डॉक्टर सुभाष मुखर्जी याद हैं कॉमरेड?

आलोचकों के हिसाब से ‘एक डॉक्टर की मौत’ अच्छी फिल्म थी. अब जो आलोचकों के हिसाब से अच्छी थी वो तो जाहिर है आम लोगों ने नहीं देखी होगी.

अच्छे फिल्म निर्देशकों में से माने जाने वाले बंगाली निर्देशक तपन सिन्हा की सन 1990 में आई ये फिल्म हिट भी नहीं हुई थी.

रमापाद चौधरी की कहानी ‘अभिमन्यु’ पर आधारित ये फिल्म लालफीताशाही, साथ काम करने वालों की आपसी जलन और तारीफ के बदले अपमान-शोषण झेलने वाले एक वैज्ञानिक की कहानी है.

ये फिल्म मोटे तौर पर डॉ सुभाष मुखर्जी के जीवन से प्रेरित है, खुद तपन सिन्हा ने ये फिल्म डॉ मुखर्जी को ही समर्पित की थी.

फिल्म की कहानी में एक डॉ दीपांकर रॉय (पंकज कपूर) हैं जो बरसों की तलाश के बाद कोढ़ का इलाज ढूँढने में कामयाब हो जाते हैं. रातों रात खबर पेड मीडिया में आती है और एक अज्ञात जूनियर डॉक्टर की प्रसिद्धि से कई लोग जल भुन जाते हैं.

फिल्म में स्वास्थ्य विभाग के सेक्रेटरी उन्हें धमकाते दिखते हैं और फिर उनके कुछ साथी उन्हें एक लेक्चर के लिए आमंत्रित करते हैं. लेक्चर उन्हें बेइज्जत करने का बहाना था, और ऐसे हमलों से निराश डॉ. रॉय को दिल का दौरा भी पड़ जाता है.

उनकी पत्नी (शबाना आज़मी) और कुछ और लोग अमूल्य (इरफ़ान खान), डॉ कुंडू (अनिल चटर्जी) उनकी मदद करते हैं. उनका शोषण इतने पर ही बंद नहीं होता.

डॉ. दीपांकर रॉय का ट्रान्सफर किसी दूर दराज के गाँव में कर दिया जाता है. एक किसी ब्रिटिश संस्थान से उन्हें बुलाने के लिए चिट्ठी भी आती है, लेकिन वो चिट्ठी भी दबा दी जाती है.

इधर भारत में जब ये सब चल रहा होता है तो दो अमेरिकी डॉक्टर भी उसी वैक्सीन पर खोज कर रहे थे. कामयाबी का श्रेय उन दोनों को वैक्सीन खोजने पर मिल जाता है, डॉ. दीपांकर गाँव में पड़े रह जाते हैं.

ये फिल्म है, तो अंत में डॉ दीपांकर को एक विदेशी फाउंडेशन से चिट्ठी आती है, बाहर के लोगों ने उनका काम पहचान लिया था.

डॉ. दीपांकर को भी समझ में आ जाता है कि वो विदेशी आमंत्रण स्वीकार कर मानवता की बेहतर सेवा कर सकते हैं. फिल्म के अंत में डॉक्टर बाहर जाने का फैसला लेते हैं.

जब असली जिन्दगी देखेंगे तो डॉ. सुभाष मुखर्जी के लिए चीज़ें इतनी आसान नहीं रही थीं. उनका जन्म हजारीबाग (उस समय बिहार और अब का झारखण्ड) के एक ब्राह्मण परिवार में 16 जनवरी 1931 को हुआ था.

उन्होंने सन 1958 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से और बाद में 1967 में यूनिवर्सिटी ऑफ़ एडिनबर्ग से दो बार डॉक्टरेट की उपाधि ली थी.

उन्होंने सुनीत मुखर्जी और डॉ. सरोज काँटी भट्टाचार्या की मदद से तब इतिहास रच दिया जब ‘इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन’ (in vitro fertilization – IVF) के जरिये पहली बच्ची ‘दुर्गा’ का जन्म हुआ.

कनुप्रिया अग्रवाल नाम से जानी जाने वाली ये बच्ची भारत की पहली टेस्ट-ट्यूब बेबी थी जिसका जन्म 3 अक्टूबर 1978 को हुआ था. ब्रिटिश पैट्रिक स्टेपटो और रोबर्ट एडवर्ड्स की कामयाबी के कुछ दिन बाद, यानि विश्व में दूसरा.

दूसरा क्यों, पहला क्यों नहीं? वो इसलिए कि इन्हें लगातार प्रताड़ना और विरोध झेलना पड़ा था. राज्य सरकार ने इन पर 1978 में ही मुकदमा ठोक दिया.

राजनैतिक ताकतों ने इनका सामाजिक बहिष्कार कर डाला, लालफीताशाही ने परेशान किया, ट्रान्सफर उठा कर प्रजनन से दूसरे विभाग में कर दिया गया. उनके अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में जाने पर भी रोक लगा दी गई.

नवम्बर 1978 में उनके दावों की जांच के लिए एक ‘एक्सपर्ट कमिटी’ बनी जिसे अजीब-अजीब आरोप जांचने थे.

उन पर सरकारी अफसरों से पहले मीडिया से बात करने, बिना करोड़ों के उपकरण लिए घर के फ्रिज से ये काम करने, पहले टेस्ट ट्यूब बेबी ‘दुर्गा’ को जन्म देने, और सरकारी दबाव ना मानने के अभियोग थे. ये जांच राज्य सरकार करवा रही थी.

सन 1986 में भारत का पहला ‘सरकारी’, या कहिये आधिकारिक टेस्ट ट्यूब बेबी (हर्ष वर्धन रेड्डी – 16 अगस्त, 1986) के जन्म का श्री टी.सी. आनंद कुमार (तब के आई.आर.आर. या आई.सी.एम.आर. के डायरेक्टर) को दिया गया.

आनंद कुमार एक कांफ्रेंस में कलकत्ता गए तो उन्होंने डॉ सुभाष मुखर्जी के मुक़दमे और रिसर्च के कागज़ ढूंढ निकाले.

जांचने पर उन्हें दिख गया कि डॉ. सुभाष मुखर्जी की जांच करने वाले कमीशन के अध्यक्ष एक रेडिओ-फिजिसिस्ट थे, उनके अलावा समिति में एक स्त्री रोग विशेषज्ञ, एक साइकोलॉजी, एक फिजियोलॉजी और एक न्यूरोलॉजी का था.

इनमें से किसी को प्रजनन या भ्रूण, और उस से जुड़ी खोजों के बारे में एक अक्षर भी नहीं पता था. टी.सी. आनन्द कुमार के प्रयासों से भारत के पहले टेस्ट ट्यूब बेबी का श्रेय डॉ. सुभाष मुखर्जी को (मरणोपरांत) मिला.

ज्योति बसु सरकार की जांच, प्रताड़ना, शोषण झेलते हुए डॉ. सुभाष मुखर्जी ने 19 जून 1981 को आत्महत्या कर ली थी.

बहसों में आज कल एक मैनेजर पाण्डेय जी हैं, जो जीवन भर एक आयातित विचारधारा पर पोषित हुए और बुढ़ापे में पूजा-पाठ करते धर लिए गए हैं.

ऐसा होते ही कई आयातित विचारधारा के समर्थक उन्हें कोसते हुए वैज्ञानिक विचारधारा का झंडा उठाये नजर आने लगे हैं.

ऐसे माहौल में 1978 के वामपंथी दौर के बंगाल का एक वैज्ञानिक पर किया ये अमानुषिक अत्याचार तो याद आना ही था.

आज जो वैज्ञानिक पद्दतियों में ‘आस्था’ जताने और पूजा-पाठ जैसे पाखंड से दूर रहने की दोमुंही बातें कर रहे हैं उन सब से मेरा सवाल ये है कि जनाब आप वैज्ञानिक विचारों के पोषक कब थे? कब, कहाँ, कौन से अविष्कारकों को प्रश्रय दे दिया?

लाल झंडे का समुदाय और वाम मज़हब की सरकारें तो वैज्ञानिकों को आत्महत्या के लिए धकेलने में याद आती हैं.

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