किसान धूप में अपना जिस्म जलाता है, बस-थाना नहीं

फरुखाबाद एशिया का सबसे बड़ा आलू उत्पादक क्षेत्र है यहां आलू की इतनी वैराइटी है कि आप हैरान हो जायेंगे. चिप्स के लिये अलग आलू पापड़ बनाने का अलग आलू, भूनने वाला अलग आलू, तलने वाला अलग आलू और शोरबे के लिये अलग आलू.

यहां का किसान गेहूं, सरसो, मक्का अपने इस्तेमाल भर ही पैदा करता है. आसाम बंगाल हरियाणा उड़ीसा आदि राज्यों में यहीं से आलू जाता है. अब जब सारे किसान आलू उत्पादित करेंगे तो आलू भी सीजन पर मिट्टी के मोल ही बिकता है लोकल मंडी में. चोर तक आलू के पैकेट से आलू निकाल खाली बोरी ही चुराते हैं क्योंकि उसका तो भी दाम मिल जाता है आलू का नहीं.

नई नई क्लीनिक अर्ध ग्रामीण क्षेत्र में शुरु की थी तो अधिकांश मरीज कृषक परिवार के ही होते थे. शाम को दिन भर की आमदनी कैलकुलेट करता था तो पाता कि 70% मरीज तो उधारी वाले ही थे. सबका यही कथन होता कि डायरी में फीस लिख लीजिये आलू बिकते ही चुका देंगे. और फिर बेचारों का आलू जब मिट्टी के मोल बिकता था तो मेरी फीस भी मिट्टी ही हो जाती थी.

एक शाम मैंने मित्र से किसानों की इस बदहाली की विस्तृत चर्चा की और निर्णय लिया कि एक संगठन बनाया जाये जो किसानों के हित के लिये संघर्ष करे. उस समय चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत किसानों के सर्वमान्य नेता थे तो हम दोनों चल दिये सिसौली उनसे मिलने.

दो दिन वहां रुकने के बाद उनसे मुलाकात हुई उन्होंने सारी समस्याएँ ध्यान से सुनीं और हमको जिले में भारतीय किसान यूनियन स्थापित करने का निर्देश दिया. वहां से आकर हम दोनों ने संगठन तैयार किया, किसानों के बीच गये, उन्हें साथ लिया. सैकड़ों धरना प्रदर्शन आंदोलन किये. हर माह मंडी स्थल पर किसानों की पंचायत लगाई हजारों किसान इकठ्ठा होते थे. उनकी समस्यायों और समाधान पर चर्चा होती थी. प्रशासनिक अधिकारियों को भी आमंत्रित करते थे. डी एम या एस डी एम में से कोई एक जरूर आता था.

उस बार कोल्ड स्टोरेज वालों ने भंडारण का किराया अनाप शनाप बढ़ा दिया था और इसके विरोधस्वरूप किसान आंदोलन रत थे. पंचायत में वार्ता करने डी एम ने शीतग्रह संघ के अध्यक्ष को भी बुलवा लिया. बातों ही बातों में गर्मागर्मी बढ़ गई दोनों ही किराया घटाने के पक्ष में ना थे.

लाठियां हवा में लहरा रहीं थीं नारे लग रहे थे. लाउडस्पीकर से वार्ता विफल होने की सूचना प्रसारित हो चुकी थी. उत्तेजना अपने चरम पर थी . नारों के शोर से आसमान गूंज रहा था. डी एम हमारे कब्जे में बंधक बने हुये थे. पुलिस की भी हिम्मत ना पड़ रही थी कि मंच तक पहुंच सके.

मंच पर सैकड़ों लोग चढ़े हुये थे. मैं भी चिंतित था कि कोई अप्रिय ना घटित हो जाये. हाथ जोड़ उन सब से निवेदन कर रहा था कि मंच खाली कर दें. आगे ऐसी स्थिति को कैसे हम दोनों ने सम्भाला यह अलग कहानी है वह फिर कभी. फिलहाल तो इतना जान लीजिये बंधक बने और उग्र भीड़ से घिरे डी एम से ना धक्कामुक्की हुई ना किसी ने हाथ उठाया और ना ही कपड़े फाड़ अभद्रता की.

किसानों ने कभी अपना आलू सड़क पर नहीं फेंका भले ही ढ़ोर डंगर सुअर को खिला दिया.

कभी बस थाना नहीं जलाया.

कभी सड़कें जाम कर यातायात अवरूद्ध ना किया.

कभी जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति ना रोकी.

आप ही फैसला करो वास्तव में किसान कौन है?

फरुखाबाद वाला या मंदसौर वाला.

किसान आंसू पीता है मूत्र नहीं.

किसान गम खाता है चूहा नहीं.

किसान धूप में अपना जिस्म जलाता है बस थाना नहीं.

पहचानिये देश के किसान को

और

किसान के भेष में आंदोलनरत अराजक राजनीतिज्ञों को.

अब तो नकाब हटना ही चाहिये.

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