संघ-मोदी और शौरी के बीच में हैं बाबासाहेब

1969 के अंतिम महीने में उडुपि (कर्नाटक) में प्रथम ऐतिहासिक हिन्दू सम्मेलन हुआ था. विहिप के इस सम्मलेन में हिन्दू धर्म के तमाम मत-पथों के आचार्य मंच पर उपस्थित थे. तीन दिनों तक ये सम्मेलन चलना था.

सम्मेलन की अध्यक्षता कर्नाटक राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्य, सेवानिवृत्त आई.ए.एस. अधिकारी, श्री आर. भरनैय्या जी को करना था. भरनैय्या जी कथित अस्पृश्य समाज से थे. पहला सत्र चूँकि धर्माचार्यों के आशीर्वचन के लिये था और दूसरे सत्र से भरनैय्या जी को अध्यक्षता करनी थी.

धर्माचार्यों के आशीर्वचन जब समाप्त हुए तो पूज्य गुरूजी बोलने के लिये उठ खड़े हुए, उनको उठता देखकर भरनैय्या जी भड़क गये और कहने लगे, मुझे मालूम था कि आप लोग मुझे बुलाकर ऐसे ही अपमानित करने वाले हैं. आप मुझे बुलायेंगे तो पर न तो बोलने देंगें और न मेरा सम्मान करेंगें.

गुरूजी स्तब्ध रह गये, उनसे कहा कि तय कार्यक्रम के अनुरूप आपको तो दूसरे सत्र की अध्यक्षता करनी थी और उसमें बोलना था पर ऐसा है तो मैं नहीं बोलूँगा आप माइक संभालिये.

फिर आयोजन समिति के लोग आगे आये और भरनैय्या जी को कार्यक्रम का पत्रक लाकर दिखाया जिसके अनुसार प्रथम सत्र सिर्फ आशीर्वचन का था दूसरे सत्र में उनको बोलना था.

ये देखकर भरनैय्या जी शांत तो हुए पर कहने लगे कि उस दूसरे सत्र की अध्यक्षता करके मैं क्या करूँगा जिसमें कोई आयेगा ही नहीं. आयोजकों ने कहा, नहीं-नहीं लोग आयेंगें आप चिंता मत करिये.

भरनैय्या जी के कुपित होने की खबर आसपास जंगल के आग की तरह फ़ैल गई तो दूसरे सत्र में उनको सुनने वाले लोग पहले सत्र से लगभग दुगुनी संख्या में थे.

भरनैय्या जी बोले, खूब बोले, एक से बढ़कर एक कटुवचन मंच पर बैठे पूज्य गुरूजी और धर्माचार्यों को इंगित कर-कर के सुनाये और अपने मन की भावनाओं को उड़ेल दिया. पूज्य गुरूजी से लेकर तमाम धर्माचार्य उनको ख़ामोशी से सुनते रहे.

तीन दिन तक ये बैठक चली, सारे धर्माचार्यों ने एकमत होकर इस बात को माना कि हमारे समाज से अपने ही लोगों के प्रति कुछ अपराध हुआ अवश्य है इसलिये इस पाप का परिमार्जन आवश्यक है और एक साथ सारे धर्माचार्यों ने ‘हिंदव: सोदरा: सर्वे” का प्रस्ताव पारित किया और ये प्रस्ताव पारित हुआ भरनैय्या जी की अध्यक्षता में.

जिस समय ये प्रस्ताव पारित हुआ पूज्य गुरूजी मंच पर नाच उठे और सूर्यनारायण राव को बुलाकर कहा कि आज ये बड़ी ऐतिहासिक घटना हुई है इसलिये सर्वत्र इसे गूंजा दो. ये कहकर जब गुरूजी मंच से नीचे उतरे तो वहां खड़े भरनैय्या जी ने उनको बाहों में भर लिया और लिपटकर बच्चों की तरह रोने लगे.

गुरूजी से कहने लगे, ‘आप हमारी सहायता के लिए दौड़ पड़े हैं और इस उदात्त कार्य को अपने हाथ में लाकर आज आपने मुझे बचा लिया है’. गुरूजी ने उनसे कहा, ‘आप सारा श्रेय मुझे क्यों देते हैं, आज सारा हिन्दू समाज एक साथ खड़ा है जो बदलते युग की आहट है, इसलिये श्रेय समाज को दीजिये’.

अस्पृश्यता निर्मूलन के लिए बड़ा संघर्ष पूज्य डॉ. बाबासाहब अंबेडकर ने भी किया था. महार सत्याग्रह तथा नासिक कालाराम मंदिर सत्याग्रह में भी उनकी धारणा यही थी कि अस्पृश्यता हिन्दू धर्म की देन नहीं है बल्कि समाज का दोष है इसलिये जरूरी है कि हिंदू धर्माचार्य खुलकर सामने आएं और वैसा कहें भी परन्तु दुर्भाग्यवश उनके समय यह नहीं हो पाया, ये 1969 में उडुपि में जाकर हुआ, अगर उस समय हो गया होता तो इतिहास आज कुछ और ही होता.

वंचित समस्या का हल बाबासाहेब की कृति या उनकी किताबों का पोस्टमार्टम करने से नहीं होगा, अगर आपको लगता है कि बाबासाहेब को लांछित करके आप उनको आराध्य मानने वाले समाज को उनसे दूर कर लेंगे तो आप अज्ञानी हैं.

अरुण शौरी ने 1996 में ‘वर्शिपिंग फॉल्स गॉड’ नाम से एक किताब लिखी थी, बाबासाहेब के ऊपर प्रमाणों की झड़ी लगा दी, कोई बौद्धिक रूप से उन प्रमाणों को काट नहीं पाया पर नतीजा क्या निकला? वंचित समाज के कितने लोग उस किताब को पढ़ कर बाबासाहेब से विरत हुए? शायद कुछ सौ भी नहीं? उल्टे प्रतिक्रिया में हिंदुत्व के दायरे से और भी दूर चले गये.

विदर्भ के अकोला जिले में एक गाँव है भाम्बेरी. वहां एक बार कुछ दलित संगठनों ने बाबासाहेब की जयंती पर जुलूस निकालने का निश्चय किया तो कुछ जातिवादी लोग अड़ गये कि नहीं निकालने देंगे.

जुलूस निकलता तो दोनों ओर से अपमानजनक नारे लगते, एक-दूसरे के महापुरुषों को गाली दी जाती, तब तंग आकर प्रशासन ने तय किया कि अब दोनों ही पक्षों को कोई जुलूस निकालने ही नहीं देंगे.

संघ के लोगों को जब ये बात पता चली तो वो फ़ौरन प्रशासन के पास पहुंचे और कहा कि आप जुलूसों पर पाबंदी मत लगाइए, कोई अशांति नहीं होगी इसकी गारंटी हम लेते हैं.

अगले दिन जब बाबासाहेब जयन्ती पर जुलूस निकला तो उसमें सवर्ण समाज के लोग भी थे और बाबासाहेब की जय-जयकार भी कर रहे थे, सारा कलुष यही खत्म हो गया फिर उस गाँव में हर जुलूस निकला, गीता जयन्ती भी हुई, रामनवमी भी मनी पर उसमें सहभागी अब पूरा हिन्दू समाज था.

समय की मांग है कि जब घर की बात हो तो जो चीजें जैसी हैं उसे वैसी ही रहने दो, यथारूप में स्वीकार करो, आग को आग से ठंडा नहीं किया जाता.

हाल ही में दलितों के एक सम्मेलन में संघ प्रचारक इन्द्रेश कुमार भी गये थे, जाने से पहले उनके खिलाफ आपत्तिजनक नारे लग रहे थे और जब बोलने के बाद मंच से उतरे तो वही पूरी भीड़ इन्द्रेश कुमार के नाम की जय-जयकार कर रही थी.

अगर यहाँ इन्द्रेश पूज्य बाबासाहेब के लिये ‘वर्शिपिंग फॉल्स गॉड’ से शब्द लेकर और वहां उडुपि के मंच पर भरनैय्या जी के वचनों से आहत होकर पूज्य गुरूजी या हमारे धर्माचार्य कुछ गलत बोल देते तो क्या होता?

‘अपनों के मान-मनौव्वल को तुष्टिकरण नहीं कहा जाता’ इस विषय को लेकर संघ की दृष्टि आरम्भ से ही यही रही है. उडुपि इसका अकेला उदाहरण नहीं है. संघ जानता है कि इस समस्या का उन्मूलन कैसे करना है.

पूज्य बाबासाहेब को लेकर भी संघ की दृष्टि यही है, अपने प्रातःस्मरणीय नामों में संघ ने पूज्य बाबासाहेब को सुभाष, प्रणवानंद, सावरकर और नारायण गुरु के समकक्ष रखा है.

संघ, मोदी और शौरी के बीच में बाबासाहेब हैं. सारी कथा इसी के गिर्द है, जो समझने वाले हैं उनके लिये इतना ही कहूँगा कट्टर रूढ़िवादी और कट्टर जातिवादी की जगह उदार और समाज को जोड़ने वाले बनिये और महापुरुषों ने जो मार्ग दिखाया है उसी का अनुगमन करिये वर्ना देश के साथ-साथ हम आप भी जलेंगें, बचेगा कोई भी नहीं.

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