सिर्फ बोलने, कहने और संस्कृति का बोझ ढोने में अव्वल हैं हम

यूरोप के एक बहुत ही सुन्दर आपसी सामाजिक व्यवस्था के बारे में बताता हूँ. वहाँ यूरोप में जब छुट्टियां होती हैं तो अक्सर 90% यूरोपियन सैर सपाटे पे निकल जाते है, इसमें ख़ास होता है घर की अदला बदली.

उदाहरण के लिए अगर कोई पेरिस में रहता है और उसका रिश्तेदार बुडापेस्ट में तो छुट्टियों में पेरिस वाला बुडापेस्ट जाता है और बुडापेस्ट वाला पेरिस में. इस तरह वो लोग न सिर्फ होटल का खर्चा बचा लेते है, साथ में सैर सपाटे के साथ घर का माहौल भी होता हैं, एक-दूसरे का घर भी सुरक्षित रहता है.

और जब जाते है तो घर को वैसे ही व्यवस्थित कर देते है जैसा मिला था, इस्तेमाल किये हुए खाद्य या अन्य पदार्थ की भी भरपाई करते है. कम खर्च में सैर का आनंद और घर भी सुरक्षित…

लेकिन हर शहर और गाँव में तो सबके रिश्तेदार नहीं होते तो छुट्टियों के पहले हाउस एक्सचेंज के इश्तेहार खूब होते है. आपस में लोग अनजानों के साथ घर एक्सचेंज करते है, छुट्टियाँ मनाते है और अंत में घर को वैसे ही व्यवस्थित करके असल मालिक के सुपुर्द कर देते है.

जैसे ही वो घर में घुसते हैं वैसे ही सारे उपलब्ध उपयोग के सामान और खाने पीने के समान की लिस्ट बनाते हैं. फिर वस्तुओं का उपयोग करते हैं. अंत में सारे उपयोग किये वस्तु को वैसे ही रख देते हैं. चादर, परदे आदि वैसे ही धो के रख देते हैं जैसे मिले थे. खाने – पीने के सारे सामान भी वैसे ही लाके रख देते हैं.

जब घर का असल मालिक वहां वापस पहुँचता है तो उसको अपना घर वैसे ही मिलता है जैसे छोड़ के गया होता है. फिर दोनों परिवार एक-दूसरे को धन्यवाद का आदान प्रदान करके एक-दूसरे को भूल जाते हैं.

अगली छुट्टी फिर कोई नया इसी तरह से एक्सचेंज होता है. आने वाली अगस्त यूरोप में फिर से 3 हफ्ते को गर्मी की छुट्टियां होंगी और उधर के अख़बारों, इंटरनेट आदि पर अभी से ऐसे हाउस एक्सचेंज के प्रचार चलने लगे हैं…

इस तरह का सामाजिक मेल मिलाप, आपसी विश्वास और समझ सैकड़ों सालों की संस्कृति का बोझ ढोने और दुहाई देने वाले भारतीय समाज में शायद ही कभी हो.

उदाहरण के लिए कुछ दिन पहले एक जगह खड़े हुए देखा कि वहाँ एक लड़का मोटरसाइकिल से आया और जोर से आवाज लगा के भाई को बुलाया. छोटे भाई ने पूछा ये किसकी बाइक है, उसने दोस्त का नाम बताया और बोला जरा देख हेलमेट अभी आ रहा हूँ.

छोटे भाई ने उठा के हेलमेट घर के अंदर फेंक दिया और बोला मेरे पास टाइम नहीं है रखवाली करने का. जोर से आवाज आई दोनों भाई हंस पड़े, छोटा बोला अपना थोड़ी है कौन सा अपना जाता है… तो ये है हमारे यहाँ का दूसरे के प्रति सम्मान.

ऐसा अक्सर होता है पूरे भारत में… घर का कूड़ा बाहर फेंक देना… अपने यहाँ कोई काम कराया और बगल के घर का कुछ नुकसान हुआ तो उस पर ध्यान न देना… ये हमारे समाज का हिस्सा बन चुका है…

मूलतः हम बेईमान हैं… न सिर्फ पैसे रुपये को लेकर भ्रष्टाचार और बेईमानी हैं बल्कि हम बेईमान समाज हैं कदम-कदम पर…

रेलवे फाटक पर लाइन से आगे गाड़ी घुसा देना भी लाइन से खड़े होने वालों के प्रति बेईमानी है… रेल-बस या अन्य जगह के खिड़की पर कोने से हाथ घुसाकर आना काम करने की कोशिश करना लाइन में लगने वालों के प्रति बेईमानी है…

सड़क पर लाइन से न चलना और जबरदस्ती बेढंगे तरीके से घुस जाना भी बेईमानी है… हेलमेट और अन्य सुरक्षा नियमों का पालन न करना और कुछ होने पर दूसरे को दोष देना खुद के प्रति बेईमानी है…

किसी चौराहे पर खड़े हो जाइये और देखिये ऐसी अनेक छोटी-छोटी बेईमानियां… ये बेईमानियां आती हैं जब अनुशासन नहीं होता… हम एक बेलगाम समाज है…

खुद के अंदर कोई अनुशासन नहीं है… जिससे हम क्या-क्या कर जाते हैं खुद को ही उसका आभास नहीं होता… और हम अपने किये को जस्टिफाई भी करते जाते हैं…

ये बेईमानी है… एक बिना अनुशासन के भ्रष्ट और बेईमान समाज… हम बोलने, कहने और संस्कृति का बोझ ढोने में अव्वल हैं लेकिन वास्तविकता इससे कोसों दूर है…

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