छोटे-मध्यम व्यापारी के जीवन को सम्मान के साथ तनाव रहित बनाएगा GST

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अभी दस साल पहले तक मध्यम और छोटे पावर उपभोक्ता टोटल बिजली चोरी पर अपना कारोबार करते थे… और ये स्थिति कुछ अपवादों को छोड़ पूरे भारत में ही चलती थी.

हालात ये थे कि बिजली घर का एक पेट्रोलमैन भी संस्थान पर आ जाता था तो कारोबारी हिल जाता था… JE (जूनियर इंजिनियर) कारोबारी का ‘हुजूर माई बाप’ होता था… SDO या XEn (एग्जीक्यूटिव इंजिनियर) आ गया तो मानो कारोबारी की महीने 15 दिन की कमाई गिफ्ट में गयी…

कारोबारी डर के मारे ना सो पाता, ना ठीक से खा पाता… घर जाना मुश्किल… संस्थान पर टिफिन खोल आँखें गली या सड़क पर… उधर रोटी का कौर का होश नहीं, दाल-सब्जी में डूबे या पानी के गिलास में…

घर पर जो भोजन 30 मिनट में खाए वो संस्थान पर 3 मिनट में ही पेट के अंदर हो जाए… दोपहर में घर से खबर आये कि बेटे, बेटी या पत्नी के पेट में दर्द है, बुखार है तो घर जाना भी मुश्किल कि कहीं वे यमदूत ना आ जाएँ….

और इस सबके बाद जब कारोबारी अपनी लागत का परता फैलाता था तो वो तमाम जलालत से की गयी विद्युत चोरी की रकम को भूल ही जाता था… केवल अपने फिक्स्ड राशि के बिल को ही लागत में जोड़ता था… मतलब चोरी करने के पाप के बाद फायदा सीधे ग्राहक को…

लेकिन शनैः शनैः बिजली की चोरी खत्म हुयी… और अब हालात हैं कि XEn तो छोड़िये MD भी आ जाए तो उसको कोई राम-राम करने वाला नहीं मिलता है…

दिवाली पर लाईनमैन तक के घर मिठाई के डिब्बों और आतिशबाजी से भरे रहते थे… आज हर कर्मी और अधिकारी को खील बताशे तक खरीदने पड़ते हैं…

कारोबारी तब चोरी के जमाने में प्रति नग या क्विंटल पर 4 यूनिट की कॉस्ट रखता तो अब ऑटोमेटिकली 14 यूनिट की हो गयी… अर्थात चोरी रुकने पर एक्स्ट्रा दस यूनिट कारोबारी को अपने घर से नहीं देने पड़े…

लेकिन ये सम्भव तब ही हुआ जबकि चोरी हर जगह एक साथ खत्म हो गयी…

अब GST में लगता है, कर की बचत या चोरी भी एक साथ खत्म होने वाली है… मुझे लगता है GST छोटे और मध्यम व्यापारी के जीवन को सम्मान के साथ तनाव रहित भी बनाने वाला है…

ट्रांसपोर्ट भाड़े बढ़ जाते हैं तो क्या हम उसको कॉस्ट में एड नहीं करते… अचानक भाव बढ़ जाते हैं तो क्या हम भाव नहीं बढ़ाते…

ऐसे ही यदि अब टैक्स लग रहा है तो क्या ये हमको अपनी गाँठ से देना पड़ेगा? सीधे-सीधे ग्राहक से लेना है.

रही बात लेखा-जोखा, कम्प्यूटर आदि तो, भाई हम पोस्ट ग्रेजुएट होकर बिजनिस में झख मरा रहे थे तो अब अपनी पढ़ाई लिखाई काम तो आएगी…

जिस चीज का रेकॉर्ड होगा तो सरकारी नौकर खा तो जाएगा नहीं… जब हम टैक्स के बोरे के बोरे भर कर देंगे वो भी बिना चोरी के… तो उस अफसर की क्या मजाल जो वो कुछ कर ले.

परिवर्तन आ रहा है, वो आकर तो रहेगा ही… तो बजाय घबराने के उसकी तैयारी करें ना!

मंहगाई बढ़े तो बढ़े… यदि हजार की चीज सवा हजार हुयी तो बिक्री भी तो सवाई होगी… और मुनाफ़ा भी तो बढ़ेगा ही. मंहगाई तो भाई सीधे-सीधे उपभोक्ता का मामला है… उलटे व्यापारी को तो मंहगाई से लाभ ही है.

हाँ, एक ख़तरा जरूर है कि बड़े डायनासोर हम मछलियों को ना निगल जाएँ जो कि टैक्स चोरी के बूते इनकी नाक में दम किये रहती थी…

सो जब हमको माल कल्चर और बड़ी रिटेल चेन हमको ना डिगा पाये तो ये GST ही क्या डिगा पायेगा… अब तो हम भी शाहों की श्रेणी में ही तो होंगे…

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