शायद ऐसे ही क्रांतिकारियों के पुरुषार्थ का फल है मप्र का किसान आंदोलन

आरक्षण एक विषय है जिसपर मैं सामान्यतः कुछ नहीं लिखता. कारण एक ही है – तरबूजा चाकू पर गिरे या चाकू तरबूजे पर, कटता तरबूजा ही है.

पर आरक्षण एक विषय है जिसने एक समय मुझे जितना उद्वेलित किया था, और किसी विषय ने नहीं किया.

हाँ, वर्ष 1990 था. मैं हालांकि मंडल कमीशन आने के ठीक पहले इसके चंगुल से बच कर मेडिकल में जा चुका था. पर जब आरक्षण लागू करने और इसके विरोध में आंदोलन की खबरें आने लगीं तो मैं प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका.

हमारे यहाँ कुछ हुआ तो नहीं, पर कॉलेज प्रशासन ने एहतियातन कॉलेज बंद कर दिया. घर आया तो यहाँ का माहौल ही कुछ और था.

सिंदरी में आरक्षण विरोधी आंदोलन की कमान बड़े भैया ने सम्हाल रखी थी. सारे दिन वो लड़कों को जुटाते, रोज शाम को कल्याण केंद्र में मीटिंग होती, फिर अगले दिन घर घर जाकर लोगों से बातें करने और और अधिक लोगों को जोड़ने का कार्यक्रम बनता. दीवारों पर नारे लिखे जाते.

दुर्गा पूजा आई तो हमने पूजा पंडालों को समर्थन जुटाने का माध्यम बनाया. छोटे-छोटे ग्रुप में हम पंडालों और मंदिरों के गेट पर बैठते और आने-जाने वालों के जूते पॉलिश करते. लोग समर्थन में जो पैसे देते उससे झंडे बैनर का खर्च निकलता.

तभी राजीव गोस्वामी ने आत्मदाह का प्रयास किया और उसके बाद एक के बाद एक छात्रों के आत्मदाह की खबरें आने लगीं. इसने सबको बहुत उद्वेलित कर दिया. यहाँ तक कि एक दिन एक लड़के के जलने की खबर सुनकर मेरी माँ उठी और घर से निकल पड़ी और मोहल्ले भर की औरतों को जुटा कर जुलूस निकालने की तैयारी करने लगीं.

उस दौरान मैंने दिन-रात सिर्फ इसी बारे में सोचा. मन में बेहिसाब गुस्सा था. ऐसे भी क्षण आये जब मैंने आत्मदाह करने की भी सोची, पर यह ना तो सरल जान पड़ा ना ही उपयोगी.

पर एक बार भी इस आंदोलन ने मुझे जातिवादी नहीं बनाया. कभी किसी व्यक्ति के लिए मन में उसकी जाति के कारण कोई द्वेष नहीं आया. कभी किसी का दरवाजा खटखटाकर उससे बात करते समय किसी की जाति का ध्यान नहीं आया.

पर आज समझ में आता है कि इस मंडल कमीशन ने जातीय विद्वेष की कितनी गहरी दरार डाली है. और यह दरार सिर्फ आरक्षण चाहने वालों ने ही नहीं डाली, आरक्षण के उग्र विरोध से भी यह दरार गहरी ही हुई है. और उन्हीं लोगों ने इसे हवा भी दी जिन्हें हम वैसे सामाजिक न्याय के योद्धाओं के रूप में जानते हैं.

अगर किसी को याद हो तो घोर जातिवादी, हिंदूद्रोही कम्युनिस्ट इतिहासकार रोमिला थापर भी इस आंदोलन के समर्थन में आई थी… क्योंकि जातिवादी विद्वेष का उसका अभिप्राय इससे सिद्ध होता था.

वहीं आडवाणी जी ने इस सामाजिक विद्वेष की आग को बुझाने में अमूल्य योगदान दिया ठीक उसी समय राम मंदिर का आंदोलन तेज करके. उन्होंने ना तो आरक्षण का समर्थन किया, ना विरोध… बस, इसकी कोई बात ही नहीं की.

खैर, इस आंदोलन से राजनीतिक डायनामिक्स की मेरी समझ विकसित हुई. पर इसका सबसे मूल्यवान सबक दिया मेरे ही कुछ साथियों ने.

युवाओं का एक गुट था जो हमेशा हमें उकसाता रहता था कि हमें कुछ उग्र करना चाहिए. उनका कहना था इस धरना प्रदर्शन, पोस्टर नारों से क्या होना है? हम कहीं से भी गुजरते, उनकी कोशिश कुछ तोड़-फोड़ करने की होती थी.

एक बार रेलवे स्टेशन पर पहुंच कर उन्होंने ट्रेन में तोड़-फोड़ की. एक बार एक ट्रेन को आग लगाने की कोशिश की. हमारा सबसे बड़ा एफर्ट लगता था उनके उपद्रवी उत्साह को काबू में रखने में.

फिर हमें पता चला, उधर उन उत्साही क्रांतिकारियों ने एक और समानांतर क्रांति कर ली थी… उन्होंने चंदे की रसीद छपवा ली थी, और उस जनसमर्थन का लाभ उठा कर घर-घर से चंदा भी उगाह लिया था…

और उस चंदे को लेकर कलकत्ते की दुर्गा पूजा घूमने निकल गए थे और अपने लिए जीन्स, पॉवर के जूते, सुट्टे और दारू का इंतेज़ाम भी कर लिया था…

मध्यप्रदेश का किसान आंदोलन भी संभवतः ऐसे ही क्रांतिकारियों के पुरुषार्थ का फल है शायद…

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