एक-एक तंतु का गणित है प्रकृति के पास

एक नन्ही बालिका खाली सड़क के डिवाइडर पर छोटे-छोटे कदमों के साथ आगे बढ़ती जा रही है.. रक्त चंदन जैसी पनही है और सुगापंखी रंग की फ्रॉक है. छुई-मुई के पत्तों से सुनहरे काढ़े केश हैं और भाल पूर्णिमा का चद्रंमा है.

चेहरे पर मुस्कान लिली-सी छिटक उठी है, समुद्र की स्वतंत्र धारा की तरह गाल के कोरों से टकराकर पुनः लौटती है फिर से टकराने के लिए. खिलखिलाहट की बारम्बारता, मुख पर सृजन और संहार-से खेल रहे हैं. उसके दायें हाथ में पीला गुलाब है, मानों वह गुलाब पीताम्बरी आकाश का एक भाग बनकर सम्मिलित हो गया हो.. उर्जाकृत होकर !

वह बार बार कोयल को चिढ़ा रही है, कू….  की मधुर ध्वनि जब उसके कोकिल कण्ठ से निकलती है पेड़-पौधे चुप होकर सुनते हैं.. कोयल भी कम नहीं है जो प्रत्युत्तर में कू.. न कहे ! विजयश्री इन दोनों में से किसी को न मिलेगी, यह तय है. विजयश्री केवल और केवल ‘हठ’ के पास सुरक्षित रह जाती है.

बालिका को क्या ज्ञात हुआ होगा इतना सब मेरे सामने घटित हो रहा है और मुझे कुछ ज्ञात ही नहीं ?  बालिका जो प्राप्त हो रहा, वह अपने सभी रोमरंध्र खोलकर प्रकृति-पान कर रही है.

प्रकृति ठीक ऐसी ही होती है, जो आप नहीं जानते वह प्रकृति है.. एक-एक तंतु का गणित है उसके पास. हमलोग सिर्फ आउटपुट की तरह हैं, इनपुट जो है वह जीवन के पीछे है.

– कुंदन कामराज

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