उपकार : मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती

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जब भी किसानों की बात निकलती है तो मेरे फ़िल्मी दिमाग में सबसे पहली छवि उभरती है फिल्म उपकार में किसान बने मनोज कुमार की.

और बस याद आता है वो गीत मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती मेरे देश की धरती. वाह क्या फिल्मांकन था उस गाने का.

उगते सूरज के साथ अपने बैलों को लेकर खेतों में पहुँचते किसान, पुरुषों के साथ गाँव की औरतों का उतनी ही मेहनत करना और उसका उत्सव मनाना. गाँव की नदियाँ, मंदिर की घंटियाँ, उड़ती मिट्टी के गुबारों के साथ गीत के बोल… बैलों के गले में जब घुंघरू जीवन का राग सुनाते हैं… पूरे दृश्य को जीवंत कर जाते हैं.

और ऐसा सिर्फ फिल्मों में दर्शाया गया है इसलिए ये इतना सुहाना लगता है ऐसा नहीं है, सोशल मीडिया पर आज भी कई मित्र ऐसे हैं जो गाँव से हैं, और खेतों में काम करते हुए जब वो अपनी फोटो शेयर करते हैं तो याद आती है बचपन में भारत देश पर लिखे निबंध की पहली पंक्ति, जो कक्षा चौथी से लेकर आठवीं तक हर बार एक ही रहती थी कि “हमारा देश कृषि प्रधान देश है”.

क्या हमारा देश वाकई कृषि प्रधान देश है?  किसान कौन होता है जो अपनी धरती को माँ समान पूजता है, उसमें हल जोतते समय उसके भाव यही रहते हैं कि उसे माँ की कोख से उग रहे नए जीवन की देखभाल की ज़िम्मेदारी सौंपी है. और उसके लिए वो दिन रात मेहनत करता है. क्या बारिश, क्या गर्मी, क्या ठण्ड… उसे तो बस एक ही लगन होती है, बस धरती माँ का आँचल हमेशा हरा रहे.

और जो व्यक्ति धरती को माँ मानकर उसके लिए मेहनत करता है, उसके मन में अपने देश अर्थात माँ भारती के लिए उतना ही प्रेम और सम्मान होता है… ऐसा ही किरदार मनोज कुमार ने इस फिल्म में निभाया है. एक देशभक्त किसान.

तो फिर मध्य प्रदेश में हो रही अराजक घटनाओं में जो किसान देश में अव्यवस्था फैलाने की कोशिश कर रहे हैं, वो देशभक्त क्यों नहीं है? क्या उन्हें दिखाई नहीं दे रहा जिस संपत्ति को वो आग लगा रहे हैं वो इस देश की ही संपत्ति है. जिन खाद्य पदार्थों को वो नष्ट कर रहे हैं, वो ऐसा करके उनकी धरती माँ की कोख को ही उजाड़ रहे हैं.

और यदि वो ऐसा कर रहे हैं, तो या तो वो किसान नहीं या देश भक्त नहीं. हाँ ये वो भटके हुए नौजवान हो सकते हैं, जिसका किरदार प्रेम चोपड़ा ने निभाया था, जो फिल्म में किसान मनोज कुमार का छोटा भाई होता है, जो आधुनिक युग के चलन और व्यसन के लालच में फंसकर अपने ही भाई को धोखा दे जाता है.

और फिल्म के अंत में मनोज कुमार अपने भाई को उस समय सही रास्ते पर ले आता है जब वो अपनी गलत हरकतों के कारण पुलिस के शिकंजे में फंस जाता है. और उसे वापस अपने घर ले आता है.

मध्य प्रदेश के किसान चाहे प्रायोजित किसान हों, लेकिन है तो इसी देश के, चाहे किसी भी राजनीतिक पार्टी के हों, है तो इसी देश के. क्या हमारे पास ऐसा कोई उपाय नहीं जो बड़े भाई का बड़प्पन दिखाकर इन भटके हुए छोटे भाइयों को राह दिखा दें. उनकी आँखों पर पड़े व्यक्तिगत स्वार्थ का चश्मा उतारकर उनकी घर वापसी कर सके. आखिर इस फिल्म में मनोज कुमार का नाम भी तो “भारत” ही है. और हमारा भारत देश वाकई कृषि प्रधान देश ही है.

और हमारे मोदीजी का नया नारा भी तो यही है ना – साथ है, विश्वास है, हो रहा विकास है… हम सब विश्वास के साथ एक बार फिर मेहनत में जुट जाएंगे तो यकीन मानिए हमारे देश की धरती से सच में सोना और हीरे मोती उगने लगेंगे.

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