एक करोड़ मुआवज़ा और सरकारी नौकरी : कल गिन नहीं पायेंगे गोली खाने के लिये तैयार छातियाँ

निर्भया कांड में एक बलात्कारी सिर्फ नाबालिग होने की वजह से छूट गया था जिसकी पूरे देश ने भर्त्सना की.

प्रतापगढ़ में मारे गये डिप्टी एसपी जियाउल हक की विधवा को 50 लाख का मुआवजा और परिवार में दो लोगों को सरकारी नौकरी दी गयी… सिर्फ इसलिये क्योंकि वो मुसलमान थे.

अरविंद केजरीवाल सिर्फ इसलिये सभी आरोपों और आलोचनाओं से परे हैं क्योंकि वो आम आदमी है.

दलित आज भी इसलिये दमित, शोषित, वंचित है क्योंकि वो दलित है.

मोदी, योगी सरकार सिर्फ इसलिये दमनकारी और साम्प्रदायिक है क्योंकि वो भाजपा, संघ से हैं.

अपराधी हमारे समाज के लोग ही होते हैं, दूसरे ग्रहों से इम्पोर्ट नही किये जाते. उनकी एक जाति होती है, कोई पेशा होता है… वो अमीर या गरीब होते हैं.

मंदसौर में कर्जमाफी के लिये बवाल मचा रहे तथाकथित किसानों पर जब पुलिस को मजबूरी में गोली चलानी पड़ी जिसमें छः लोग मारे गये तब मानवता के ठेकेदार उर्फ अंध भाजपाविरोधी घटना का सिर्फ इसलिये उग्र विरोध कर रहे हैं क्योंकि गोली खाने वाले उपद्रवी, अराजक तत्वों ने खुद को किसान घोषित कर रखा था…

किसान माने सताया, दबाया, गिराया, दबा, कुचला, भूखा, नंगा, प्रताड़ित इंसानों जैसा दिखने वाला खास किस्म का जीव… जो सदियों से सिर्फ इसलिये वंचित है क्योंकि वो किसान है जैसे रॉबर्ट वाड्रा और अमिताभ बच्चन.

अपराधियों को अगर उनकी जाति, पेशे, लिंग, क्षेत्र के अनुसार अपराध में आरक्षण मिलने लगा तब कल को सुनने के लिये तैयार रहिये… एक बलात्कारी इसलिये माफ किया गया क्योंकि वो बेचारा गरीब रिक्शेवाला था…

एक हत्यारे खूनी को इसलिये बख्श दिया गया क्योंकि वो किसान था… पब्लिक ने छिनैतों को इसलिये जाने दिया क्योंकि वो सदियों के सताये दलित थे… अपने पति की हत्यारी महिला इसलिये रिहा कर दी गयी क्योंकि वो अबला थी.

किसान का ठप्पा ठोक कर जो लोग मंदसौर के उपद्रवियों के पक्ष में क्रांति कर रहे हैं, वो जवाब दें कि बंदूक से गोली के छूटने के लिये किस हद तक उपद्रव बर्दाश्त किया जाना चाहिये?

लूटपाट, आगजनी, तोड़फोड़ या दो-चार पुलिसवालों, पांच-छः नागरिकों के मरने तक?  टॉलरेट करने की वो सीमा क्या होनी चाहिये?

सरकार से गुज़ारिश है अगर हमारे सुरक्षाबल, हमारी पुलिस उपद्रव रोकने में अक्षम है, बिना गोली चलाये उपद्रवियों को नियंत्रित नही कर पा रही तो कृपया ये जिम्मेदारी सेक्यूलर्स, लिबरल्स को दे दी जाये… ये लोग कर लेंगे… ये लोग बहुत ज्यादा काबिल हैं.

मामाजी… अगर एक गोली खाने की कीमत एक करोड़ रूपए का मुआवज़ा और सरकारी नौकरी है तो कमर कस लीजिये… कल को गोली खाने के लिये तैयार छातियाँ आप गिन नहीं पायेंगे.

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