सरकारी उपक्रमों को बर्बाद करने वाली व्यवस्था से छुटकारा पाकर ही तरक्की संभव

दवा – दारू – खाना – कपड़ा, अगर इन चीजों के धन्धे में आप हैं और असफल हैं, कंगाल हैं और बरबाद होकर रह रहे हैं तो आपको हर तरह के व्यापार से तौबा कर लेना चाहिए. इसके बाद आप सिर्फ फेसबुक पर ज्ञान छांटने में ही सफल हो सकते हैं.

भारत का सरकारी उपक्रम है (था) हिंदुस्तान एंटीबायोटिक लिमिटेड, इंडियन ड्रग एंड फार्मास्यूटिकल लिमिटेड. कई अन्य भी राज्य की दवा कंपनी जैसे RACL, UPDPL आदि. सब के सब बंद पड़े हैं.

हज़ारों एकड़ के जमीन में फैले खँडहर, ऋषिकेश, हैदराबाद, लखनऊ, जयपुर आदि में देखे जा सकते हैं. इन कम्पनी में सारी सुविधाएं उपलब्ध थीं. सरकारी फण्ड की कोई कमी नहीं.

फिर भी इनका नतीजा ये कि देश को दवाई न दे पाए. कोई एक पेटेंट नहीं इनके नाम, इनकी कोई भी दवा किसी के जुबान पर नहीं. कारण सरकारी नौकरी और व्यवस्था – जिम्मेदारी कोई नहीं.

तनख्वाह और सारी सुविधाएं, रिटायर होने पर पेंशन – मरने के बाद बीवी को पेंशन. मस्त रही जिंदगी. फिर भी हड़तालों की भरमार, यूनियनबाज़ी की दुकानों का भंडार, कामचोरी बेमिसाल, माल की चोरी अद्भुत और कमीशन का कोई अंत नहीं.

आज से 15 – 20 – 25 वर्ष पहले जो प्राइवेट कंपनी Lupin, CIPLA, Sun, Alkem, Nicholas, Dr. Reddy, Aurobindo आदि खुलीं, इनसे कम फण्ड और सुविधा होते हुए भी आज विश्व में नाम कमा रही हैं.

इनकी दवाइयाँ लोगों के जुबान पर है, इनके नाम पेटेंट हैं, इनके नाम रिसर्च बेस्ड प्रोडक्ट की भरमार है. इनकी महँगी दवाइयाँ लोग खरीद रहे हैं, दुगुने, तिगुने, चौगने दाम पर…

सरकारी नौकरों ने IDPL, HABL, UPDPL आदि को खा डाला जो उन्ही करदाता के पैसे से चलती थी जिनको उनकी दवाइयों की जरूरत थी. करदाता लूट लिए गए, गरीब और किसान को लूट खाया इन सरकारी भ्रष्ट नौकरों और नेताओं ने मिल कर.

एक और कंपनी है HMT जो घड़ियाँ बनाती है. नैनीताल जाते समय काठगोदाम में रूक कर किसी से भी इसके बरबादी की कहानी सुनिए.

वहां काम करने वाले कर्मचारी घड़ियों के पुर्ज़े पीछे बहती नहर में फेंक देते थे. आगे कुछ दूर इनके दलाल उसको जाल से छान लेते थे. टिफ़िन बॉक्स, कागज़ों, मोज़ों, कमीज के कालर और ब्रीफ़केस में चुरा के ले जाते थे पुर्ज़े.

कुछ बाहर घड़ी के दूकान वाले आधे दाम पर खरीद के पैसे दे देते थे. कुछ वापस सप्लायर के पास, जो वही फिर से HMT को बेच देता था…

आज बड़े-बड़े शोरूम में Titan, Citizen, Reebok, Fastrack, Omega और न जाने कितने ब्रांड झमाझम बिक रहे हैं. बड़ा सा कारखाना, सारी सुविधाएँ होते हुए भी HMT कोई घड़ी न ला पाई, समय के अनुसार quartz घड़ियाँ न बना पाई. और इन सरकारी नौकरों ने इसको बंद करा दिया.

एक कम्पनी और है ITI – Indian Telephone Industries. मॉडर्न इक्विपमेंट से सुसज्जित, हज़ारों एकड़ में फैली रायबरेली, मनकापुर आदि में फैक्ट्री लेकिन ये डिजिटल फ़ोन न बना सके.

जहाँ दूरसंचार क्रांति भारत में आ रही थी वहीँ दूर संचार की इस सरकारी कंपनी को सरकारी नौकरों और यूनियनबाज़ों ने बंद करा दिया.

इनकी R&D में उपलब्ध सुविधाओं से कुछ भी बन सकता था. आज भारत में अपने बनाये मोबाइल फ़ोन हो सकते थे लेकिन कमीशनबाज़ तथा घूसखोर सरकारी नौकरों, यूनियनबाज़ों और नेताओं ने इनको बंद करा दिया.

ITI के बंद होने का नुकसान इतना बड़ा रहा कि BSNL को लैंडलाइन के लिए चीन में बने फ़ोन खरीदने पड़े. ITI का बंद होना मतलब भारत में चीन के बने फ़ोन और मोबाइल का 25000 करोड़ से ऊपर का कारोबार.

और भी बहुत सारे उपक्रम हैं NTC, Hindustan Latex, IPCL, UPTRON आदि… नाम देते-देते मैं थक जाऊंगा और आप लोग पढ़ते-पढ़ते थक जाएंगे…

भारतीय रेल का इन सरकारी नौकरों ने क्या कबाड़ा कर रखा है वो दीखता ही है… किसी भी रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 1 के अलावा कोई भी ठीक नहीं है. फर्श उखड़े हुए, गन्दगी की भरमार, पानी की व्यवस्था नहीं, टॉयलेट नहीं, बिजली पँखे नहीं, बैठने को बेंच नहीं…

यही व्यवस्था अभी तक दी है न सरकारी नौकरो ने… आपको मालूम होना चाहिए कि मंत्रालय बजट में सारी व्यवस्थाएं कराता है… रेलवे के स्टोर में इन सुविधाओं के लिए धन और सामान भी आता हैं.

रेल कर्मचारियों के घरों पर लगे पंखे, AC, बल्ब सब इन्ही स्टोर से उड़ाए हुए होते हैं. ये लोग इसी पर इतराते हैं… इसी चोरी की व्यवस्था को बंद करके जब कुछ स्टेशन को प्राइवेट सेक्टर को व्यवस्था सुधारने को दिया जा रहा है तो बड़ा कष्ट हो रहा है…

और अंत में… USSR (सोवियत संघ) को बरबाद करने वाली इसी व्यवस्था की नक़ल हमने अपनाई जो भारतीय वामपंथियों द्वारा कांग्रेसियों को दी गयी बौद्धिक सलाह पर थी.

जिस व्यवस्था ने USSR को बरबाद किया उस व्यवस्था से जितनी जल्दी छुटकारा पा लिया जाए उतना ही अच्छा… हमको जर्मनी, फ्रांस और जापान जैसी व्यवस्था लानी होगी… सरकार व्यवसायी नहीं होनी चाहिए.

सरकार का काम व्यवस्था सञ्चालन और नीति नियमन का होना चाहिए उससे आगे कुछ नहीं, तभी देश की और जन मानस की तरक्की होगी…

इस व्यवस्था से छुटकारा पाने के हर कदम पर वामपंथी चीखेंगे ही, कांग्रेसी भी चीखेंगे, लालू जैसे सज़ायाफ़्ता लोग भी दहाड़ें मारेंगे… इनकी परवाह न करते हुए हुए, इनको कुचलते हुए, इनके द्वारा पोषित व्यवस्था को ख़त्म करना ही अच्छा है.

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