हनुमान ने किया था सबसे पहला ‘सर्जिकल स्ट्राइक’

म्यांमार और नियंत्रण रेखा (LoC) के पार की गयी सर्जिकल स्ट्राइक के बारे में तो सभी जानते हैं. परन्तु क्या आपको पता है कि विश्व में पहली सर्जिकल स्ट्राइक किसने की थी? चलिये अपनी समझ से हम बताते हैं.

सबसे पहले हम ये समझते हैं कि सर्जरी क्या होती है. शरीर दो प्रकार से अस्वस्थ होता है – पहला तब जबकि शरीर की रासायनिक क्रियाएँ (metabolism) प्रभावित हों, दूसरा तब जब किसी अंग विशेष में विकार उत्पन्न हो. सामान्यतः किसी अंग विशेष की सर्जरी तभी की जाती है जब औषधियों के सेवन मात्र से व्यक्ति स्वस्थ नहीं हो पाता.

यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि सर्जरी पूरे शरीर की नहीं की जा सकती. किसी अंग विशेष को ही सर्जरी द्वारा ठीक किया जा सकता है जिसके उपरांत समूचा शरीर स्वास्थ्य लाभ करता है. अतः सर्जिकल स्ट्राइक का अर्थ है शत्रु के शरीर रूपी क्षेत्र में भीतर घुस कर किसी विशेष अंग को नेस्तनाबूत कर देना. यह अंग शत्रु का कोई महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाना हो सकता है.

शत्रु के चंगुल से किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति या व्यक्तियों को छुड़ा लाना भी स्पेशल ऑपरेशन में आता है. सर्जिकल स्ट्राइक जैसा ऑपरेशन सेना की सामान्य टुकड़ियां नहीं करतीं. इस कार्य के लिए विशेष बल (Special Operation Force) का गठन किया जाता है.

अब हम रामायण काल में चलते हैं. जब समुद्र तट पर श्रीराम की सेना पहुँची तो प्रश्न उठा कि समुद्र पार कर सीता जी का हालचाल लेने लंका कौन जायेगा. तब जाम्बवंत जी ने हनुमान जी से कहा ‘का चुपि साध रहे बलवाना’. इस पर हनुमान जी को अपने बल और शक्ति का ज्ञान हुआ. उसके पश्चात जो हुआ वो सेना की स्पेशल ऑपरेशन फ़ोर्स के क्रियाकलाप से बहुत मेल खाता है.

कथित सर्जिकल स्ट्राइक सेना के सामान्य सैनिक नहीं बल्कि स्पेशल फ़ोर्स के दस्ते करते हैं. हनुमान जी भी पूरी रामायण में विशेष स्थान रखते हैं. हनुमान जी उड़ कर लंका गए थे उसी तरह जैसे किसी भी स्पेशल ऑपरेशन में तीव्र गति से उड़ने वाले विमान का प्रयोग किया जाता है.

अब यह देखिये कि जब सुरसा को चकमा देकर हनुमान जी लंका पहुँचे तो उन्होंने सूक्ष्म रूप धारण कर लिया. उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि स्पेशल ऑपरेशन में गोपनीयता का बहुत महत्व है. सैनिकों को अपनी पहचान छुपा कर टास्क पूरा करना पड़ता है.

इसके पश्चात हनुमान जी इंटेलिजेंस अर्थात् गुप्त रूप से सूचना इकट्ठी करने का कार्य पूर्ण करते हैं. वे जाकर सीताजी से मिलते हैं अंगूठी दिखाते हैं और पूरा समाचार कह सुनाते हैं. इतना ही नहीं अशोक वाटिका में श्रीराम और सीताजी से सहानुभूति रखने वाली कुछ राक्षसियाँ भी थीं. यानि शत्रु के देश में लॉजिस्टिक्स सपोर्ट देने वाले कुछ लोग भी थे जो स्पेशल ऑपरेशन को आसान बना देते हैं.

हनुमान जी बस एक जगह चूक जाते हैं. जब उनको भूख लगती है तब रावण की बगिया उजाड़ देते हैं. किंतु चूँकि हनुमान जी रुद्रावतार थे इसलिए उनके पास डैमेज कण्ट्रोल के साधन भी थे.

अब जरा हिंदी व्याकरण की पुस्तक में अतिशयोक्ति अलंकार के उदाहरण याद कीजिए तो ध्यान आयेगा कि ‘हनूमान की पूँछ में लगन न पाई आग, और लंका ससुरी जर गयी गए निसाचर भाग’. लंका के जलने से आपको यह भी याद आयेगा कि उस कांड में लंका के किसी भी साधारण नागरिक की जान नहीं गयी थी, केवल राक्षस मरे थे और लंका के भवन जले थे वह भी इसलिए क्योंकि रावण को सबक सिखाना था.

इससे मिलता जुलता उदाहरण आप हॉलीवुड की फ़िल्म Lone Survivor में देख सकते हैं जब यूएस नेवी सील के जवान अफगानिस्तान के नागरिकों को इसीलिए छोड़ देते हैं क्योंकि यदि वे उन सामान्य नागरिकों को मार देते तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार वाले हो हल्ला मचाने लगते. रामायण काल में हनुमान जी ने इसका भी ध्यान रखा था.

अंत में यह देखिये कि सब कुछ करने के पश्चात हनुमान जी श्रीराम के पास लौट आये थे. जहाँ पारंपरिक युद्ध में प्रत्येक सैनिक की जान बचा पाना कठिन होता है वहीं स्पेशल ऑपरेशन फ़ोर्स दल के हर सैनिक को निर्धारित समय पर काम ख़त्म करने के पश्चात लौट आने के सख्त निर्देश दिए जाते हैं.

प्रश्न यह भी है कि क्या रावण ने सीताजी को मात्र रूप सौंदर्य देखकर वासना से ग्रसित होकर अपहृत किया था. यदि ऐसा होता तो जब रावण ने सीताजी को छुप कर देखा तभी राम लक्ष्मण की हत्या का विचार उसके मन में क्यों नहीं आया? वस्तुतः रावण के मन में सीताजी के सौंदर्य के प्रति आसक्ति के अतिरिक्त रणनीतिक भाव भी था.

सीताजी के अपहरण से पूर्व ऋषि विश्वामित्र की प्रेरणा से श्रीराम ने रावण के उत्तर और दक्षिण स्कंधावार नष्ट कर खर दूषण त्रिशिरा समेत चौदह हजार राक्षसों का वध कर डाला था. यह रावण की विस्तारित होती राक्षस सत्ता को प्रत्यक्ष चुनौती थी. इसीलिए रावण मनोवैज्ञानिक छद्म युद्ध लड़ने का इच्छुक था.

उसने श्रीराम को सर्वप्रथम मनोवैज्ञानिक रूप से पराजित करना चाहा. आजकल सैन्य शब्दावली में इसे PSYOPS अर्थात् Psychological Operations कहा जाता है. इसका उत्तर श्रीराम ने Propaganda Warfare के रूप में दिया.

जब राम सीताजी को ढूंढने निकले तब मार्ग में वन पर्वत हर स्थान पर इसका प्रचार किया गया कि सीताजी अर्थात् एक नारी का अपहरण दुष्ट रावण ने किया है इसलिए रावण से प्रताड़ित सभी जन एवं पशु श्रीराम के नेतृत्व में युद्ध लड़ें, यही धर्मसंगत है.

क्षत्रिय वंश के श्रीराम की सेना में कोल, किरात, वानर, शूद्र सभी सैनिक बन गए थे. श्रीराम की इस सेना को ब्राह्मण ऋषि मुनियों का आशीर्वाद प्राप्त था. सैन्य प्रशिक्षण तो छोड़िये इस सेना में किसी ने किसी का वर्ण तक नहीं पूछा क्योंकि उनका शत्रु एक था: रावण.

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