फिलीपींस… हमसे कितनी दूर

एक संभावना, फिलीपींस की घटना की वजह से लग रहा है कि किसी भी देश में कभी भी घटित हो सकती है.

कोई अनाम संगठन, जो छुपे रहकर विप्लव की तैयारी कर रहा हो, जिसको देशद्रोही, नक्सली संगठनों का साथ भी मिल रहा हो.

किसी एक शहर की गुमनाम बस्तियों में लोकल और बाहरी आदमी इकट्ठा हो रहे हों… धीरे-धीरे… चुपचाप…

हथियार और बारूद इकट्ठा हो रहा हो…

और 2 साल तक ये चलता रहे, यहां तक कि उस बस्ती के लोग भी अनभिज्ञ हों इस बात से, क्योंकि एक-एक करके आने वालों में से कोई रिक्शा चला रहा है, कोई जूते गांठ रहा है, कोई मजदूरी कर रहा है…

कोई झगड़ा नहीं… कोई लाइफ स्टाइल नहीं… कोई भड़काऊ बात नहीं… कोई शो ऑफ नहीं…

और एक रात अचानक 500-600 लोगों की सुनियोजित योजना को अमली जामा पहनाया जाता है…

सारे पुलिस स्टेशन पर रातों रात कब्ज़ा, जिसने विरोध किया उसको मार दिया, बाकी को घायल कर हवालात में बंद… एक छोटे शहर में चौकी और थाने मिलाकर कुल 100-200 ही होते हैं…

मुख्य नाकों पर घेरा बंदी, रोड ब्लॉक, भारी हथियारों के साथ, शहर के लोग जो इन लोगों के साथ शामिल थे वो भी बाहर और मीडिया में बयानबाज़ी शुरू…

जरा सोचिए आप लाउड स्पीकर की तेज आवाज को सुनकर सुबह जल्दी उठे और आपको सुनाई दे रहा है कि इस शहर पर अब हमारा कब्ज़ा है, जान माल की सलामती चाहते हैं तो बाहर न निकलें…

आप छत पर चढ़े तो दूर बस्तियों और कॉलोनियों से गहरा धुआं उठ रहा है…

भयावह है न???

पर सिर्फ सपना नही है, जब फिलीपींस में हो सकता है तो और कहीं क्यों नहीं…

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