प्रेस की आज़ादी के नए पहरुआ और शुरू होना नेशनल हेराल्ड का

बेटा कुंदन! नेशनल हेराल्ड अखबार फिर क्यों छपना शुरू हुआ? सवाल का सीधा जवाब दो.

यू बकलोल पंडी! टेढ़े काम का सीधा जवाब? ओके लिस्सन :

2011 में राहुल-सोनिया की कंपनी यंग इंडिया द्वारा हड़पे जाने से पहले… 2009 में नेशनल हेराल्ड की असली मालिक कंपनी एसोसिएट जर्नल्स ने अवैध तरीके से कांग्रेस पार्टी से बिना ब्याज के 90 करोड़ का कर्ज लिया.

कर्ज लेना कोई नई बात नहीं कुंदनवा! आगे बोलो?

अबे बबवा! कर्ज देते समय कांग्रेस ने वजह बताई “कामगारों पर संकट”. लेकिन 2009 के बाद अखबार शुरू नहीं हुआ.

अब हुआ न?

हुआ… तो फिर संकट में पड़े किन “कामगारों” को बचाने के लिए?

अब्बे! ई बात तो सही कह रिया है!

बकलोल पंडी! एक सही बात और ले.

नेशनल हेराल्ड मामले में चल रहे कोर्ट केस के बाद कोई खिलाफ फैसला आया तो : वह फैसला मीडिया का गला घोंटने वाला फैसला होगा.

वह फैसला लोकतंत्र के चौथे खंभे पर हमला होगा. वह फैसला निष्पक्ष मीडिया की आवाज दबाने वाला होगा.

इसके लिए अखबार का निकलना होता मंगता न! उसका चालू होना मंगता न!!

यही है वह असली संकट कामगारों पर जिसकी वजह से कांग्रेस ने अपना भविष्य 2009 में ही देख कर 90 करोड़ का कर्ज दिया.

फिर राहुल-सोनिया ने 76 फीसदी शेयर खुद रख… बाकी अपने खानदानी चारणों में बांट दिया.

सुमन दूबे, सैम पित्रोदा, मोतीलाल वोरा और आस्कर फर्नांडीज बाकी हिस्सेदार और सोनिया-राहुल संग कोर्ट केस में भी यही हिस्सेदार.

कामगारों पर असल संकट यह है. अखबार अब शुरू होने की वजह यह है.

बेटा कुंदन! ये सारी बातें अच्छे से कौन समझता है?

अरुण शौरी जी.

वो कैसे ?

76 फीसदी शेयर के बाद बाकी बचे शेयरों में सुमन दूबे भी हिस्सेदार हैं. सुमन दूबे जहां इंडिया टुडे के सम्पादक रहे हैं, वहीं राजीव गांधी के प्रेस एडवाइजर भी थे. राजीव की मौत के बाद, राजीव गांधी फाउंडेशन के स्थापना के वक्त से उसकी एक्सक्यूटिव कौंसिल में हैं.

हां… इस सबके साथ वह अरुण शौरी के साढू भी है यानी ब्रदर इन लॉ.

बेटा कुंदन! प्रेस की आज़ादी पर हमले का नया सीज़न और नए फुदकने वाले सब समझ में आ रहे हैं.

कामगारों पर संकट!

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