने का औचित्य क्या रहा… शायद माओ की सत्ता लोलुपता.

क्योंकि साम्यवादी चीन में देश की संपत्तियों का भोग तो कुछ लोगों का समूह ही करता है, चीन में इतने दशकों की साम्यवादी सत्ता व करोड़ों हत्याओं के बावजूद आज भी कुछ लोग बहुत ही अधिक अमीर हैं और बड़ी जनसंख्या तुलनात्मक गरीब है. आज भी अधिकतर लोग मजदूर हैं और कुछ प्रतिशत लोग बहुसंख्य लोगों के बारे में निर्णय लेते हैं.

चलते – चलते :

भारत में यदि आज़ादी के समय के दंगों की बात छोड़ दी जाए (उस समय भी अधिकतर हत्याएं धर्म की आड़ में संपत्तियों को लूटने व कब्जा जमाने की धूर्तता के कारण ही की गईं थीं) तो उसके बाद भारत में दंगों में हुई हत्याओं से कई गुना अधिक हत्याएं माओवादियों ने की हैं, वह भी मासूमों की, आम लोगों की.

हमारी संवेदनशीलता गोधरा कांड में तो परवान चढ़ जाती है, हम मोदी जी से बेइंतहा नफरत करते हैं. वर्षों दर वर्षों तक नफरत करते रहते हैं.

लेकिन हमारी संवेदनशीलता माओवादी हिंसा के विरोध की बजाय घोर समर्थन में परवान चढ़ती है, हम तर्क वितर्क कुतर्क देते हुए, तथ्यों व संदर्भों को गढ़ते हुए धूर्तता के साथ हम माओवादी हिंसा के साथ खड़े होते हैं.

हमारा दोगलापन …….

धर्म, संस्कृति, संस्कार, साम्यवाद, समाजवाद, मानववाद इत्यादि का रास्ता हिंसा, धूर्तता, झूठ, प्रपंच, फरेब इत्यादि से होकर बिलकुल भी नहीं जाता है. यही कारण है कि हम ऐसे तरीकों व रास्तों से पहुंच भी नहीं पा रहे हैं.

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