दुर्दशा की मारी ‘पाकीज़ा’ की हीरोईन के बेटे ‘राजा’ पर क्या कोई ठोक सकता है फतवा?

माँ के लिए कहा गया है –

मेरी माँ मेरे लिए भगवान है, माँ के चरणों में रहना वरदान है. माँ का हाथ सिर पर होने से सुख मिलता है, दुनिया में सब चीजों का महत्व बाद में है, सबसे ऊपर तो मेरी माता का स्थान मेरे लिए है! यह भावना अक्षरश: सत्य है. पूरी दुनिया में माँ का स्थान सर्वश्रेष्ठ माना जाता है. तभी तो किसी ने गाया है-

“ऐ माँ तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी.”

आदमी तो आदमी जानवर, पशु, पक्षी, जीव, जन्तु, सभी माँ के महत्व को पहचानते हैं. गाय, भैंस, घोडा या अन्य कोई पशु का जब जन्म होता है तो उसका शिशु जमीन पर पड़ा रहता है. पर उसकी माँ, उसे अपनी जिव्हा से चाट चाट कर आधे घण्टे में ही अपने ममत्व की ऊर्जा से इस लायक कर देती है कि हिरण या अन्य जानवरों के शिशु थोड़ी ही देर में कुलांचे भरने लगते है.

माँ के महत्व को भारतीय संस्कृति में सर्वोच्च स्थान दिया गया है. पर धर्म और आस्था की पराकाष्टा ही कहना होगा कि आदि युग में पिता के आदेश का पालन करने के लिए परशुराम ने अपनी माता का ही वध कर दिया था. यद्यपि उनके उस कृत्य का उद्धेश्य और भूमिका का सन्दर्भ एक दम अलग था.

आज के युग में ईश्वर तुल्य माँ की कोख में कभी कभी कपूत सन्ताने भी पैदा हो जाती है. मानवता के इतिहास में सबसे पहले कुपूत बेटे का सन्दर्भ ईसा पूर्व 284 वर्ष का मिलता है. जब ‘अमास्त्री’ की रानी ‘हेराक्लिया’ की हत्या उसके बेटे ने कर दी थी. मिश्र देश में ईसा पूर्व 101 वर्ष में ‘पिटोलेमी’ ने अपनी माँ “क्लियोपात्रा 3 ” का वध कर दिया था. इसी प्रकार रोमन साम्राज्य में नीरो ने 59 ईस्वी में अपनी माता “अग्रीपिन्ना” को जान से मार डाला था.

आधुनिक युग में ऐसे कुपूतो में 1930 में हत्यारे पुत्र “हेरी फेक्”स का नाम प्रमुख है जिसने इग्लैण्ड में अपनी माँ को जान से इसलिये मार डाला था कि जिससे उसे बीमा के पैसे मिल जाए. वैसे 1945 में अमेरिका के एटम बम फोड़ने के बाद ओकिनावा युद्ध में परास्त होने के बाद जापानी नागरिकों ने बड़े पैमाने पर माता बहिनों और सभी औरतों को जान से मार डाला, जिससे कि वह अमेरिकन सिपाहियों के वलात्कार से बच सकें.

ऐसे कुपूतों की लम्बी कहानी इतिहास में मौजूद है .पर उन सबसे भयानक और दिल दहलाने वाली घटना 1 जून 2001 को नेपाल मे धिपेन्द्र ने नेपाल में अन्जाम दी, जिसमें राजा की कुर्सी हथियाने के लिए पूरे राजपरिवार को गोलियों से भून दिया. मरने वालों में उसकी माँ ‘ऐश्वर्या’ पिता भाई बहिन सभी मौजूद थे.

आज के जमाने में बूढे माँ बाप को बच्चों द्वारा ठुकराने के अनेक किस्से यदा कदा देखने को मिलते हैं. इन्हीं किस्सों को फिल्मी पर्दे पर खूबसूरती से दरशाने के लिए अमिताभ बच्चन और हेमा की प्रसिद्ध फिल्म “बागवान” को सदैव याद किया जाता है. फिल्मी दुनिया के पर्दे पर जो कुछ होता है और हकीकत में इस चमक की आड़ में कितना दर्द और कष्ट समाया है, उसे दर्शक कभी नहीं समझ सकते.

ऐसा ही एक मन को झकझोर कर रख देने वाला प्रकरण, प्रसिद्ध फिल्म “पाकीजा” की अपने समय की सुन्दर हीरोईन “गीता कपूर” की जिन्दगी के अन्तिम पड़ाव में देखने को मिल रहा है.

गीता कपूर की दो सन्तानें हैं एक लड़का जिसका नाम ‘राजा कपूर’ है और दूसरी बेटी ‘पूजा’ है. अपने आँचल के खून से बने दूध को पिलाकर गीता ने किन उम्मीदों के सपनों को सजोकर ‘राजा’ और ‘पूजा’ को पाला पोसा होगा? कितनी रातें ‘गीता’ ने जाग जाग कर काटी होंगी? अपने नौनिहालों को लोरियां गाकर सुलाने के लिए कितने पापड़ बेले होंगे? कोई नहीं जानता.

पर अब जब ‘गीता कपूर’ की उम्र 58 साल की हो गई, उसका एक मात्र सहारा ‘बेटा बहू’ और ‘बेटी’ के अलावा कोई नहीं है. क्या हम सोच सकते हैं कि उनका ‘राजा’ बेटा गीता को मारता पीटता है. कई दिनों तक घर में बन्द करके रखता है. चार चार दिन में एक बार खाना खाने को देता है. जिससे उसकी माँ भूख से तड़प तड़प कर मर जाए.

अब जब ‘गीता’ भूख और अपोषण के कारण जर्जर हो जाती है, तो उसका बेटा ‘राजा’ उसे मुम्बई के गोरेगाँव स्थित ‘एस आर वी अस्पताल ‘ मे भर्ती कर आता है. अस्पताल ने इलाज के लिए राजा को पैसे जमा कराने का कहा. ‘राजा’ एटीएम से पैसे निकालकर आने का कह कर चला जाता है. लौट कर नहीं आता.

अस्पताल के लोग राजा को ढूँढने उसके घर जाते हैं. पता चलता है बेटा बहू घर खाली करके लापता हो गए. मरीज की जान बचाने के लिए मानवीय आधार पर अस्पताल प्रबन्धन ‘पाकीजा’ फिल्म की हीरोईन की जान बचाने के लिए इलाज करता है. बेटी को फोन लगाकर जब बात करते हैं तो बेटी पूजा ‘रॉंग नम्बर’ कह कर फोन काट देती है.

अस्पताल के लोग पुलिस को सूचना देते हैं. इस बात का पता चलने पर फिल्म निर्माता ‘अशोक पंड़ित’ और ‘रमेश तोरानी’ आगे आते हैं. अस्पताल का एक लाख पचास हजार रूपयों का बिल चुकाकर एक समय की प्रसिद्ध रही हीरोइन “गीता कपूर” को सरकारी वृद्धाश्रम में भर्ती कर आते हैं.

गीता कपूर, 58 वर्षीय पाकीजा की हीरोईन, जो कभी अपने लाड़ले को सुलाने के लिए लोरियां गाती रही होगी, आज खून के घूंट पीकर आंसुओं मे नहाकर कैसे दिन काट रही होगी? क्या कोई कल्पना कर सकता है?

हमारा समाज, बॉलीवुड, सरकार, समाज सेवी संस्थाएं हजारों करोड़ रुपये इधर उधर नाच गाने हवाई ठिल्लियों में खर्च करते रहते हैं. क्या गीता कपूर के दुख दर्द की कहानी उन्हें पता नहीं है? आज जो अपने आप को बड़ी बड़ी हीरोईन कहलाकर करोड़ों अरबों रुपयों में झूमती इठलाती अपना हुस्न बिखेरती, इधर उधर मटकने वाली, यह बॉलीवुड की छम्मक छल्लो सुन्दरियों को क्या पता नहीं है कि एक दिन जब उनका हुस्न उनसे बेपर्दा होजायेगा, तो उनकी भी हालत, ईश्वर न करे कभी “गीता कपूर” जैसी हो जाएगी फिर उन्हें कैसा लगेगा.

कानूनी किताबों में बूढ़े माँ बाप का लालन पोषण अगर बेटा बेटी नहीं करते हैं तो उन्हें सजा देने की व्यवस्था है. पर क्या पुत्र की बेरुखी से घायल माँ का प्यार सब कष्ट सहने के बाद कभी अपनी सन्तान को सीखचों के पीछे इसलिये भेज देगी कि उसने उसकी देखभाल नहीं की. कदापि नहीं. ऐसे में तो सच में कहीं कोई “फतवा” कहीं मिलता हो तो उसे जरूर गीता के बेटे राजा पर जम करके ठोक देना चाहिए.

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