GST : क्या और क्यों? भाग-1

कुछ समय से GST (Goods & Services Tax) के विषय में सरकारी विभागों और व्यापारियों की विभिन्न प्रतिक्रियाएँ चल रही हैं. आइये GST के कारण को सबसे पहले समझें.

इस देश में आज तक सरकारी कर की नीति अंग्रेजों वाली चल रही है. केंद्र सरकार और राज्य सरकार विभिन्न कर समय-समय पर लगाती रहती है. यह कर सरकार के सरकारी खजाने में जमा होता रहता है.

अब प्रश्न यह है कि सरकार को यह धन क्यों चाहिए? आम जनता की भाषा में सरकार को लोकहितकारी योजनाओं के लिए पैसा चाहिए होता है. या दूसरे शब्दों में सरकार को जनता की भलाई के लिए पैसा चाहिए होता है जिसे सड़क, बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा इत्यादि की योजनाएँ बनाई जाती है.

अब सरकार को कितना पैसा चाहिए… इस बात को इस वर्ष के आंकड़ों के अनुसार जानते हैं तो सरकार को लगभग 21 लाख करोड़ रुपया चाहिए जिसमें से लगभग 8.7 लाख करोड़ रुपये का खर्चा जनता के लिए और 1.9 लाख करोड़ का खर्चा सरकार देश के रक्षा विभाग के लिए करती है.

फिर बाकी का 10.5 लाख करोड़ किसलिए चाहिए… तो उसका उत्तर है सरकार को अपना खर्चा चलाने के लिए, सरकारी अफसरों के लिए, नेताओं के लिए इत्यादि-इत्यादि.

जनता लगभग हर चीज़ को पैसा दे कर खरीदती है. चाहे वह बिजली हो या पानी या स्वास्थ्य. लेकिन यदि सरकार की मूलभूत आवश्यकता को समझें तो सरकार के अपने खर्चे बहुत ज़्यादा हैं और इसीलिए सरकार वर्षों से नया कर्ज़ विदेशों से लेती रहती है.

इस वर्ष भी सरकार लगभग 5.5 लाख करोड़ का नया कर्ज ले रही है. मज़े की बात है कि सरकार 5.2 लाख करोड़ का ब्याज भरती है. मतलब एक साल में 5.5 लाख करोड़ कर्जा ले कर सरकार 5.2 लाख करोड़ मात्र ब्याज में दे देती है.

सरकार के हाथ कुल 30,000 हज़ार करोड़ रुपया आता है 5.5 लाख करोड़ में से. यह इसी सरकार की बात नहीं है, वर्षों से सरकार अपने बजट का 25% से अधिक पैसा कर्ज ले कर चलाती है.

अब जनता इतना कर देती है फिर भी त्रस्त है… सरकार और जनता दोनों. हमारे देश में आज लगभग 60 से अधिक प्रकार के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर हैं. आपका हर सामान जो भी आप लेते है उस पर 40% से अधिक का कर है और यदि इसमें राज्यों का कर जोड़ दें तो यह लगभग 65% हो जाता है.

अब सरकार के अनुसार यदि 125 लाख करोड़ का सकल घरेलू उत्पाद है तो उसके अनुसार लगभग 50 लाख करोड़ का कर सरकार के पास आना चाहिए परंतु आता है कुल 12 लाख करोड़.

बाकी जाता कहाँ है? कर से चार गुना पैसा सरकार के कर वसूलने के बाद भी नहीं आता. वह सब कर की चोरी के रूप में जाता है. यदि हमारा और आपका दिया हुआ सब पैसा सरकार तक ठीक से पहुँच जाये तो सरकार से कर आपको लगभग 20% लगेगा और सरकार को नया कर्ज भी नहीं लेना पड़ेगा.

और आगे सोचें तो लगभग 50% यानि 10 लाख करोड़ का धन सरकार अप्रत्यक्ष रूप से आपकी जेब से ले जाती है, जिसमें आप कुछ नहीं कर सकते हैं. आप झगड़ा या जुगाड़ करते हैं कुल 16% यानि 3 लाख करोड़ के धन का. इसलिए सरकारें बहुत समय से अपनी आमदनी बढ़ाने की कोशिश में लगी रहती है. इसी लिए सरकार की बहुत समय से कोशिश रही है GST नामक विधेयक या कानून लाने का.

जब-जब सरकार को ज़रूरत पड़ती, आज से पहले सरकार विभिन्न प्रकार के कर लगाती रही है. परंतु अब सरकार सब करों को जोड़ कर GST लगाने का फैसला करती है तो सबसे पहला प्रश्न है कि क्या सरकारी खजाने में बढ़ोत्तरी होगी? दूसरे, व्यापारी लोगों पर और उपभोक्ताओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

एक बात स्पष्ट है कि चूंकि सरकार के पास धन की कमी है तो सरकार आपको कर से राहत नहीं दे सकती है. इसे आप सरकार की मजबूरी भी समझ सकते हैं. सरकार एक मद से हटा कर दूसरे में कर देगी. आप देखेंगे कुछ सस्ता होगा और कुछ महंगा.

आपको सामान सब खरीदना है तो आप पर कर का बोझ लगभग उतना ही रहेगा क्योंकि सरकार कर की छूट तो तब दे न, जब उसके पास पर्याप्त धन हो. कहने के लिए कुछ सामान जो सस्ते हैं और जो महंगे हैं, उससे सरकार की मंशा का पता चलेगा.

जिन पर कर कम होने की उम्मीद है उन उद्योगों की बेहतरी समझी जा सकती है. परंतु ऐसा होना आवश्यक नहीं है. अगले भाग में हम जानने का प्रयास करेंगे कि व्यापारी, उपभोक्ता और सरकार के साथ हमारे सकल घरेलू उत्पाद पर क्या प्रभाव पड़ने की आशा है.

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