क्या गाँधी को आदर्श मान कर चल सकता है हमारा देश?

गाँधी फिर से चर्चा में हैं… गांधीजी पाचक की गोली हैं, बिना उनके हमारा खाना हज़म नहीं होता… पर मुझे नया कुछ नहीं कहना…  क्योंकि गाँधी से मुझे कोई व्यक्तिगत शिकायत नहीं है.

अगर आपको गाँधी व्यक्तिगत रूप से बहुत अच्छे लगते हैं, तो आप बेशक उनसे रिश्तेदारी कर लीजिए… बहुत सीधे-सरल व्यक्ति थे.. बहुत ईमानदार थे.. बड़े भले मानस थे… पर मुझे उन्हें ससुर या समधी नहीं बनाना है…

गाँधी तीन दशक तक भारत के नेता थे, और उसके बाद पिछले सात दशकों से हमारा हर राजनीतिक संवाद गाँधी के नाम की छाया में हुआ. इसलिए मैं गाँधी के आकलन का सिर्फ एक पैमाना मानता हूँ – गाँधी के कार्य और सिद्धांत देश-हित में हैं या नहीं? क्या हमारा देश गाँधी को आदर्श मान कर चल सकता है? गाँधी को रिजल्ट की कसौटी पर परखिए, गाँधी एक असफलता नहीं, आपदा नजर आएँगे.

चालीस करोड़ के देश में गाँधी तीस करोड़ हिन्दुओं के एकक्षत्र नेता थे… कोई गाँधी के सही या गलत निर्णयों पर सवाल नहीं खड़ा कर सकता था. कभी ऐसा नहीं हुआ कि गाँधी ने जनता को आवाज दी हो तो जनता ने कोई कसर छोड़ी हो. रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट क्या मिला?

यह पूँजी लेकर एक लाख अंग्रेजों के खिलाफ तीस साल तक गाँधी कौन सी लड़ाई लड़ रहे थे? और बदले में पाया क्या? भारत के तीन टुकड़े? लाखों लाशें? लाखों महिलाओं का बलात्कार?

तीस में से पंद्रह साल तो उन्हें यह जानने में लग गए कि अंग्रेजों से “आजादी” माँगनी है… पंद्रह साल तक तो गॉड सेव द किंग ही गाते रहे, डॉमिनियन-स्टैटस ही माँगते रहे.

और जब भारत को आजादी मिली उसके दस सालों के भीतर सत्तर के करीब दूसरे देशों को आजादी मिली… तो उन्हें किस गाँधी ने आजादी दिलाई?

क्या है गाँधी की उपलब्धियों का सच… गाँधी ने क्या दिया? असहयोग आंदोलन से क्या पाया? नमक सत्याग्रह से क्या पाया? भारत छोड़ों आन्दोलन से क्या निकला? और सबसे बड़ा फ्रॉड – दक्षिण अफ्रीका में गाँधी जी के बीस साल के सत्याग्रह के नतीजे क्या निकले?

मित्रों से अनुरोध है, सिर्फ इस कसौटी पर तथ्यात्मक चर्चा करें… इस फकीर की सच्चाई सामने आ जाएगी… गाँधी हिन्दुओं के शत्रु थे, मुसलमानों के हिमायती थे, भगत सिंह को मरवाया… वहाँ तक जाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी… गाँधी की जो मजबूत जमीन है, उसी में तथ्यों का एक लोटा पानी डाल कर खोदें… गाँधी का मूल्यांकन हो जाएगा.

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