नहीं बैसाखनंदन, मोदी की विदेश यात्राओं से नहीं मिटी ग़रीबी

नहीं बैसाखनंदन, मोदी की विदेश यात्राओं से ग़रीबी नहीं मिटी, ना ही किसानों के घर में मरे बाप और भाई लौट कर आने लगे, ना ही दाल के भाव कम हो गए, ना ही सड़कों के गड्ढे भर गए, ना ही दंगे बंद हुए, ना ही निचली जातियों के दिन फिर गए…

ऐसा कुछ नहीं हुआ क्योंकि ऐसा कुछ नहीं होता किसी प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा करने से. अगर तुम अपने लॉजिक के इस चश्मे से देश में हो रहे बदलाव को आँकते हो तो फिर माँ-बाप का पैसा बर्बाद कर दिए एकदम. ऐसे नहीं होता है.

ना ही मोदी के विदेश ना जाने से ये आत्महत्या रुक जाएगी, ये ग़रीबी खत्म हो जाएगी या फिर गाँवों में शिक्षा की स्थिति सुधर जाएगी. क्योंकि ऐसा भी नहीं होता.

ना ही देश के ग़रीबों की थाली में चार वक़्त खाना मोदी सरकार के दो साला विज्ञापनों से आने लगेगा. ना ही ‘देश बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है’ गा देने से देश आगे बढ़ जाएगा.

अगर तुम फ़ेसबुक पर हो, भारत सरकार की योजनाओं पर रिसर्च पेपर लिखते हो हर रात सोने से पहले और जगने के तुरंत बाद, तो तुम में इतनी समझ की गुँजाइश तो होगी कि एक प्रधानमंत्री विदेश यात्रा क्यों करता है और उसकी बात पर दूसरे देश की संसद की मौखिक स्वीकृति के क्या मायने होते हैं.

तुम इतने शिक्षित ज़रूर होगे, जबकि तुम्हें टाइप करना आता है और तुम इंडिया 2016 की किताब से आँकड़े इकट्ठे कर लेते हो, कि ये पता हो कि प्रधानमंत्री की 41 यात्राएँ में से एक यह, देश की ग़रीबी मिटाने के लिए नहीं थी.

तुम इतने समझदार ज़रूर होगे, जबकि तुम ‘द हिंदू’ और ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की अंग्रेज़ी लिंक शेयर कर पाते हो देश की स्थिति पर, कि ये जान सको कि जब प्रधानमंत्री विदेश जाता है तो देश के सारे मंत्रालयों और संस्थानों में ताला लगाकर उसके आने का इंतज़ार नहीं किया करते मंत्री और अधिकारी. उस समय देश में लोग घी के दिए जलाने के लिए घी का इंतज़ाम करने में नहीं लगे होते.

तुम में इतनी बुद्धि तो ज़रूर होगी जबकि तुम्हें आँकड़ों पर इतना विश्वास है, कि एक सरकार एक निश्चित समय में देश के हर सेक्टर को चमका नहीं सकती, या वहाँ नहीं पहुँच सकती जहाँ तुम उसे देखना चाहते हो. आँकड़ों के हिसाब से तो बहुत कुछ बदला है. लेकिन अब तुम ज़मीन पर जाकर ढूँढने की बात कहोगे और फिर नए जगह के आँकड़ें लाओगे.

ये लॉजिक गलत है, ये तुम्हें पता है. इसको बंद करो.

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