राष्ट्र प्रथम : यदि भारत होगा, तभी हिन्दू भी होगा और तभी पल्लवित होगी मानवता

हम हिन्दुओं को जब तक खुद के होने का गरूर नहीं होगा तब तक हम दूसरे के घर में लगी आग से अपने हाथ सकते रहेंगे. वह सेंकते हुए यह भूल जाता है कि यदि यह आग बुझाई नहीं गयी तो एक दिन यह आग उसके के ही घर को लीलने वाली है.

हिन्दुओं को अपना अहम और सहूलियत इतनी ज्यादा प्यारी है कि उन्हें एहसास ही नहीं होता है कि जिस उठते हुए धुएं को वो हवा दे रहे है वही आग लगाने वाला है.

1000 साल की गुलामी से हिन्दू इतना संकीर्ण और स्वार्थी हो गया है कि उसको अपने सुविधा क्षेत्र से निकलने में तकलीफ होती है और यही उसकी अवनति का कारण हुआ है.

यहां यह याद रखिएगा कि इतिहास हमें बताता है कि कोई भी और किसी भी तरह का शासक और शासन कभी उसको गुलाम नहीं बना पायी है जिसमें खुद के होने का गरूर था.

यह यहूदियों में था, चीनियों में था, पारसियों में था, जर्मन में था, फ्रेंच में था और तो और अमेरिका में अफ्रीका से आयातित अश्वेतों में था.

यह सब अंधेरो से निकले हैं, इन सबने अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए अपने खून से धरती रंगी है लेकिन हिन्दू इस तालिका में नहीं हैं. हिन्दू अभी अँधेरे से नहीं निकला है.

अँधेरे में पोषित हिन्दू कमजोर, स्वार्थी और गुलामियत की अफीम में चूर होता है और यह हिन्दू कभी भी ‘भारत एक राष्ट्र’ का नहीं हो सकता है.

यह वह हिन्दू होता है जो हमेशा पहले मौके पर समर्पण करेगा और वैचारिक प्रतिबद्धता से, राष्ट्र से द्रोह के औचित्य को सिद्ध करेगा.

इस तरह का हर वह भारतीय जो भारत की जड़ों को खोखला कर, काट रहा है, वह व्यक्ति कभी भी हिन्दू या हिंदुत्व का शुभाकांक्षी नहीं हो सकता है क्यूंकि भारत के अस्तित्व से ही हिन्दू का अस्तित्व जुड़ा हुआ है.

हिन्दू अभी इस अँधेरे से निकलेगा भी नहीं क्यूंकि उसको नि:स्वार्थ भाव से रक्त बहाना नहीं आया है.

यह एक रक्तरंजित सत्य है कि हिन्दुओं के अस्तित्व पर तब तक अँधेरे के बादल छाये रहेंगे जब तक हर हिन्दू के घर से उसके अपनों की अर्थी नहीं उठेंगी.

इन अर्थियों का उठना तो नियति है जिस पर किसी का कोई अख्तियार नहीं है लेकिन इसको अंजाम तक कौन पहुंचाए यह जरूर हमारे अख्तियार में है.

इससे पहले यह काम, पहले कोई विधर्मी करें इसे स्वयं हिन्दुओं को करना होगा. अपने बीच पनपे और पल्लवित हुए उन हिन्दुओं का ही अस्तित्व खत्म करना होगा जो हिंदुत्व में कैंसर की तरह फैले हुए हैं और भारत के अस्तित्व पर ग्रहण लगाए हुए हैं.

मेरा स्पष्ट मानना है कि राष्ट्र के मामले में अहिंसा, शांति और मानवता की दलील थोथी दलीलें होती है.

मैं सभी भिन्न-भिन्न विचारधाराओं और हिन्दू धर्म के कट्टरपंथियों से एक ही बात कहूंगा कि मेरा नज़रिया अलग है, मैं अपने अस्तित्व की डोर भारत से जोड़ता हूँ.

मेरे लिए मेरा राष्ट्र भारत प्रथम है, यही हमारे अस्तित्व का केंद्र बिंदु है. मेरा हिन्दू बने रहना मेरे राष्ट्र के अस्तित्व के बने रहने पर निर्भर करता है.

यदि भारत होगा, तभी हिन्दू भी होगा और जब हिन्दू होगा तो मानवता अपने आप पल्लवित होगी.

हिंदुत्व की निरंतरता हिन्दू से ही बनी हुयी है, यह वह विशाल वृक्ष है जिसकी छाया में मानवता अपने असली रूप में पल्लवित होती है.

इसीलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि यदि भारत को ज़िंदा रखना है और ज़िंदा भारत में खुद ज़िंदा रहना है तो हिन्दुओं की अपनी शमसीर पर हिन्दू के ही रक्त का तिलक लगाना होगा.

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