इतिहास आगाज़ को नहीं अंजाम को तवज्जो देता है, द्रोणाचार्य का अंजाम तो याद ही होगा!

धृष्टद्युम्न ने आंख बंद कर बैठे शोकाकुल द्रोण का सर तलवार के एक वार से धड़ से अलग कर दिया और केश पकड़कर हवा में लहराते हुये उछाल दिया….ये दृश्य देखकर अर्जुन का मन विषाद से भर गया.

अर्जुन धिक्कारने लगा… ना जाने खुद को या धृष्टद्युम्न को या पांडवों को जो धृष्टद्युम्न के इस कृत्य को देखकर मौन रहे.

कृष्ण को फिर अर्जुन की क्लास लेनी पड़ी… पार्थ विचलित मत हो… धृष्टद्युम्न ने बेरहमी से जिसकी हत्या की वो तुम्हारा गुरु नहीं, बल्कि शत्रु था, जिसने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिये अधर्म का पक्ष चुना. गांडीव उठाओ और नष्ट कर दो हर उस शक्ति को जो अधर्म के पक्ष में है… रणभूमि में ना कोई तुम्हारा गुरु है, ना बंधु है.

जिसने भी तुम्हारे खिलाफ शस्त्र उठाया है वो तुम्हारा शत्रु है.

पुत्रमोह द्रोणाचार्य के चरित्र पर एक काला धब्बा है.

पुत्रमोह के कारण ही द्रोण ने अपने गुरुभाई द्रुपद से शत्रुता मोल ली, द्रुपद से प्रतिशोध के लिये हस्तिनापुर के वेतनभोगी कर्मचारी बने, एक कर्मचारी का कर्तव्य निभाने के लिये कर्ण और एकलव्य के साथ अन्याय किया…

वो पुत्रमोह ही था जिस कारण अपने स्वामी के प्रति भी पूर्ण निष्ठावान ना रह सके, गुप्त रूप से अश्वत्थामा को अर्जुन से श्रेष्ठ धनुर्धर बनाने का उपक्रम करते रहे… और अंततः सब जानते हुये भी अधर्म के पक्ष में जा खड़े हुये…

पुत्रमोह ऐसा व्यक्तिगत स्वार्थ था जिसने प्रतिभा के मामले में परशुराम और संदीपन के समकक्ष माने जाने वाले द्रोणाचार्य की कीर्ति युद्धभूमि में काटकर मिट्टी में मिला दी.

द्रोण कितने भी प्रतिभाशाली रहे हों, कितने ही श्रेष्ठ धनुर्धर रहे हों लेकिन व्यक्तिगत स्वार्थ ने उनके कद को बौना कर दिया.

श्रीकृष्ण के श्रीमुख से कही गयी, गीता में लिखी वो सीख… जो भारत में रहने वाला लगभग हर औसत पढ़ा लिखा व्यक्ति जानता है… कर्म करो, फल की इच्छा मत करो…

जिसका विस्तार मेरे अनुसार ऐसा है कि… फल की इच्छा करो भी तो उस इच्छा के गुलाम होकर अधर्म के पक्ष में हरगिज मत खड़े हो… वरना इतिहास आपके वर्तमान की कालिख धो नहीं सकेगा… और जब ये वर्तमान भविष्य का इतिहास बनेगा तब उस इतिहास पर कालिख ही लगी होगी.

अरुण शौरी कभी रहे थे महान राष्ट्रवादी, पर आज वो जब व्यक्तिगत स्वार्थों के पूरा ना होने के क्षोभ में राष्ट्रविरोधी शक्तियों के साथ जा खड़े हुये हैं तब मुझे कोई संशय नहीं है… उनका इतिहास उनके वर्तमान के विरोध का गतिरोध नहीं बन सकता… इतिहास आगाज को नहीं अंजाम को तवज्जो देता है.

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