मालवा आंचल में फैली आग को बुझाने के लिए क्यों नहीं करते ‘कक्काजी’ का ‘शंख प्रक्षालन’

मेरे मित्र और बीजेपी सरकार के तथा राष्ट्रीय स्वसेवक संघ के बहुत करीबी और वजनदार पत्रकार, मीसा बन्दी “श्री राम भुवन सिंह कुशवाह” ने अपनी फेसबुक पोस्ट के द्वारा आरएसएस और केन्द्रीय नेतृत्व यानि मोदी सरकार से अनुरोध किया है कि ‘मालवा को किसान आन्दोलन के दावानल से बचाने के लिए’ कक्का जी के नाम से कु/विख्यात प्राणी को नियंत्रित करके समझाईये.

आम तौर पर यह माना जाता है कि यह जो शिव कुमार शर्मा अर्थात कक्काजी कहिन प्राणी हैं, इनका ताल्लुक भाजपा के आड़वानी और मुरली मनोहर जोशी गुट से है. कुशवाह जी ने जो कुछ कहा है उसके अंश देखिये-

“मुझे मालूम है कि इतनी खरी बात कुछ लोगों को पसन्द नहीं आयेगी पर मैं खरी और सही बात कहूंगा भी. यह सुनकर किसी को बुरी लगे तो लगे. पर सच बात तो यही है. यह मूल लड़ाई के जड़ में कुछ लोगों के ‘अहम और स्वार्थ ‘ की टकराहट ही है जिसने एक संघर्षशील कार्यकर्ता को ‘हार्दिक पटेल’ बना डाला. अब भुगतो!

पर भुगत कौन रहा है ? सदैव शांति का टापू कहा जानेवाला मालवा !

और वह मालवा जो महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान को भी दिशा देता रहा है, भाजपा का गढ़ था, एक एक जिले से सहस्त्रों जिसने स्वयंसेवक दिए, आज जल रहा है. मालवा के जलने का ऐतिहासिक महत्व है. अब कोई इसे बचा सकता है तो वह ‘दिल्ली’ ही है.

पर मैं जानता हूँ कि हमारे नीति नियंता, कर्ता – धर्ता इसे हवा में उड़ा देंगे. उन्हें क्या उनकी सुख सुविधाएं सलामत रहनी चाहिए. देश -राष्ट्र जाए भाड़ में!

बस, मेरा तो केवल एक ही कहना है कि श्री शिवकुमार शर्मा “कक्का जी “को सम्हाल सको तो सम्हाल लीजिये और इस शांति के टापू को लहूलुहान होने से बचा लीजिये. नहीं तो आपकी मर्जी!”

कुशवाह जी ने भावावेश में लिख तो दिया पर वह यह जानते कि उन्होने यह लिखकर कमलनाथ, सिंधिया, दिग्गी राजा और राहुल गांधी के हाथ में एक ऐसा खंजर थमा दिया जिससे वह आसानी से शिवराज का राजनैतिक मस्तक का विच्छेद मध्यप्रदेश में कर सकेंगे तथा उसके रक्त प्रवाह के छींटे मोदी और आड़वाणी पर गिरेंगे.

कुशवाह जी के इस उवाच का अर्थ है कि शिवराज सिंह जो कह रहे हैं कि मन्दसौर से फैली किसान हत्याओं की आग कांग्रेस ने लगाई है, यह गलत है. कुशवाह जी के कथनानुसार यह आग तो बीजेपी के ही आड़वाणी जोशी गुट के “कक्काजी” ने लगाई है. वैसे अखबारों की माने तो कक्काजी को पुलिस ढूंढ भी रही है. तो फिर क्या यह मान लिया जाए कि शिवराज जो अपनी सभाओं में मोदी जी का गुणगान करते हैं, उसकी सजा देने के लिए कक्काजी को किसी ने मुकर्रर करके भेजा है. लगता है दाल में कुछ तो काला है.

कारण और रहस्यमय राजनैतिक इच्छा कुइच्छा कुछ भी हो, किसी की भी हो पर वर्तमान परिस्थिति में अगर “कक्का जी” नाम के प्राणी का संदेह मात्र भी हाथ इन आगजनी लूट पाट और अराजकता फैलाने में है, तो बिना किसी लाग लपट के उन्हें पकड़ कर अच्छी तरह उनका “शंख प्रक्षालन” करना चाहिये.

मैंने जो अपनी प्रतिक्रिया कुशवाह जी को दी वह इस प्रकार है –

“कक्का जी में कोई दम नहीं है, उन्हें आप बिला वजह भैंरों बाबा बनाकर पूजा कराना चाहते हैं. अरे आज भी भारतीय मानसिकता यही है, कहीं भी एक पत्थर रख दीजिये, सिन्दूर पोतकर गूगल और अगरबत्ती जला दीजिये, साल भर में मन्दिर तैयार हो जाएगा. कानून व्यवस्था कोई मानोमुर्रवत से नहीं दुरूस्त होती है. किसान अलग हैं और किसानों के नाम पर अराजकता फैलाने वालों की समूह मनोवृति एक दम अलग है.

पुचकार कर फुसलाकर बच्चा तभी तक समझता है जब तक वह भोला होता है. किशोरावस्था में आने के बाद आपके बच्चे को चरस , गांजा, दारू की आदत कौन डाल रहा है, पहले उसकी खबर लीजिये. फिर अगर आपको अपने बच्चे को सुधारना हैं तो उसके गाल में जोर का तमाचा जडिये, घर से भागता है तो भाग जाने दीजिए, दो चार दिन ठोकरें खाकर रोता हुआ चला आयेगा.

अरे भाई एक छोटा सा उदाहरण ही देखिये, इन्दौर में गांधी प्रतिमा के चौराहे पर कभी सड़क  दुर्घटनाएं नहीं होती है, पता है क्यों? वहां पर गांधी जी के हाथ में सबको लठ्ठ नजर आता है. आप जरा उस लठ्ठ को गांधी के हाथ से निकाल कर आजमा लीजिए रोज धडाधड दर्जनों लोग टकराकर कुचलेंगे.

….अरे ..हंसिये मत ..! इस कथन के मर्म की गहराई को समझिये. सोचिये “भय बिन प्रीति न होय गोपाला” क्यों कहा गया है. श्रीमान जी राजनीति अलग होती है और शासन प्रशासन अलग. अच्छी राजनीति “हाफुस ” आम की तरह होती है जिसे देखकर जीभ लपलपाने लगती हैं और चूसने पर मजा आ जाता है.

पर उसके उत्तम स्वाद का रहस्य आम के भीतर छुपी उस कडक गुठली में छुपा है जिसे कोई दांतों से काटे तो दांत टूट जायेंगे. जहां तक अच्छे प्रशासन का सवाल है, वह एक “नारियल” के समान होता है. ऊपर से देखने में कड़क और पूरी तरह खडूस नजर आता है. पर भीतर से बहुत नरम और अत्यन्त स्वादिष्ट निकलता है. तभी तो हम हर देवी देवता की मन्नत माँगते समय पूजा आरती में उसे नारियल ही भेंट में चढाते हैं.

राजनीति करने वाला व्यक्ति कितना भी चतुर, सक्षम और मनोयोगी हो, उसकी राजनीति का आम तब तक ही लोगों के मुंह मे पानी लायेगा जब तक कि उसे चूसने के बाद उसमें कीड़ा लगा न दिखे. जहां आम रूपी राजनीति में भ्रष्टाचार, कुप्रशासन का कीड़ा लगा, लोग उसे थू थू करके फेंक देंगे. कांग्रेस की दुर्गति का यही तो कारण रहा. सपा, बसपा भी इसी कीड़े के कारण रो रहे हैं.

इस समय तो श्रीमान आप अपने लोंगों को सलाह दीजिये कि कक्काजी मामाजी सबको भूल जाईये अपने प्रशासन के डन्डे़ में जो धूल जमी है उसे झाड़कर तेल पिलाईये फिर तेजी से चलाईये. मजाल है अगर आपका कानून सख्त है और आपमें कानून के पालन कराने की पूरी मंशा और ताकत है, तो एक नहीं ऐसे लाखों कक्का जी कहिन आ जाए,  हाथ जोड़कर खड़े हो जाएंगे. फिर किसी की हिम्मत नहीं हो सकती एक वाहन भी फूंक सके.”

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