सिनेमा के बहाने : जॉनी डेप, नताली पोर्टमैन और हॉलीवुड का सिनेमा

hollywood johny depp natalie portman

सिनेमा के भारतीय दर्शकों में हॉलीवुड की फ़िल्मों का ‘क्रेज़’ खूब है. इसका एक कारण तो हॉलीवुड की फ़िल्मों का सिनेमाघरों में लगना और पायरेसी अथवा अन्य साधनों से यूट्यूब/इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध हो जाना भी है. एक और कारण टेलीविज़न पर उनके प्रसारण और इन फ़िल्मों के डेडिकेटेड चैनल्स का बहुतायत में होना भी है.

हिन्दी या भारतीय भाषाओं की फ़िल्मों के अलावा हॉलीवुड और उसके कलाकार एक अलग तरह से हमारे जीवन का हिस्सा हैं. पर बस यहीं तक शायद सिनेमा की हमारी अवधारणा है. और जनसामान्य के लिए सिनेमा का मतलब हॉलीवुड और बॉलीवुड ही है.

हालांकि, विदेशी भाषाओं का सिनेमा प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है और फिर तमाम फ़िल्म फ़ेस्टिवल्स में दुनिया भर की फ़िल्मों के प्रदर्शन तथा इंटरनेट पर उपलब्धता के कारण अब धीरे-धीरे हमारे यहाँ उस सिनेमा की पैठ भी बनती जा रही है.

बहरहाल, हॉलीवुड की फ़िल्में जानी-पहचानी हैं और महानगरों के अलावा धीरे-धीरे अन्य शहरों में भी देखी और पसंद की जा रही हैं. हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री हॉलीवुड से अपना बहुत कुछ लेती है और फिल्मांकन के मानक, काम-काज का तरीका, व्यापार के गुणा-भाग आदि का स्त्रोत/मापदंड हॉलीवुड ही है.

अमेरिका के लॉस एंजेलिस शहर में फैली स्टुडियो की विस्तृत श्रृंखला और समुदाय वाला हॉलीवुड आज सही मायनों में विश्व सिनेमा का सिरमौर है तथा ‘कॉर्पोरेट’ और ‘कल्चर’ की तर्ज पर विकसित हुए विश्व सिनेमा की गंगोत्री भी.

हालांकि समझने की दृष्टि से भारत की तरह अमेरिका में भी प्रतिनिधि या समानान्तर सिनेमा बनता है जो कि स्टुडियो तर्ज पर काम नहीं करता. इस तरह की फ़िल्म मेकिंग को ‘इंडी’ (स्वतंत्र) कहा जाता है. हॉलीवुड के कई स्टार इन इंडी फ़िल्मों में काम करते हैं पर यह भी सही है कि कला और व्यावसायिक दोनों ही रूपों में हॉलीवुड की फ़िल्मों ने सिनेमा के मानक ऊंचे और बड़े ही बनाए हैं. और ऑस्कर, गोल्डन ग्लोब, गिल्ड, सनडान्स जैसे कई अवार्ड्स, फ़िल्म फ़ेस्टिवल्स, फ़िल्म बाज़ार जैसी आमदों ने अमेरिकन सिनेमा को आगे पहुंचाया है.

हालांकि, इतिहास पर फिर बात की जा सकती है. पर सबसे बड़ी बात यह है कि सौ सालों के समय में अमेरिका ने बहुत ही विश्वसनीय तरीके से और लगातार एक संस्कृति विकसित की है जिसे अब पूरी दुनिया अपना रही है. सिनेमा कला का एक भरी-पूरी, विशाल और समृद्ध इंडस्ट्री बन जाना निस्संदेह अद्भुत और विलक्षण है जिसका बहुत सारा श्रेय हॉलीवुड को जाता है. विश्वसिनेमा के बरक्स हॉलीवुड का एक छोटा सा चक्कर इसी बहाने लग गया कि इसी इंडस्ट्री के मौजूदा समय के दो मशहूर अदाकार जॉनी डेप और नताली पोर्टमैन कल अपना जन्मदिन मना रहे थे.

जॉनी डेप और पोर्टमैन जैसे अदाकार किसी परिचय के मोहताज नहीं. विश्व सिनेमा में ‘पाइरेट्स ऑफ द कैरेबियन’ अकेली ऐसी प्रतिनिधि फ़िल्म पर्याप्त है जिसने एक अभिनेता के रूप में जॉनी डेप को अमेरिका का ही नहीं बल्कि दुनिया का चहेता अभिनेता बना दिया. जितनी चर्चा इस फ़िल्म की कहानी और दृश्यों की हुई उससे कहीं ज़्यादा ‘जैक स्पैरो’ नाम का किरदार जॉनी डेप के साथ इस क़दर जुड़ गया कि अब उस छवि से निकलना खुद उनके लिए भी मुश्किल होगा.

पर सिनेमा के मुरीद इस दुविधा में यकीन नहीं करते. उनके लिए तो किरदार अहम होते हैं जिनसे वो अपनी तरह का व्यवहार, इज़हार करते हैं. जॉनी डेप की लोकप्रियता इस किरदार के बाद इतनी होगी इसका अंदाज़ा शायद खुद उन्हें भी नहीं होगा. ‘पाइरेट्स ऑफ द कैरेबियन’ सीरीज़ की पाँच फ़िल्मों ने पिछले 14 सालों में उन्हें लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा दिया.

हालांकि, जॉनी डेप का सफर तीन दशकों से भी अधिक समय का रहा है और अमेरिका में टीवी धारावाहिकों में एक समय वो घर-घर में लोकप्रिय रहे हैं. फैंटेसी-कॉमेडी जॉनर उनका प्रिय है और हर बार उनके अभिनय का एक अलग ही रूप सामने आता है. हालांकि उनके खाते में तरह-तरह के रोल आए हैं जिनमें खास तौर से निर्देशक टिम बर्टन की कमाल की फ़िल्म ‘एडवर्ड सिज़रहैन्ड्स’ अद्भुत फैंटेसी वाली ‘एलिस इन वंडरलैंड’ और मशहूर लेखक एड वुड की जीवनी आधारित फ़िल्म ‘एड वुड’, अपराध-थ्रिलर आधारित ‘डॉनी ब्रैस्को’ और ‘फियर एंड लोदिंग इन लास वेगस’ जैसी कमाल की फ़िल्में हैं.

एक और फ़िल्म है ‘द टूरिस्ट’ जो उनके अपने प्रिय ज़ोन से अलग रूमानियत भरी फ़िल्म है जिसमें उनके साथ थी एंजेलिना जोली. दरअसल अपने अभिनेता और चरित्र के साथ तालमेल बिठाते हुए जॉनी डेप इतने मगन लगते हैं कि उनकी पहचान बहुत अलग से रेखांकित होती नज़र आती है. अवार्ड्स और प्रसिद्धि से इतर उनका व्यक्तिगत जीवन भारतीय नाटकों के अभिनेता के लिए प्रयुक्त होने वाले शब्द ‘नट’ की तरह रहस्य और रोमांच से भरा ही दिखता है जिसमें बहुत से उतार-चढ़ाव और जोखिम नज़र आते हैं.

उधर इज़राइली मूल की नताली पोर्टमैन के रूप में हॉलीवुड सिनेमा से एक ऐसी आत्मविश्वासी अभिनेत्री का चेहरा सामने आता है जिसने व्यवसाय, फैशन और ब्रांड से बनी इस दुनिया में सीमित परंतु सशक्त चरित्रों से अपना मुकाम बनाया.

स्टार वार्स सीरीज़ फ़िल्मों के अलावा ‘थॉर’, ‘जैकी’ और ‘क्लोज़र’ जैसी अलग-अलग शैलियों की फ़िल्मों में पोर्टमैन अपनी तरह से उभरती हैं. खास तौर से मैं ‘क्लोज़र’ का ज़िक्र करना चाहूँगा. जूलिया रोबर्ट्स जैसी अभिनेत्री की उपस्थिति में पोर्टमैन कहीं भी उनसे उन्नीस साबित नहीं होती हैं.

मोज़ार्ट के ओपेरा के साथ-साथ चलते इस कथानक को हॉलीवुड फ़िल्मों का एक सफल प्रयोग माना जा सकता है. परंतु ‘ब्लैक स्वान’ के ज़िक्र के बिना पोर्टमैन की यात्रा मुकम्मल नहीं होती. एक कलाकार की कला यात्रा की जद्दोजहद और पूर्णता की खोज ‘नीना सेयर्स’ के किरदार में जिस तरह से अपने मुकाम तक पहुँचती है वह अद्भुत है.

यहीं पर हॉलीवुड का सिनेमा हिन्दी फिल्मों से कलात्मकता में बाज़ी मार लेता है जब कहानी और चरित्रों में भिन्नता और प्रयोग के बावजूद ऐसी फ़िल्में अमेरिकी दर्शक और बाज़ार स्वीकार करते हैं. चरित्र के पास जाने के लिए जिस भी साधन और संसाधन की ज़रूरत होती है उसके लिए लेखक, तकनीशियन, अभिनेता आदि कोई कोताही नहीं बरतते. न कोई नैतिकता और न कोई नियम.

इसलिए भी लेखक का स्थान हॉलीवुड सिनेमा में कहीं ज़्यादा होता है. एक फ़िल्म बनने के पहले पटकथा लेखन के कई चरणों से गुज़रती है जिसमें शंका-समाधान, कसर-गुंजाइश की संभावनाओं के बाद प्रोडक्शन का नंबर आता है. अभिनेता के तैयारी के अलावा उस समर्पण की भी मांग होती है जिसके बिना चरित्र में वो बात नहीं आती.

ऐसे में महान अभिनेताओं की एक पूरी फौज का ध्यान आता है जिसने सिनेमा विधा को ही समृद्ध किया है. जॉनी डेप और नताली पोर्टमैन उसी फेहरिस्त का हिस्सा हैं. किसी और चरित्र को जीने की ललक अभिनेताओं की पसंद रहा है. विषय और प्रभाव का सिनेमाई अनुभव परदे पर जो रचता है वह आधुनिक तकनीक के कारण हमेशा के लिए संरक्षित हो गया है. हॉलीवुड की यह फ़िल्में आने वाले समय में हिन्दी सिनेमा को भी रास्ता दिखाएगी इसमें संदेह नहीं.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY