जो प्रेम में हारा, वही प्रेम में जीता

making india poem ma jivan shaifaly

1.
प्रेम में सम्भव नहीं
आरोहण के शिखर बिंदु
और अवरोहण के अधोस्तर..
प्रेम में नहीं हो सकते
वेग आवेग के क्षण भी
कभी मंद तो कभी प्रबल…

प्रेम में कुछ सम्भव है तो
केवल निरंतरता
अनवरत व्यापकता विस्तारण की
गहराई की, जैसे सागर…

ऊपर से समतल सा एकरस
किंतु भीतर से अगाध अनंत…
ज्यों तट छूटे गहराता जाये
और विलीन कर ले स्व में
प्रत्येक अन्य के अस्तित्व को…

तो सनम
जब मैं और तुम का द्वन्द न हो,
प्राप्य के अप्राप्य की संभावना
विदा ले ले… और,
स्वयं के विलय में संकोच न हो,
तब समझ लेना
कहीं प्रेम घटित हो गया है…

सूत्र भी यही है
प्रेम का निकृष्ट भाव द्वैत है
और उत्कृष्ट भाव अद्वैत.

2.

कितने ही
स्वर्ण कमल
जो सहज ही
करतल हो सकते थे
मैंने नैन तक
नहीं धरे थे उन पर
बस पा जाने को
मात्र एक तृण
तुम्हारे हाथ से
तुम्हारे प्रेम का…

नहीं कोई होड़ नहीं,
तुम्हारा अकूत ज्ञान
मेरी समझ के पार सही
पर इतना जानो
जो प्रेम में हारा
वही प्रेम में जीता.

3.

तुम्हारी
स्वर्ण देह मंदिर के
कपाट खोल भीतर आकर,
तुम्हारे उलझे मन की
ग्रँथियो की घण्टियों को
छू कर जब मैंने गुंजाया था
नाद स्वर, और भंग किया था
मौन तुम्हारे अंतस का,

तब भीतर उस मंदिर के
गर्भ गृह में पाई थी
एक अपूर्ण प्रतिमा
जिसे देख कर मैं भी एक पल को
ठिठक गया था,

इतना सुन्दर मंदिर तो ये
प्रतिमा अधूरी क्यों?

किंतु उस अपूर्ण अमूर्त मूर्त में
भी पाई थी एक बात अनोखी
कि वो मुस्काती थी…

अपनी पाषाण आँखों के घेरो में
एक परम शांति का ओज लिए
जैसे कहती हो मैं अपूर्ण अवश्य हूँ
पर खंडित नही हूँ,

मेरा पूर्ण होना भले ही अभी शेष है
पर निश्चित है, मैं प्रतीक्षा रत हूँ

तब मैंने कुछ कहा नहीं था
किंतु मैने पाया अब मैं भी भागी था
तुम्हारी उस चिर शेष,
प्रतीक्षा में…

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