नवल गीत : पंचम दा और मदन मोहन के गाने तो बहुत सुने, अब सुनिए अनसुने किस्से

“वो लम्हें जो बड़े लबरेज़ होते हैं, भरे होते हैं, छलके हुए होते है. ऐसे बहुत से लम्हें मैंने पंचम के साथ शेयर किए हैं.” – गुलज़ार

सभी को लगता है कि आरडी के लिए सबसे ज्यादा गाने गुलज़ार ने ही लिखे होंगे पर ऐसा है नहीं. आरडी के लिए सबसे ज्यादा गीत लिखे थे आनंद बक्षी ने, फिर मज़रूह सुल्तानपुरी साहब ने.

गुलज़ार बाबा तीसरे नंबर पर आते हैं, पर जैसी, जिस तरह की बॉन्डिंग, जुगलबंदी या मैजिक या जो भी कह लें, दो हाइली क्रियेटिव पर्सन के बीच होना चाहिए वो रिश्ता गुलज़ार और आरडी के बीच बना. एक दूसरे से बिल्कुल जुदा शख्सियत होने के बाद भी.

कहाँ तो गुलज़ार बेहद खालिस दरवेश इंसान…. ठहराव और आराम के मौजिज़. शास्त्रीयता की मूर्ति. और कहां आरडी बेचैनी और हड़बड़ाहट से भरा बेतरतीब आदमी. हुनरमंद लेकिन जल्दबाज़. भागता-दौड़ता. बन्द, पीस, साज़, ख्याल में डूबा ऐसा अस्त-व्यस्त कि काम के बीच नहाने भी जाये तो पीछे गिटारिस्ट को बोले कि बजाते रहो कुछ भी, मैं शावर लेते हुए सुन रहा हूँ.

और नहाते हुए अचानक कुछ सुनाई दे तो साबुन लगे हुए ही बाहर आके बोले- हां हां, यही, अभी जो बजाया था, दोबारा बजाओ. और यहां जो दोबारा बजाने का कहा है, वही बाद में मुसाफिर हूँ यारों गाने की रिदम होती है जिस पर पूरा गीत बनता है.

म्यूजिक का कोई पीस बनाते बनाते चाय आ जाये तो उसके ठण्डी होने का इंतजार न करें. पानी मिलाकर चाय पी जाएं. इतना साज़ और सुर में पूरा भीगा तरबतर आदमी.

गुलज़ार और आरडी ऐसे पक्के वाले दोस्त हो गए थे जैसा फिल्म उद्योग में कम ही होते हैं. यहां की दोस्ती बड़ी सोफानी और अदब में ढली होती है, पर गुलज़ार -आरडी की दोस्ती छेड़ने वाली, परेशान करते वाली, पिंच करने वाली और गालियों वाली दोस्ती थी. इतनी कि गुलज़ार के स्टूडियो में आते ही आरडी गायक शैलेन्द्र सिंह से कहते है- लो आ गया. फिर पता नहीं क्या-क्या लिख के लाया होगा.

इसके गानो को बनाने में बुखार आ जाता है यार. पता नही क्या क्या लिखता रहता है. ये भी एक अजीब तथ्य है कि भारतीय सिनेमा संगीत के दो जादूगर रहमान और आरडी को लिखे हुए से कोई बहुत ज्यादा मतलब नहीं होता था. ‘लिटरेरी टेस्ट’ न होने के बाद भी ये ‘जादू’ रच कर कुछ रची हुई धारणाओं को खत्म जरूर कर रहे थे.

एक किस्सा तो बहुत कहा सुना गया है. फिल्म इजाज़त के गाने मेरा कुछ सामान को लेकर. पंचम बैठे हुए थे म्यूज़िक रूम में और गुलज़ार ने ये गाना सुनाया पढ़ के. आरडी ने केजुअल सा कहा- बहुत अच्छा सीन है यार.

गुलज़ार बोले- सीन नहीं है, गाना है. तो हारमोनियम के ऊपर जो कॉपियां, पड़ी रहती थीं उसको धत कर धकेल कर नाराज आरडी बोले- धत, ये गाना है इतना लम्बा. कोई मीटर वीटर तुझे आता-वाता तो है नहीं. कल तू टाइम्स ऑफ़ इन्डिया ले के आयेगा और कहेगा इसकी भी धुन बना दो.

आरडी की गुलज़ार पर मीठी घुड़की जारी थी. तुम कुछ सीखो. इतने साल हो गए इंडस्ट्री में. वहीं बैठी आशा भोंसले ने उस गाने का एक फ्रेज़ गुनगुनाया. आरडी चौंक कर बोले- क्या गाया? आशा जी बोली- वो रात बुझा दो का फ्रेज, बस.

बत्ती जल चुकी थी आरडी की. हर बार जैसे लग गए. जैसे कोई साइंटिस्ट किसी खोज में लगता है और फिर आज कौन यकीन करेगा कि इस दिलकश, मौजिज़ और हिंदी सिनेमा की वन ऑफ द फाइनेस्ट कम्पोजिशन ‘मेरा कुछ सामान’ को आरडी ने केवल एक सिटिंग में बना डाला था.

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एक ही महीने में पैदा होने वाले मदन मोहन और आरडी बर्मन में काफी बातें कॉमन रहीं.  दोनों को अपने पिता की छाया से बाहर आने में समय लगा. आरडी के पिता का नाम सभी जानते हैं – सचिन देव बर्मन.

मदन मोहन के पिता का नाम था- रायबहादुर चुन्नीलाल. बगदाद से भारत आये हुए. उस समय की फिल्मों में दिखाए जाने वाले अमीर और खानदानी रायबहादुर चुन्नीलाल टाइप ही.

फिल्म उधोग की शुरुआत के प्रसिद्ध नाम हिमांशु राय और देविका रानी की बॉम्बे टॉकीज के पार्टनर थे और फिर बाद में फिल्मिस्तान के मालिक भी बने पर दोनों पिता में फर्क ये रहा कि जहां एसडी बर्मन ने आरडी को इस उद्योग में सेट होने को जमीन तैयार की वहीं मदन मोहन के पिता ने इस इंडस्ट्री का मजबूत हिस्सा होने के बावजूद यथासंभव कोशिश की कि मदन मोहन इस इंडस्ट्री में न आये. मदन मोहन के फिल्मो में देरी से आने का कारण भी उनके पिता ही थे. बाद में जब मदन मोहन का संगीत उन्होंने सुना तो कहा –

“मैने बहुत राजाशाही जिंदगी जी है, अपनी इच्छा और अपनी शर्तों पर. जीवन में कभी किसी बात का कोई अफसोस नहीं किया. पर आज तुम्हारा काम देखकर पहली बार मुझे अफसोस हुआ है. मैंने तुम्हारे साथ सही नहीं किया.”

मदन मोहन और आरडी, दोनों को अपनी बड़ी सफलता करियर शुरू होने के 5-6 साल बाद मिली. मदन मोहन को फिल्म भाई-भाई के रूप में और आरडी को तीसरी मंजिल के रूप में.

दोनों की विदाई उनके सर्वाधिक लोकप्रिय फिल्म संगीत के रूप में हुई और दोनों ही अपनी अंतिम फिल्म की सफलता देखने के लिए इस दुनिया में नहीं थे. गुलज़ार की मौसम मदन मोहन की और विधु विनोद की 1942-ए लव स्टोरी आरडी की अंतिम फिल्म रही.

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गुलज़ार ने बच्चों के मनोविज्ञान पर एक बड़ी समझदार फिल्म बनाई थी, नाम था किताब. संगीत जाहिर सी बात है कि आर डी बर्मन का ही था. फिल्म में आरडी ने एक कमाल गाना बनाया था- धन्नो की आंखों में रात का सुरमा और चांद का चुम्मा. रेल गीत. रेल के रूट में ड्राइवर की प्रेमिका का आना और ड्राइवर का इस खुशी में गाना.

इस बिल्कुल अजीब इजाद सिचुवेशन में आर डी गुलज़ार के बोलों को अपने खुरदरे कंठो में उतारते हैं. आरडी ने इस गाने में केवल एक ही इंस्ट्रूमेंट को बेस रखते हुए पूरा गाना निकाल दिया था.

ये साउंड किसी ने उस दौर में शायद सुना तक नही था. वो खास साउंड निकला था एक विदेशी इंस्ट्रूमेंट से जिसका नाम था “फलेंगर” जिसे आर डी ने भारत के बाहर किसी को बजाते सुना था और इतना पसंद आया कि इसे भारत ले आये.

खास बात ये है कि इस इंस्ट्रूमेंट “फलेंगर” का साउंड बड़ा बेसुरा था. सुनते ही सबकी हंसी निकल गई पर आरडी ऐसे ही आरडी नहीं थे. जिद में इसके केवल साउंड का ही यूज नहीं किया, एक पूरा गाना ही इसके ऊपर बिठा दिया और आज इस गाने को इसके इस इंस्ट्रूमेंट और खास साउंड की वजह से ही याद रखा जाता है. आरडी इसलिए भी बहुत जिगरी है कि उसने हर काम को करते हुए अपने उस मौजूदा समय और दौर के “टेस्ट” से ज्यादा आगे के समय का सोचा.

इस तरह की कारीगरी अब ए आर रहमान करते हैं. सबको पता ही है कि उसके सारे गानो में जो वाद्य बजते हैं, ज्यादातर वो प्रोग्रामिंग से ही बजते हैं. सॉफ्टवेयर से. मतलब लाइव रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल रहमान ने शुरू से ही बहुत कम किया.

यूं कह भी सकते हैं कि रहमान ने ही बाकी के सभी संगीतकारों को लाइव रिकॉर्डिंग की बजाय प्रोग्रामिंग में जाने का रास्ता दिखाया. बावजूद इसके रहमान के स्टूडियो में दुनिया भर के नये तरह के वाद्य है. दुनिया के हर कोने में इस्तेमाल होने वाले किस्म-किस्म के वाद्य वो लाकर उसके साउंड का इस्तेमाल अपने इंट्रो, गैप म्यूजिक और बीट्स में करते हैं.

हर वाद्य के साउंड और नई चीज को अपने गानों में डालने से वो कभी चूकते नही हैं. दिल्ली-6 के गाने रहना तू और मिले सुर मेरा तुम्हारा के नए वर्जन में रहमान ने इसी तरह एक बिल्कुल नये इंस्ट्रूमेंट से हमारा परिचय कराया.

इस इंस्ट्रूमेंट का नाम था “कन्टिनम फिंगरबोर्ड” जिसे कम्प्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक के एक इंजीनियर प्रोफेसर लिपोल्ड हेकन ने बनाया था. “फलेंगर” की तरह ही “कन्टिनम फिंगरबोर्ड” का साउंड ऐसा था कि उसे किसी फिल्मी गाने में इस्तेमाल करना मुश्किल था पर रहमान ने तो रहना तू गाने के अंत में इसे लगातार पूरे डेढ़ मिनिट तक बजाया. फिर बहुत से लाइव शो में भी रहमान इसे खुद बजाते हुए दिखे.

रहमान की पहली फिल्म रोजा 1992 में आई थी और आरडी की लास्ट फिल्म 1994 में. हो सकता है रोजा के गाने आरडी ने सुने हो या शायद ऐसा भी हुआ होगा कि न सुने हो. 92 से 94 के बीच के इन दो सालों में रहमान पर आरडी का कुछ भी कहा हुआ मेरी जानकारी में नहीं है पर किसी के पास ऐसा कुछ शेयर करने को हो तो जरूर बताएं.

और…..

ये जून का महीना है और इसी मुबारक महीने उन दो अजीज संगीतकारों का जन्म हुआ था जिसका बहुत असर मेरे ऊपर है, मदन मोहन और आरडी.

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अभी के कलाकारों को कभी एक दूसरे की खुल कर तारीफ करते देखना कम ही होता है पर पहले का माहौल इस मायने में बहुत खास था. अच्छे काम की खुल कर तारीफ की जाती थी और सच्चा आर्टिस्ट होता ही वही है जो खुलकर किसी दूसरे के अच्छे काम की सराहना करें. दूसरों के श्रेष्ठ की रक्षा करने का भाव हर कलाकार में ही नहीं, हर इंसान में भी होना निहित है.

तो बात ऐसी है कि संगीतकार खय्याम जो खुद मदन मोहन के संगीत और उस संगीत में छिपे आराम और मिठास के सबसे ज्यादा करीब थे, ने कभी एक मंच पर मदन मोहन को याद करते हुए कहा था –

“मदन जी अपने सभी समकक्ष और सीनियर कम्पोजर के पसंदीदा थे. ऐसे गुणी शास्त्रीय लोग जिनका फिल्म संगीत से कोई लेना-देना नहीं था, वो भी मदन जी के मुरीद थे और उनके गानो को सुना करते थे. और तो और, लता मंगेशकर जिनको हम सभी पसन्द करते हैं, उनके भी पसंदीदा मदन जी थे. लता जी जैसा उनके लिए गाती थी, सुनकर सच में जलन होने लगती थी कि ऐसा वो हमारे लिए क्यों नही गाती.”

और फिर कभी लता ने जब एक बार जब अपने गाये पसन्दीदा दस गीतों के बारे में बताया तो भी केवल मदन मोहन ही अकेले ऐसे संगीतकार थे, जिनके दो गीतों को लता ने इसमें शामिल किया था.

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चेतन आनंद की एक फिल्म आई थी हीर-रांझा. उस फिल्म की कमाल बात थी कि वो पूरी फिल्म पोएट्री की फॉर्म में थी माने सारे किरदार संवादों को कविता के रूप में बोल रहे थे. इन संवादों को और फिल्म के गाने को लिखा था कैफ़ी आज़मी ने और संगीत दिया था, मदन मोहन ने.

फिल्म में लता और रफी का एक गाना है- मेरी दुनिया में तुम आये. हिंदी सिनेमा का शायद ये ही एक और एकमात्र गीत है जिसमें गाना फुसफुसाहट में गाया गया है. इतनी महीन फुसफुसाहट कि मानो हीरो-हीरोइन एक दूसरे के कानो में बात कह रहे हैं. रफी का कंठ और मदन मोहन की धुनें कितनी ज्यादा मिश्री सरीखी थी, इसका सिरमौर उदाहरण है ये गाना.

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मदन मोहन ने विधिवत संगीत की कोई ट्रेनिंग नहीं ली थी पर अजीब बात है कि नौशाद के बाद शायद मदन मोहन की धुनें ही सबसे ज्यादा शास्त्रीय, टेक्निकली करेक्ट और विशुद्ध भारतीय रागों पर आधारित थी. संगीतकार बनने की इच्छा के बावजूद अपने पिता का मन रखने के लिए मदन मोहन एक समय फौज में भर्ती हुए.

बाद में लखनऊ और दिल्ली के रेडियो स्टेशन पर प्रोग्रामर बने. फिल्मों में छोटे मोटे रोल करते रहे. गायक के रूप में भी हाथ-पैर मारे. एस डी बर्मन से ये देखा न गया. एक दिन बिठाकर कहा कि आखिर तुम अपनी प्रतिभा के साथ इतनी ज्यादती क्यों कर रहे हो. सब काम छोड़ दो और धुनें बनाने पर काम करो. इस तरह मदन मोहन अपने काम को लेकर गम्भीर हुए. एस डी बर्मन का ज्ञान न मिलता तो शायद मदन मोहन फिल्मों के छोटे मोटे एक्टर ही रह जाते.

उनकी शुरुआत की किसी फिल्म की गजल को सुनकर खुद बेगम अख्तर ने फोन करके मदन मोहन से पूछा कि ये कम्पोजिशन तुमने बनाई कैसे? इस धुन को बनाने का प्रोसेस मुझे समझाओ. और मुझे भी ये लगता है कि मदन मोहन की जितनी भी धुनें है, उनका आनंद लेते हुए ये भी सोचना चाहिए कि बिना संगीत की फॉर्मल ट्रेनिंग लिए इस बन्दे ने ऐसी मुश्किल धुनें तैयार कैसे की होगी?

जिस दौर में मदन मोहन थे, उस दौर में हर गाने के दो अंतरे होते है जिसकी ट्यून एक जैसी ही होती थी. उस दौर में भी मदन मोहन और सी रामचन्द्र संभवत: दो ऐसे संगीतकार थे जिन्होंने हर अंतरे की अलग ट्यून बनाने की नई रवायत शुरू की.

हंसते जख्म के ‘तुम जो मिल गए हो’ में तो मदन मोहन ने तीन अंतरे तीन अलग अलग मूड और ट्यून में बनाएँ. इस तरह की रवायत को रहमान ने परवान चढ़ाया जिसने गाने के ओपनिंग पीस,अंतरे, इंट्रो जैसी शास्त्रीयता और तय चीज़ों को अपनी प्रतिभा से बदल कर रख दिया.

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मदन मोहन जिनके काम का मुरीद वो जमाना भी था और ये जमाना भी है, जिनकी फिल्म अनपढ़ के दो गानो ‘आपकी नज़रों ने समझा’ और ‘है इसी में प्यार की आबरू’ को सुनकर नौशाद ने कहा था कि इन दो धुनों पर उनका सारा रचा हुआ संगीत कुर्बान है, उस मदन मोहन के काम को कभी अवार्ड के लायक नहीं समझा गया.

दुःखद है पर सत्य है. खुद मदन मोहन बहुत गैरत वाले थे पर उनको अवार्ड नहीं मिलने पर सबसे ज्यादा दुःखी होती थी लता मंगेशकर जो उन्हें अपना भाई मानती थी. एक बार बोली- “मदन भईया, आपके इतने अच्छे काम को अवार्ड नहीं मिलता तो सचमुच बड़ा अफसोस होता है.”

मदन मोहन हंसते हुए बोले- इससे बड़ा मेरा अवार्ड क्या होगा कि मेरे लिए ‘अफसोस’ लता मंगेशकर कर रही है.

फिर आया वो दिन जब फिल्म दस्तक के लिए संजीव कुमार को बेस्ट एक्टर और मदन मोहन को बेस्ट म्यूजिशियन का नेशनल अवार्ड घोषित हुआ. मदन मोहन ने सोच लिया कि वो अब अवार्ड नहीं लेंगे पर संजीव कुमार ने उन्हें मना लिया. बोले, मैं सूट का कपड़ा लाया हूँ. दोनों एक साथ एक जैसे सूट में अवार्ड लेने जाएंगे.

आज तक भी मदन मोहन को केवल दस्तक के लिए मिला एक और एकमात्र पुरस्कार दर्ज है.

इस देश में प्रतिभाओं के साथ हुई अविरल बदतमीजियों में से ये भी एक बेहद खूबसूरत बदतमीजी है.

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संगीतकार मदन मोहन की दो यादगार धुनें नैना बरसे और लग जा गले राज खोसला की फिल्म वो कौन थी में दर्ज है पर इन धुनों के इस्तेमाल की कहानी भी कम लाजवाब नहीं.

नैना बरसे की धुन को मदन मोहन रिकार्ड करने से अठारह साल पहले ही बना चुके थे पर जाने क्या था कि लगातार हर निर्माता-निर्देशक इसे रिजेक्ट किये जा रहे थे. इतना रिजेक्ट कि मदन मोहन ने सोच लिया कि अगर राज खोसला भी इस धुन को ना कर देंगे तो इस फिर धुन के बारे में सोचना बंद कर देंगे.

पर राज खोसला को ये धुन बहुत पसन्द आई. सुनते ही हाँ कर दी पर अब एक दूसरी धुन लग जा गले उन्हें बहुत साधारण लगी. उसे रिजेक्ट कर दिया. अजीब था पर सच यही है कि रिजेक्ट हो रहीं धुन सलेक्ट हो गई और लगभग सलेक्ट होने वाली धुन रिजेक्ट.

बाद में फिल्म के हीरो मनोज कुमार ने ये धुन सुनी और सुनकर ठीक वैसे ही उस खुमार में चले गए जिस खुमार में हम सब आज तक इस गाने को सुनकर हैं. उन्होने ही राज खोसला को फिर इस गाने को फिल्म में रखने के लिए राजी किया. आज इन दोनों गानो को सुन सुन कर हमने जमाने बदल दिए. ये गीत अब तक हम सब की सुप्त होती भावनाओ को सहलाते रहते हैं.

खुद मदन मोहन ने फिर इस पर बोलते हुए एक रेडियो इंटरव्यू में कहा- “फीलिंग कैसी भी हो, किसी भी कला में ढली हुई हो, उसे वक्त और जमाना कैद नहीं कर सकता. वह हर समय ताजा बनी रहती है.”

मदन मोहन साहब, कितने सही थे आप.

और फिर ये सब जानने के बाद अक्सर इस गाने को सुनते हुए एक डर मन में हमेशा हरा रहता है कि अगर उस दिन, उस रोज राज खोसला भी नैना बरसे को रिजेक्ट कर देते तो…..

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शम्मी कपूर वेस्टर्न म्यूजिक के धाकड़ जानकार थे. अपने जमाने के सभी नामी वेस्टर्न कलाकारों को तो फॉलो करते ही थे, भारत के ठेठ आंचलिक लोक गीतों के भी रसिक बलमा थे.

फिल्म सिलसिला की आलीजा नूर-ए-मोहब्बत कम्पोजिशन “नीला आसमां सो गया” भी दरअसल शम्मी की ही बनाई कम्पोजिशन थी जिसे उन्होंने अमिताभ के साथ फिल्म जमीर की शूटिंग के दौरान गुनगुनाया था.

तो बात ये है कि जब नासिर हुसैन फिल्म तीसरी मंजिल बना रहे थे और संगीतकार के रूप में आर डी बर्मन को मौका दे रहे थे तब शम्मी एज यूजवल चाहते थे कि संगीतकार उनके प्रिय शंकर-जयकिशन या ओ पी नैयर ही हो. नासिर ने शम्मी को कहा कि एक बार आर डी की धुनें सुन ले. पसन्द नहीं आये तो फिर शंकर-जयकिशन या ओपी को ले लेंगे. बात तय हुई और इस तरह शायद हिंदी सिनेमा में एक फिल्म का हीरो पहली बार एक संगीतकार का ऑडिशन ले रहा था.

तय समय पर करारे नोट की तरह आर डी बर्मन शम्मी के पास पहुंचे और तीसरी मंजिल के लिए तैयार की हुई अपनी पहली धुन सुनाई-

“दीवाना मुझ सा नहीं इस अम्बर के नीचे
आगे है कातिल मेरा और में पीछे पीछे”

शम्मी मुस्कुराए और बोले कि ये धुन तो एक नेपाली लोकगीत की है. तुम नाम बताओगे या उस गीत को में यहां बजाऊँ. आर डी के होश फाख्ता. उसे कहाँ पता था कि संगीत को इतना महीन फॉलो करने आदमी आज उसके सामने है.

तुरंत ओ हसीना ज़ुल्फ़ों वाली और आजा आजा मैं हूँ प्यार तेरा की धुनें भी शम्मी को सुना डाली जो उन्हें पसन्द आनी ही थी और आई. आरडी को आराम मिला और तीसरी कसम को आरडी. हमें तीसरी मंजिल के नाम से “मेलोडी” मिली जिसे हम आज तक गुनगुना ही रहे हैं.

एक किस्सा ये भी बातो में है कि आजा आजा मैं हूँ प्यार तेरा की धुन भी आर डी ने कहीं से मारी थी. किसी वेस्टर्न धुन से.

कहाँ से मारनी थी, इसका आइडिया जिसने दिया उसका नाम भी शम्मी कपूर था.

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