जब पहले ही तय था NSUI अध्यक्ष तो मंगाए ही क्यों आवेदन!

दिल्ली में अपनी नैया डुबोने के बाद कांग्रेस ने अपने आनुषांगिक संगठन एनएसयूआई के अध्यक्ष अमृत धवन का इस्तीफा मंगवा लिया था. इसके बाद राहुल गांधी के निर्देश पर नये अध्यक्ष के चुनाव के लिये लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाने की बात कही गयी.

कार्पोरेट विज्ञापन की तरह बाकायदा इस संगठन के अध्यक्ष के लिये आवेदन मंगाये गये. शर्त यह रखी गयी कि आवेदनकर्ता वही हो सकता है जिसने कम से कम एक साल तक इस संगठन में सक्रिय रुप से कार्य किया हो.

पूरे देश से हजारों की संख्या में आवेदन पत्र प्राप्त हुये. उसमें से योग्यतानुसार छंटनी करके सात नाम चुने गये. उन सात नामों में मनीष शर्मा नामके एक युवा कार्यकर्ता का नाम सबसे उपर था.

लिहाजा चयन समिति ने एनएसयूआई के अध्यक्ष पद के लिये मनीष शर्मा के नाम का प्रस्ताव राहुल गांधी की स्वीकृति के लिये भेज दिया. राहुल गांधी के अनुमोदन के बाद ही मनीष शर्मा अध्यक्ष बनाये जाते.

राहुल गांधी ने आज एनएसयूआई के अध्यक्ष पद के लिये अपना अनुमोदन जारी कर दिया है. लेकिन इस अनुमोदन में चयन समिति द्वारा नामित मनीष शर्मा का नाम न होकर फिरोज खान का नाम आ गया है. फिरोज खान कश्मीर घाटी के बताये जा रहे हैं.

इस पूरे मसले पर राहुल गांधी का कहना है कि फिरोज का चयन उन्होंने खुद उसका साक्षात्कार लेकर किया है. यह बात अलग है कि उस साक्षात्कार में अध्यक्ष पद के दावेदार के रुप में सिर्फ फिरोज खान ही शामिल था.

मतलब साफ है. कांग्रेस चाहे जितना भी कोशिश करे कि वह अपना नेतृत्व लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत चुनेगी, लेकिन गांधी परिवार उस कोशिश को कभी सफल होने नहीं दे सकता.

अगर इस पार्टी में लोकतंत्र आ गया तो सबसे पहले सभी कांग्रेसी मिलकर राहुल गांधी को ही निकाल बाहर कर देंगे. इस सच के बारे में गांधी परिवार बहुत अच्छी तरह से समझता है. इसलिये वह बार बार लोकतांत्रिक प्रक्रिया का ढोंग करके, करता वही है जो वह पहले से सोचे रहता है.

नहीं तो जब फिरोज खान को ही छात्र संगठन का अध्यक्ष बनाना था तो इससे पहले चयन समिति बनाकर आवेदन मंगाने की क्या जरुरत थी?

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