बौद्धिक गुलामी : खुद को ही पहचानने विदेशी भाषा का सहारा

अमीष त्रिपाठी की नई पुस्तक माता सीता पर आई है. यह एक सराहनीय प्रयास है और लेखक प्रशंसा के पात्र हैं.

पुस्तक अंग्रेजी में है. इसलिए हजारों की संख्या में बिकेगी. अगर यह हिंदी में होती तो शायद सैकड़ा पार करना मुश्किल होता.

यहां हैरान करने वाली बात यह है कि इसका कारण वे नहीं जो अन्य भारतीय भाषा तो जानते हैं मगर हिंदी पढ़ना नहीं, बल्कि वे लोग हैं जो हिंदी जानते हैं मगर फिर भी सिर्फ अंग्रेजी की ही किताब पढ़ते हैं. और इनकी संख्या बहुत बड़ी है.

सीधे-सीधे कहें तो अगर अमीष त्रिपाठी यही किताब हिंदी में मूल रूप से लिखते तो यही हिंदी भाषी लोग जो अंग्रेजी में खरीद कर पढ़ेंगे, कभी नहीं खरीदते.

मैं यहां इन लोगों की इस मानसिकता की बात कर रहा हूँ, जो कि चिंता का विषय है. जिस पर हम विचार ही नहीं करते. उलटे अधिकांश के लिए यह महत्वपूर्ण विषय ही नहीं होगा.

वे तो यह भी कह सकते हैं कि जानकारी जिस भाषा में भी मिले अच्छा है. वो यह भी कह सकते हैं कि इस तरह से हम अंग्रेजी में दखल दे रहे हैं और अंग्रेजी पढ़ने वाले विदेशियों के बीच अपनी विरासत को ले जा रहे हैं. मगर वे समस्या के मूल को नहीं समझ रहे.

ये पुस्तकें विदेशियों को कितना प्रभावित कर पाती है, कहना मुश्किल है मगर इस तरह से अपने घर में ही अपनी संस्कृति कमजोर जरूर हो रही हैं, यह दावे से कह सकता हूँ.

मैं यहां एक बार फिर स्पष्ट कह दूँ कि समस्या सीता माता की विस्तृत जानकारी, एक नई दृष्टिकोण में दुनिया को देने से नहीं है, बल्कि हिंदी भाषी द्वारा इसे अंग्रेजी में खरीद कर पढ़ने वालो की मानसिकता को लेकर है.

सरल शब्दों में कहना हो तो सीता माता के द्वारा ये लोग अंग्रेजी को तो समृद्ध कर रहे हैं मगर हिंदी (देशी भाषा) को कमजोर. और इस तरह से जाने-अनजाने अपनी संस्कृति को भी कमजोर कर रहे हैं.

भाषा संस्कृति का महत्वपूर्ण अवयव है. भाषा संस्कृति को ज़िंदा रखती है. भाषा अगली पीढ़ी तक संस्कृति को ले जाने का वाहन है. अगर यह वाहन ही कमजोर कर दिया जाए या इसकी देखरेख सही ढंग से ना की जाए तो भाषा अपनी पटरी से उतर जाती है सड़क पर दौड़ने योग्य नहीं रह पाती और ऐसा होते ही संस्कृति अगली पीढ़ी तक ना पहुंच कर समय के पीछे कहीं छूट जाती है. और अंत में इतिहास में लुप्त हो जाती है.

यह प्रक्रिया धीरे-धीरे होती है मगर होती मज़बूती से है. मज़बूत होती अंग्रेजी अपने साथ किस तरह से विदेशी संस्कृति, सोच और जीवन शैली को ला रही है हम इसे देख तो रहे हैं मगर इसके प्रभाव से अनजान हैं.

हम किस हद तक बाहरी रहन-सहन और खान-पान को पसंद करने लगे हैं, चारों ओर देखा जा सकता है. यूं तो इसमें कोई बुराई नहीं, प्रथम दृष्टि में यही लगता भी है मगर यह प्रवृत्ति फिर धीरे-धीरे अपने खान-पान, जीवन शैली और रहन-सहन से दूर करती जाती है.

और एक लेवल पर पहुंच कर अपनी ही संस्कृति को हेय दृष्टि से देखने लगती है. क्या ऐसा हो नहीं रहा? खूब हो रहा है.

मुझे यहां अपनी हजारों साल की संस्कृति से चिपके रहने का शौक बेवजह नहीं, यहां यह बताना चाहता हूँ कि हमारी समृद्ध संस्कृति में ऐसे अनेक मूल्यवान जीवन के मूल हैं जो हमारे ही फायदे के लिए हैं, जिन्हे हम छोड़ कर अपना ही अहित करते हैं.

हजारों साल की तपस्या से उपजा ज्ञान, जो हमारे पूर्वज हमें अपने रीति-रिवाज, त्योहारों, परम्पराओं और पौराणिक कथाओं में दे गए हैं, उससे दूर हो कर हम अपना कितना नुकसान कर रहे हैं हम खुद नहीं जानते.

कोई एक अमीश त्रिपाठी आकर इस ज्ञान के समुद्र को हमें अंग्रेजी में कितना बता पायेगा? क्या यह व्यावहारिक रूप से सम्भव होगा? उसकी जगह अपनी भाषा में अपने ज्ञान को सीधे पढ़ना कितना सरल और सहज है.

कोई यहां कह सकता है कि अपने ज्ञान को विदेशी भाषा में पढ़ना कैसे एक समस्या हो सकती है? उनके लिए यह कहना ही पर्याप्त होगा कि ऐसा करना एक मानसिकता है, जिसे बौद्धिक गुलामी कह सकते हैं. यह किसी भी अन्य गुलामी से अधिक खतरनाक है.

यह बेहद बचकानी बातें लग सकती हैं मगर ये सब कितना विनाशकारी है, समझना कोई मुश्किल काम नहीं. सोचिये, हम योग नहीं करना चाहते थे मगर योगा करने को तैयार हो गए. यह कितना हास्यास्पद है.

ये वही लोग हैं जो सीता को अंग्रेजी में पढ़ना चाहते हैं. ये वही लोग हैं जो अपने बच्चों को किसी कॉन्वेंट में पढ़ाने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हो जाते हैं. इनकी संख्या किस तेजी से बढ़ रही है, हैरान करती है.

ये सब मिशनरी की जड़ें मजबूत कर रहे हैं. ये मिशनरी बौद्धिक क्षेत्र में क्या परोसेंगी, समझा जा सकता है. यह रोज थोड़ा-थोड़ा जहर खाने के समान है. इन अंग्रेजी मिशनरी की अपनी संस्कृति, अपनी परम्परायें हैं. इनके लिए सीता माता एक काल्पनिक पात्र हो सकतीं हैं, आदर्श नहीं.

किसी कहानी के पात्र और ऐतिहासिक आदर्शों में बड़ा फर्क है. इन दोनों के प्रभाव क्षेत्र में भी बड़ा अंतर होता है. काल्पनिक पात्र का प्रभाव सीमित और क्षणिक होता है, जबकि पौराणिक आदर्श जीवन पर्यन्त हमें प्रेरित करते हैं, हमारे सामाजिक मूल्यों से जुड़ जाते हैं.

ये हमारा अभिमान बन जाते हैं जिससे फिर हम सतत ऊर्जा लेते रहते हैं. यह हमारी सामाजिक परम्पराओं के प्रतीक बन जाते हैं. यह हमारे दिल में बसते हैं और हमें सांस्कृतिक रूप में ज़िंदा रखने में अहम भूमिका अदा करते हैं.

पुस्तक Sita: Warrior of Mithila में बेशक सीता माता को एक योद्धा के रूप में चित्रित किया गया होगा. यह भी दर्शाया गया है कि वे शक्तिशाली हैं, इतनी कि किसी-किसी जगह तो उनके हाथों ही रावण के वध की कहानी भी है.

सीता अपने मन और मस्तिष्क से स्वतंत्र हैं. उन्होंने जीवन के अनेक निर्णय खुद लिए हैं. यहाँ तक कि हनुमान को लंका से इसलिए लौटाया कि राम स्वयं आकर रावण का अंत करें और उन्हें वापस ले जाएँ, बाद में जंगल में रहने का कठोर निर्णय भी उनका अपना था जो उनके दृढ़ व्यक्तित्व का परिचय कराता है.

यह सब सत्य है और इसके अनेक प्रमाण भी हैं. मगर इन सब गुणों के विस्तृत वर्णन के बावजूद भी हमारे अवचेतन मन में माता सीता की वही छवि बनी रहेगी जो हमारी भाषा में हमे सुनायी गई है या हिंदी के टीवी सीरियल में बताई गई है.

किसी भाषा के रहस्यमयी प्रभाव को इस उदाहरण से भी समझा जा सकता है कि फिल्म बाहुबली का हीरो हमारे लिए हमारा आदर्श बन कर हमसे जुड़ जाता है और हमारा नायक बन जाता है जबकि यही फिल्म का पात्र विदेशी दर्शक के लिए एक शक्तिशाली हीरो से अधिक कुछ नहीं.

दूसरी तरह से कहें तो अगर यही फिल्म अंग्रेजी में बनी होती तो शायद बाहुबली हमारा नायक ना हो कर फिल्म का हीरो मात्र रह जाता और हम बाहुबली से भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ पाते.

अमीष त्रिपाठी ने सीता के व्यक्तित्व को अंग्रेजी में लिख कर अंग्रेजी पाठकों के लिए एक नए पात्र की रचना भर की है, जबकि यही पुस्तक अगर हिंदी में लिखी और पढ़ी भी जाती तो ऐतिहासिक योद्धा सीता माता का आदर्श रूप हमारे मन में स्थापित हो जाता, जोकि सच भी है.

फिर आने वाली पीढ़ियां कहतीं कि माता सीता का अपहरण सिर्फ लक्ष्मण रेखा पार करने भर से नहीं हुआ था बल्कि उन्होंने अकेले रावण और उसकी सेना के साथ युद्ध लड़ा और अनेक असुरों को मारने के बाद ही उनका अपहरण कर पाना रावण के लिए सम्भव हो पाया.

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