डाह से डरिए! डाह की आग ने राख की है अच्छे अच्छों की ज़िंदगी

डाह से डरिए. डाह की आग ने अच्छे अच्छों की जिंदगी राख की है. डाह ईर्ष्या नहीं है, ईर्ष्या से बहुत आगे की बात है.

हम सभी ईर्ष्या के दौर से गुजरते हैं. पड़ोसी की नई चमचमाती कार, रिश्तेदार का नया महंगा चमचमाता घर, दफ़्तर में किसी साथी की पदोन्नति, बग़ल में बैठे व्यक्ति के सुंदर कपड़े, देवरानी के कीमती ज़ेवरात – यह सब ईर्ष्या के सबब हो सकते हैं. अक्सर हमें इस बात का आभास भी नहीं होता. हम अपनी ईर्ष्या के justification के लिए बहाने ढूँढ लेते हैं. दफ़्तर का साथी जिसकी पदोन्नति हुई, वह बॉस का चमचा था. देवरानी के ज़ेवरात तो कीमती हैं पर अक़्ल उसकी मंद है. अज्ञेय बन्तू घमंडी लेखक थे (असल बात यह है कि मुझे उनके बराबर लिखने का शऊर नहीं था).

ईर्ष्या मनुष्य के स्वभाव में है और कहीं गहरे शायद इस मुश्किल दुनिया में उसकी survival strategy है. सामान्य बुद्धि से लगता है कि उम्र और अनुभव के साथ ईर्ष्या के पीछे की असलियत शायद खुलनी चाहिए. पर जिन्दगी का खेल देखिए – अक्सर उम्र बढ़ने के साथ ईर्ष्या की गाँठ और भी मज़बूत होती चली जाती है और आदमी स्टील में तब्दील होता चला जाता है. किसी किसी भाग्यवान को शायद मनुष्य के स्वभाव में गहरे गड़ी इस बात का आभास हो और वह चेतनापूर्वक ईर्ष्या की धूल झाड़ कर खड़ा हो जाय. पर हममें से अधिकांश तो एक सुरंग में अचेतन जीते हैं और अचेतन ही मर जाते हैं.

पर डाह !

डाह की बात ही कुछ और है. डाह में आपको अंधा और बहरा बनाने की अचूक ताक़त है. डाह ने दशरथ की जान ली, राम को वनवास में भेज दिया, कुरु वंश का नाश करवा दिया.

यही वह डाह का बुखार है जिसमें अरुण शौरी और कुछ हद तक गोविन्दाचार्य जैसे लोग तप रहे हैं. बुखार जब बहुत तेज़ होता है तो अक्सर आदमी सन्निपात में बड़बड़ाने लगता है. फिर बुखार नहीं दिखता, सिर्फ दु:स्वप्न दिखते हैं. मोदी की डाह ने आँखों पर ऐसा पर्दा डाला कि यदि गलती से मोदी से कोई अच्छा काम भी हो जाय तो वह दिखता नहीं है. मोदी के दुश्मन – चाहे वे भारत तेरे टुकड़े होंगे वाले हों या सरेआम एक बेज़ुबान जीव का सर काट कर जश्न मनाने वाले हों या लालू जैसे सज़ायाफ्ता हों – सब जानी दोस्त से लगते हैं.

ध्यान रहे, यह बीमारी सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है. हममें से अधिकांश जाने अनजाने अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक या सामाजिक जीवन में या तो इससे रूबरू होते हैं या कम से कम बग़ल से होकर गुज़रते हैं. अक्सर अनजाने, अनपहचाने.

जलने का ख़तरा है. आँखें खोल कर रखिए. हजार हजार बहाने आएँगे जो इस आग को justify करेंगे. उनसे डरिए.

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