भय बिनु होइ न प्रीति : इसलिए अंतर्राष्ट्रीय जगत में ‘सॉफ्ट स्टेट’ कहा जाने लगा भारत

एक नेत्रहीन भिखारी मंदिर के बाहर खड़ा रहकर भीख मांगता था. उसे रोज सिक्कों के रूप में भीख मिलती थी. कुछ लोग एक, दो या पांच रूपये के नोट भी थमा जाते थे. वो अपने हाथ से छूकर पता लगा लेता था कि सिक्का और नोट किस कीमत का है.

एक दिन एक धनी व्यक्ति के यहां बहुत सालों बाद संतान का जन्म हुआ. वो खुशी में मंदिर गया और वहां दर्शन करने के बाद लौटते समय उसने भिखारी को पांच सौ रूपये का नोट दे दिया. भिखारी ने नोट को हाथ लगाया तो उसे लगा कि वह धनी उससे मजाक करने के लिये कागज का टुकड़ा थमा गया. उसने क्रोधित होकर नोट जमीन पर फेंक दिया और दानदाता को गालियां देने लगा क्योकि उसे आज तक किसी ने 500 का नोट भीख में नहीं दिया था.

भारत में पिछले तीन साल से विचार अभिव्यक्ति को लेकर जमकर बवाल मचाया जा रहा है. कोई हिंदू देवी देवताओं को गाली दे रहा है, कोई सवर्णो को, कोई कुछ सांस्कृतिक राष्ट्रवादी संगठनों को.

कुछ लोग पुराने सारे वेदिक ग्रंथो, हिंदू संतो और भारतीय वीरों के इतिहास को खारिज करने में रात दिन लगे हैं. जब इससे भी उनका मन नहीं भरा तो उन्होंने कश्मीर, बस्तर और बंगाल, असम की आजादी के नारे लगाना शुरू कर दिये.

कुछ लोग विचार अभिव्यक्ति के नाम पर आंतकी की फांसी रुकवाने के लिये सुप्रीम कोर्ट को आधी रात को खुलवा रहे हैं. हद तो अब ये हो गयी कि हाफिज के साथ ‘साहब’ और ओसामा के साथ ‘जी’ लगाने से भी जब उनकी विचार अभिव्यक्ति की आजादी संतुष्ट नहीं हुई तो उन्होंने सेना प्रमुख ‘विपिन रावत’ को ही “सड़क का गुंडा” कह दिया.

इन विचार अभिव्यक्ति की आजादी की बात करने वाले पिस्सुओं की हालत ठीक उस अंधे भिखारी की तरह है जिसने कभी पांच सौ का नोट नहीं देखा. पाकिस्तान और बांग्लादेश में सैकड़ों धर्मनिरपेक्ष ब्लॉगरों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और अल्पसंख्यकों को सरकार और धर्म के विरोध में लिखने के केवल शक के आधार पर ही मौत के घाट उतार दिया.

दो माह पूर्व पाकिस्तान में अहमदिया मुस्लिम छात्र ‘मशल खान’ को कॉलेज परिसर में ही ईंट, पत्थर, लाठी, सरिये से पीट पीटकर मार डाला और इस दौरान अनेकों लोग उसका वीडियो बनाते रहे. बाद मे जांच में पाया कि मशल खान ने धर्म के विरोध में कुछ नहीं लिखा था.

वामपंथी भी विचार अभिव्यक्ति को लेकर रात दिन “हुआं हुआं” करते रहते हैं. इन्होंने भी भारतीय सेना प्रमुख को “जनरल डायर” का अवतार बता डाला, जबकि चीन में थ्यानमेन चौक में वहां के छात्रो की विचार अभिव्यक्ति की हवा को कैसे टेंक के गोले दागकर पिछवाड़े से निकाला था ये सारी दुनिया ने देखा था. जबकि भारत में ये वामिये पिछले तीन साल से “विचार अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में है” को लेकर विधवा विलाप कर रहे हैं. मोमताबानो बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिये प्रधानमंत्री को ही खुलेआम धमका चुकी है.

वास्तव में भारतीय लोकतंत्र ने सबको जरूरत से ज्यादा आजादी दे रखी है. हर कोई अपने को कानून से ऊपर मानने लगा है. किसी को कानून का कोई भय नहीं बचा. अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत को “सॉफ्ट स्टेट” कहा जाने लगा है.

बावजूद इसके देश के एक राजनीतिक और सामाजिक वर्ग को हर जगह ‘फासीवाद का उदय’ और ‘धर्म निरपेक्षता खतरे में’ नजर आ रही है. इस सबका कारण यह है कि इन लोगों को उनकी औकात से ज्यादा आजादी दे दी गयी है. गांवो मे एक पुरानी कहावत है कि कुतों को घी हजम नहीं होता.

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