दबे पांव, चुपके चुपके आ रहा है समाज में बदलाव, मेरा भारत बदल रहा है

जहाँ तक मुझे याद आता है, साधू दादा हमारे परिवार से 80 के दशक की शुरुआत में ही जुड़ गए थे. 35 साल हमारे खेतों पर काम करते थे. साथ में उनकी पत्नी होती थीं. वो उन्हें न जाने क्यों पगली पुकारते थे. बाकी गांव भर के लिए वो सधुआईन थीं.

हम उन दिनों बाहर रहते थे. सिर्फ Summer Vacations में ही गांव आ पाते थे. एक बार घर आये. सब लोग स्टेशन पर आये हुए थे. सबके पैर छुए. साधू दादा भी लपक के सामने आए. मैंने उनके भी पाँव छुए.

साधू दादा पहले तो कुछ असहज हुए, फिर भाव विभोर हो गए.

कैसे हो पहलवान? रियाज़ चल रहा है न?

घर आये तो सामने सधुआईन खड़ी थीं. मैंने उनके भी पाँव छुए. उन्होंने आशीर्वाद दिया.

उन दिनों मुझे ठाकुर और मुसहर का भेद पता नहीं था. ये भी पता न था कि यहां ठाकुरों के लड़के मुसहर बड़े बुजुर्गों के पैर नहीं छूते. हमारा यही संस्कार था कि सभी बुजुर्गों का सम्मान करो.

सधुआईन की पिछले दिनों मृत्यु हो गयी. आज उनकी त्रयोदशी थी. मुसहर बस्ती के किसी प्रयोजन में समाज का कोई व्यक्ति नहीं आता. भोजन पानी तो बड़ी दूर की बात है.

आज शाम हम लोग बिन बुलाए ही जा पहुंचे. मैं, बड़े भाई विक्रम सिंह जी और साथ मे थे यशवंत यादव. साधू दादा अभिभूत थे.

सबसे पहले बच्चों ने खाया. बच्चों के बाद जब बड़े खाने बैठे तो हमने देखा कि हमको तो कोई पूछ ही नहीं रहा. मैंने लड़कों से कहा हमारा पत्तल भी लगाओ भाई.

मुसहर बस्ती के चेहरे पर जो खुशी, उल्लास, प्रसन्नता थी उसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते. क्षत्रिय समाज का कोई व्यक्ति उनके साथ बैठ के उनके हाथ का बना भोजन खाये.

समाज में बदलाव दबे पांव, चुपके चुपके आ रहा है.

मेरा भारत बदल रहा है.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY