फिर पहाड़ पर जाकर क्या पाओगे?

‘ज्ञानी दा ढाबा’ का नाम सुना है? ज़रूर सुना होगा, विशेषकर उन लोगों ने जो शिमला जाते रहते हैं.

यह चंडीगढ़ – शिमला मार्ग का मशहूर ढाबा ‘था’, ठीक उसी तरह जिस तरह दिल्ली – अंबाला -लुधियाना हाईवे पर पूरण सिंह का पापुलर ढाबा है.

धर्मपुर स्थित इस ढाबे पर वेज-नॉनवेज दोनों खाने का अपना मज़ा होता, साफ-सुथरा ताज़ा और सामान्य रेट पर, नाश्ता और दोनों वक़्त का भोजन.

ख़ास बात यह होती कि इसकी कुछ ख़ास डिश जल्दी ख़त्म हो जाती, कई बार तो इतनी भीड़ हो जाती कि लंबा इंतज़ार करना पड़ता.

यह हर पर्यटक के लिये एक महत्वपूर्ण पड़ाव सा बन गया था, एक तरह से चंडीगढ़ -शिमला के बीच मील का पत्थर, एक प्रतीक चिन्ह, एक पहचान.

मै यहाँ ‘था’ इसलिये लिख रहा हू क्योंकि पिछले रविवार जब वहाँ से गुज़र रहा था तो देखता हूँ कि वहाँ वो नहीं है. सड़क चौड़ीकरण में उसे तोड़ दिया गया है.

मुझे यकायक झटका सा लगा था. धर्मपुर पहचान में ही नहीं आ रहा था. और जाने क्यों मैं उदास हो गया.

ऐसा लगा कहीं कुछ छूट सा गया है. एक ख़ालीपन का अहसास. पेट तो शायद कोई और होटल में भी भर जाये मगर भावनाओं की रिक्तता कैसे और कौन भर पायेगा.

अब कोई क्या कर सकता है. शिमला जाने वालों की इतनी भीड़ बढ़ गयी है, इतनी अधिक गाड़ियाँ हो गयी हैं कि पूछो मत. और फिर सबको जल्दी है. तेज़ दौड़ती बड़ी-बड़ी गाड़ियों को चौड़ी सड़क चाहिये.

और लोगों की इस चाहत को पूरा करने के लिये चार लेन की सड़क बनायी जा रही है. पहाड़ पर!!! कल्पना कर सकते हैं कितनी बेदर्दी से पहाड़ और पेड़ काटे जा रहे होंगे.

अरे मूर्ख मानव, तू अपनी बड़ी गाड़ी में तेज़ रफ़्तार से शिमला पहुँच तो जायेगा, मगर जिस लिये तू वहाँ भाग कर गया है उसे तो पहले ही अपने हाथों से ख़त्म कर रहा है.

सोलन शिमला में अब वो बात नहीं, ये भी नीचे ज़मीन की तरह तप कर गर्म होने लगे हैं, और इसी रफ़्तार से पहाड़ कटते रहे तो मुझे डर है कि कही चोटियाँ समतल ना हो जाएं. फिर पहाड़ पर जाकर क्या पाओगे?

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