आप नादान थे, पर निर्दोष नहीं…

1989 या 90 की बात है. मेडिकल कॉलेज में फर्स्ट ईयर में था. नया-नया हॉस्टल में आया था. एक दोपहर डिसेक्शन रूम में कुछ सीनियर्स घुस आए और सबको हांक कर ले गए… एक ट्रक खड़ा था, सभी को उसमें चढ़ा दिया गया.

हुआ यह था कि फ़िल्म ‘घायल’ आई थी, प्लाज़ा सिनेमा में लगी थी. तो कुछ सीनियर्स फ़िल्म देखने पहुंचे और उन्हें टिकट नहीं मिला. वे जा पहुंचे मैनेजर के चैम्बर में… हम मेडिकोज हैं, टिकट चाहिए…

उधर टिकट ब्लैक हो रहे थे, हाउस फुल चल रहा था. तो मैनेजर ने भाव नहीं दिया. बात तू-तड़ाक और शायद धक्का-मुक्की तक पहुंच गई.

तो सीनियर्स आये वापस हॉस्टल और यहाँ से री-एनफोर्समेंट लेकर पहुंचे प्लाज़ा सिनेमा.

वहाँ पहुँच कर खूब धुनाई की ब्लैकयर्स की, तोड़-फोड़ मचाई और मेडिकोज की धर्म-ध्वजा फहरा दी प्लाज़ा सिनेमा पर…

क्रांति पूरी हुई, धर्म का राज्य स्थापित हुआ, अधर्म का नाश हुआ, सत्य की असत्य पर विजय हुई…

पर कुछ शरीफ बच्चे भी थे जो इस प्रकार की एक्स्ट्रा-क्युरिकुलर एक्टिविटीज में इंटरेस्टेड नहीं थे. तो वे शराफत से ट्रक पर बस खड़े रहे.

उधर जब प्लाज़ा का युद्ध चल रहा था तो इधर से पुलिस पहुंची. उसे बहुत चैन से ये 30 लड़के एक जगह जमा मिल गए, ट्रक सहित सबको अंदर कर दिया.

उधर ट्रक की तलाशी ली गई तो एक कोने में एक देसी कट्टा भी निकल आया. तो सब पर आर्म्स एक्ट लगा कर अंदर कर दिया.

हमारे सूरमाओं ने दो रात रांची जेल में काटी. मज़े की बात है कि ये लगभग सभी 30 लोग बहुत ही सीधे-शरीफ लोग थे.

इतने सीधे कि सीनियर्स को ना नहीं बोल सकते थे, इतने सीधे कि मार-पीट नहीं कर सकते थे, इतने सीधे कि ट्रक से कूद कर भाग भी नहीं सकते थे… पर भीड़ का भाग थे, तो भीड़ का नतीजा भी भुगता…

मध्य-प्रदेश में किसान आंदोलन के नाम पर हिंसा और आगजनी की जो घटनाएँ हुईं, वो उनमें से हर एक ने नहीं की होगी.

सौ में शायद चार-पाँच ही होते होंगे जो खुद अपने हाथ से आग लगाते होंगे. पर बाकी के लोग उन्हें रोक भी तो नहीं रहे थे. उनके साथ खड़े होकर उन्हें संख्या बल ही तो प्रदान कर रहे थे.

और जब पुलिस फायरिंग हुई होगी तो ये सबसे सीधे लोग ही सबसे सामने पकड़े गए होंगे.

जिन्होंने जान बूझ कर आगजनी और हिंसा की, वे तो इसकी अपेक्षा ही कर रहे होंगे और भागने के लिए तैयार ही होंगे. पर जो चुपचाप भीड़ का भाग बने तमाशा देख रहे थे उन्होंने ही कीमत चुकाई…

कीमत चुकाई भीड़ का भाग बनने की, किंकर्तव्यविमूढ़ता की, मूर्खता की. आप पर तरस खाया जा सकता है, पर क्षमा नहीं किया जा सकता… आप नादान थे, पर निर्दोष नहीं…

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY